: व्यंग्य : स्वस्ति सिरी जोग पाती लिखी कंक्रीटोन्मुख उत्तर प्रदेश के अनपढ़, अधपढ़, पव्वापढ़, अधकच एंव चाटुकार हाकरनुमा पत्रकार भाइयों के नाम। लेखक एखलाक सैयद भदोही का समझ सको तो जै हिन्द बाचना जी। सारे पढ़े लिखे, सामर्थ, गंभीर और बुध्दजीवी पत्रकार संयोगवश यदि पाती पढ़ रहे हो तो वे टुच्चे-चाटुकार पत्रकारों से दूरी बनाएं रखे। आपकी योग्यता का स्वागत है। सुना है प्रदेश में चिड़ीमार पत्रकारों की अंधड़ चल रही है। बिना बात का वितण्डा बनाने में सक्रिय हैं लम्पट पत्रकार। इनकी टुच्चई से प्रदेश का साम्प्रदायिक सौहार्द गुड़-गोबर हो जाने की सम्भावना है। आयं-बायं लिख छपवाकर अपनी दालरोटी का कुप्रबंध कर रहे है। लनतरानिया बांटी जा रही है, अपना जमीर बेच खा रहें है। कुछ तो रखैल पत्रकार है जो छोटी लाइन से लेकर बड़ी लाइन तक चलते हैं। मैंने प्रदेश की राजधानी के हजरतगंज स्थित कॉफी हाऊस के पास गलचऊरा करते हुये एक पत्रकार से पूछा? कि भइये गंगा कहां से निकली? बोला इटावा से। फिर मैने पूछा कि-पत्रकारिता समाज का क्या होता है? बोला समाज का तर्पण होता है। मैं समझ गया कि पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसे-ऐसे पत्रकार है जो कंडोम और कमांडों का अर्थ नहीं समझते।
एक पत्रकार से पूछा कि तुम समाज में किसकी सेवा करते हो? तपाक से बोला-पत्रकार जब खाना खाता है तो उदर सेवा करता है। और पीता है तो-दारू सेवा करता है। विज्ञापन छापता है तो-चाटुकारिता सेवा करता है। पत्रकारिता के नाम पर अपनी रोटी सेंकने की सेवा करता है। और अगर कोठे पर पहुंच जाये तो बाईजी का सेवा कर देता है। एक पत्रकार से पूछा कि तुम्हारे जैसे पत्रकारों की क्वालिफिकेशन क्या है ? बोला कि ‘‘तिकड़म तंत्र का डिप्लोमा’’ है। क्यों पत्रकार भाई-तुम्हारा कोई छुट्टी का दिन होता है या नहीं? बोला- चाटुकार-मक्कार-बटमार अगर संडे मनाने लगे तो खाएंगे क्या? एक वरिष्ठ खूंसट पत्रकार से पूछा कि भाई जी? पत्रकारिता लाइन मे बहुत से लाखैरा नत्थूखैरा जैसे पत्रकारों को बर्दाश्त कैसे करते हो? वह बोला कि एैसे पत्रकार तो समाज की नाजाएज औलाद है जिसे न छोड़ा जा सकता है न अपनाया जा सकता है। अबे मुझे क्यों काट रहे हो? बोला-मैं पठान रूपी मच्छर हूं, कहीं भी काट सकता हूं। कुछ भी छाप सकता हूं! कहीं भी पान कीह पिचकारी मार सकता हूं। जितना खाते है उतना पीक मारते ह,ै जहां देखा मार दिया मुंह फेरा और पच्च। मैं उसके थोड़ा नजदीक हुआ तो उसके मुंह से बदबू निकल रही थी। पूछा कि आज मंजन-वंजन किया है कि नही? बोला उठान-वठान पत्रकार हूं। मंजन की गुलामी स्वीकार नहीं कर सकता। खैर, मैं उससे सहम गया और प्रश्न करने की हिमाकत नही कर सका। ‘‘नारी तुम केवल श्रध्दा हो’’ को ऐेसे पत्रकार लिखते है कि ‘‘नारी तुम अध्दा हो’’। ये है प्रदेश के पत्रकारों का परिचय ज्ञान।
पत्रकार भाइयों तुम से अच्छे और समझदार तो हमारे हाकर भाई हैं। तुम से ज्यादा उनकी इज्जत है शालीनता से भरे रहते हैं हाकर भाई लोग। एक पत्रकार से पूछा कि भाई शालीनता का क्या अर्थ होता है? सर खुजाते हुए बोला- शालीनता का अर्थ होता है तुष्टीकरण। एक पत्रकार से पूछा कि भाई जी! तुम लोग धनी-मनी लोगों को छपास रोगी क्यों बना रहे हो? बोला कि छपास का अर्थ पहले बताओ? मैने उसे समझाया कि छपास का भाव यह है कि जब किसी व्यक्ति के मन में यह आशा उत्पन्न कर दिया जाये कि उसका नाम कहीं छपे, अखबार में फोटो छपे, उसका मान-प्रतिष्ठा बढ़े़ तो उस मनोदशा को छपास कहते हैं। इस प्रकार तुम पत्रकार लोग-लोगो को छपास रोगी बना रहे हो। बोला कि यही तो हमारा धन्धा है। अगर हम छपास रोगी नही बनायेंगे तो हमें आर्थिक लाभ कैसे होगा और हमारे बीवी बच्चों का पेट कैसे भरेगा? अरे भाई उनका फोटो छापकर आयं-बायं उनके नाम वक्तव्य छाप कर ही नम्बर दो से पैसा कमाते हैं। मैंने पूछा कि नम्बर दो से कैसे कमाते हो? बोला कि विज्ञापन दो हजार का लेते है और प्रेस को बताते है एक हजार! क्या नगद लेते हो? बोला-य—यस। और कई दफा तो प्रेस का पैसा ही ऊलजलूल कर देते हैं। मैंने कहा शाबास मरघिल्ले पत्रकार। वह मुझपर बिगड़ गया और कहा कि मरघिल्ले कहते हो माफी मांगो। मैंने यह कहते माफी मांगा ली कि पालतू कुत्ते की तरह छपास रोगियों के सामने लेटकर पेट दिखाता कूं-कूं करता है तभी तो आर्थिक लाभ कमाते हो और पत्रकारिता जगत को गन्दा करते हो!
देश व दुनिया को आईना दिखाने वाला, भारत का नं0 1 मीडिया पोर्टल ‘‘भड़ास 4 मीडिया’’ के यशवंत जी ने फटकार के साथ मुझे सुझाया कि यार अपने व्यंग्य लेखनीय को इतना गाढ़ा मत छाना करो। पत्रकार बंधुओं की गरिमा व्यंग्य में मत घोला करो। हमने यह माना कि तुम्हारे व्यंग्य मजेदार व जायकेदार होते हैं बस यही काफी है। लेकिन पत्रकारों पर व्यंग्य ठीक नहीं है। व्यंग्य का मतलब है उसे पढ़कर हंसी आए। अब पत्रकार पढे़गे तो उनकी हंसी लुप्त-गुप्त हो जाएगी। मैंने कहा व्यंग्य का मतलब केवल हंसना-हंसाना ही नहीं होता। उसमे विचार के साथ थोड़ी गंम्भीरता भी होनी चाहिए। लेकिन ‘‘भड़ास 4 मीडिया’’ मीडिया मेरी बातों से सहमत नहीं हुआ। बोला की व्यंग्य में वैचारिक गंभीरता लाकर क्या तुम पाठकों को बोर करना चाहते हो। मैंने कहा कि जो नयी पौध अधकचरे पत्रकार हैं उनका कैरेक्टर ही नहीं ठीक है। कभी मौका हाथ लगा तो अधकचरे पत्रकारों की कथा पर प्रकाश अवश्य डालूंगा। मेरा तो सुझाव है कि अखबार वालों को ‘‘पत्रकार चरित्र पखवाड़ा’ आयोजित करना चाहिए।
लेखक एखलाक सैयद पत्रकार हैं. इनसे संपर्क मो0 09616322229 के जरिए किया जा सकता है.


