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पांडु को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है एक पत्रकार

इलाहाबाद : पत्रकारों की उखाड़-पछाड़, घोटाले,चरण-वंदना की खबरें आती ही रहती हैं। इन सब के बीच कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो समाज के सरोकारों की सिर्फ खबर ही नहीं लिखते, उसके लिए लड़ते भी हैं। खबर लिखने वाले ऐसे लोग खबर नहीं बनते यह अलग बात है। सीधी बात पर आता हूं। दरअसल पत्रकार की ऐसी ही मुहिम की बदौलत कानपुर की एक नदी के अस्तित्व की लड़ाई अब पब्लिक की लड़ाई बनी है। यह नदी है पांडु नदी। नदी ज्यादा लंबी नहीं है। कन्नौज जिले के तिर्वा तहसील की एक झील से निकली यह नदी 200 किलोमीटर दूर चलकर फतेहपुर में गंगा में विलीन हो जाती है। बदकिस्मती से कानपुर पहुंचते-पहुंचते यह नदी नाला बन जाती है। वजह है पनकी थर्मल पावर प्लांट। प्लांट की पूरी फ्लाई ऐश इस नदी में गिरती है। कानपुर से आगे इसमें डिजाल्व आक्सीजन का लेवल जीरो है। मछलियां कानपुर से पहले तक तो हैं लेकिन इसके बाद आपको नदी में ढूंढ़े नहीं मिलेंगी।

इलाहाबाद : पत्रकारों की उखाड़-पछाड़, घोटाले,चरण-वंदना की खबरें आती ही रहती हैं। इन सब के बीच कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो समाज के सरोकारों की सिर्फ खबर ही नहीं लिखते, उसके लिए लड़ते भी हैं। खबर लिखने वाले ऐसे लोग खबर नहीं बनते यह अलग बात है। सीधी बात पर आता हूं। दरअसल पत्रकार की ऐसी ही मुहिम की बदौलत कानपुर की एक नदी के अस्तित्व की लड़ाई अब पब्लिक की लड़ाई बनी है। यह नदी है पांडु नदी। नदी ज्यादा लंबी नहीं है। कन्नौज जिले के तिर्वा तहसील की एक झील से निकली यह नदी 200 किलोमीटर दूर चलकर फतेहपुर में गंगा में विलीन हो जाती है। बदकिस्मती से कानपुर पहुंचते-पहुंचते यह नदी नाला बन जाती है। वजह है पनकी थर्मल पावर प्लांट। प्लांट की पूरी फ्लाई ऐश इस नदी में गिरती है। कानपुर से आगे इसमें डिजाल्व आक्सीजन का लेवल जीरो है। मछलियां कानपुर से पहले तक तो हैं लेकिन इसके बाद आपको नदी में ढूंढ़े नहीं मिलेंगी।

इस नदी पर 2008 में हिन्दुस्तान कानपुर के पत्रकार ब्रजेंद्र प्रताप सिंह ने अभियान के रूप में कई खबरें लिखी थीं। बता दूं कि उनकी यह मुहिम सिर्फ खबरों तक ही सीमित नहीं थी। नदी के लिए संघर्ष में वह टीम बनाकर उसके साथ जुड़े भी। ब्रजेंद्र अभी भी हिन्दुस्तान इलाहाबाद में चीफ रिपोर्टर हैं। तब उन्होंने कानपुर के डीबीएस कालेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के छात्रों, प्रोफेसरों और कुछ किसानों के साथ एक पांडु अध्ययन दल बनाया था। इस दल ने जब नदी की छानबीन शुरू की तो तब स्थिति यह थी कि कानपुर के मेहरबान सिंह का पुरवा इलाके में नदी पर बने अंग्रेजों के जमाने के पुल के नीचे सभी दरवाजे पावर प्लांट की फ्लाई ऐश से जाम थे।

इस टीम ने न केवल पूरी नदी का दौरा किया बल्कि उससे फ्लाई ऐश साफ करने के लिए अभियान भी चलाया। नदी के हालात पर कानपुर नगर निगम में भी बवाल मच चुका है। नदी की सफाई के प्रति वहां के अफसरान तक मुहिम में साथ हैं, हालांकि इसके बाद भी पावर प्लांट कुछ सुनने को तैयार नहीं है। ब्रजेंद्र प्रताप की इस मुहिम में विश्व बैंक सहित पर्यावरण से जुड़ी कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह राणा भी जुड़ गए हैं। नदी के उदगम स्थल से लेकर उसके गंगा में मिलने तक रास्ते के 46 गांवों में पांडु पंचायत बनाई गई है। यह सिलसिला अभी भी जारी है। इसी जून के महीने में 11 तारीख को पांडु नदी के किनारे कानपुर के पनकाबहादुर गांव में तीन हजार लोगों के साथ नदी को बचाने के लिए पांडु की लड़ाई-अभी नहीं तो कभी नहीं के नाम से एक सभा बुलाई गई।

इस सभा में कोई नेता नहीं था। कोई पार्टी नहीं थी। इसके बाद भी तीन हजार से ज्यादा लोगों की नदी किनारे भीड़ जुटी। किसी पत्रकार के अभियान में इतनी भीड़ जुटना मामूली बात नहीं। इस सभी में सीधे-सीधे अब पावर प्लाण्ट और एडमिनिस्ट्रेशन को अल्टीमेटम दिया गया है। सभा में पर्यावरण प्रेमियों के साथ ही किसान भी एक सुर में रजामंद थे कि अगर नदी में फ्लाई ऐश गिरना बंद न हुआ तो पावर प्लांट का नाला ही बंद कर दिया जाएगा। साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में अब पीआईएल भी दाखिल की जाएगी। प्रशासन से नदी की जमीन पर हो गए कब्जों को खाली कराकर वहां सघन वृक्षारोपण कराने की मांग की गई है।

इलाहाबाद से रामजी गुप्‍ता की रिपोर्ट.

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