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पाक प्रधानमंत्री ने कहा- मुल्क के अस्तित्व को खतरा

पाकिस्तान बुरी तरह से आतंकवाद के घेरे में फंस गया है. वहां के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने बुधवार को अपने मुल्क की परेशानी का बहुत ही साफ़ शब्दों में उल्लेख किया. बहुत ही दुखी मन से उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ जो लड़ाई उनका देश लड़ रहा है, उसमें सफल होना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने आगाह किया कि अगर पाकिस्तानी राष्ट्र के अस्तित्व को बचाना है तो सरकार और देश की जनता को इस लड़ाई में फतह हासिल करनी पड़ेगी.

पाकिस्तान बुरी तरह से आतंकवाद के घेरे में फंस गया है. वहां के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने बुधवार को अपने मुल्क की परेशानी का बहुत ही साफ़ शब्दों में उल्लेख किया. बहुत ही दुखी मन से उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ जो लड़ाई उनका देश लड़ रहा है, उसमें सफल होना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने आगाह किया कि अगर पाकिस्तानी राष्ट्र के अस्तित्व को बचाना है तो सरकार और देश की जनता को इस लड़ाई में फतह हासिल करनी पड़ेगी.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का यह दर्द जायज़ है. बहुत तकलीफ होती है जब हम देखते हैं कि पाकिस्तान पूरी तरह से आजकल आतंकवाद की ज़द में है. भारत और पाकिस्तान की अंदरूनी हालात पर जब नज़र डालते हैं तो साफ़ नज़र आता है कि गलत राजनीतिक फैसलों के चलते राष्ट्रों की क्या फजीहत हो सकती है.

भारत और पाकिस्तान एक ही दिन ब्रिटिश गुलामी से आज़ाद हुए थे. भारत ने सभी धर्मों को सम्मान देने की राजनीति को अपने संविधान की बुनियाद में डाल दिया. पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह भी वही चाहते थे लेकिन वह नहीं हो सका. उनकी मृत्यु के बाद पाकिस्तान में ऐसे लोगों की सत्ता कायम हो गयी जो बहुत ही हलके लोग थे. आज आलम यह है कि भारत एक सुपरपावर बनने के रास्ते पर है और पाकिस्तान का प्रधानमंत्री स्वीकार कर रहा है कि जिस आतंकवाद को पाकिस्तानी हुक्मरान ने भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए शुरू किया और पाला पोसा उसी के चलते आज पाकिस्तानी राष्ट्र के सामने अस्तित्व का सवाल पैदा हो गया है. हालांकि पाकिस्तान के पूर्व फौजी तानाशाह जनरल जिया उल हक ने आतंकवाद को जिहाद का नाम देने की कोशिश की थी. हो सकता है ऐसा रहा भी हो लेकिन आज तो यह कुछ लोगों का बाकायदा धंधा बन चुका है. पाकिस्तानी समाज में जिस तरह से रेडिकल तत्व हावी हुए हैं वह किसी भी सरकार के लिए मुसीबत बन सकते हैं.

युसूफ रजा गिलानी अपने देश के शहर मिंगोरा में आयोजित रेडिकल तत्वों को खत्म करने के राष्ट्रीय सेमिनार में भाषण कर रहे थे. उन्होंने दावा किया कि वे अपने देश से आतंकवाद को ख़त्म कर देंगे. उनको भरोसा है कि उनके देश की जनता इस मुहिम में पाकिस्तान की सरकार को पूरी मदद करेगी. उनके हिसाब से पाकिस्तान आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है. पाकिस्तान की सरकार की नीयत पर बाकी दुनिया में भरोसा नहीं किया जा रहा है. इस बात का अंदाज़ इस सेमिनार में भी लग गया. पाकिस्तान में आतंकवाद के फलने फूलने में वहां की फौज और आईएसआई का बड़ा हाथ माना जाता है,  लेकिन इस सेमिनार में पाकिस्तानी फौज़ के मुखिया जनरल परवेज़ अशफाक कयानी ने भी भाषण किया.

ज़ाहिर है कि प्रधान मंत्री गि‍लानी ने जो भी बातें कहीं वे अमरीका और भारत को नज़र में रख कर कही गयी थीं,  क्योंकि यही दो मुल्क पाकिस्तान से बार बार निवेदन कर रहे हैं कि है वह अपने देश से आतंकवाद का खात्मा करे. हालांकि यह भी उतना ही सच है कि न तो अमरीका और न ही भारत को यह विश्वास है कि पाकिस्तानी फौज आतंकवाद के खिलाफ कोई कारगर क़दम उठायेगी. कुछ संवेदनहीन लोग पाकिस्तानी आतंकवाद को इस्लामी आतंकवाद भी कहते हैं. यह बहुत ही गलत बात है क्योंकि आतंकवाद इस्लामी नहीं हो सकता. इस्लाम में आतंकवाद की कोई गुंजाइश नहीं है. वह स्वार्थी लोगों की तरफ से राजनीतिक फायदे के लिए किया जाने वाला काम है.  मुस्लिम नौजवानों के शामिल होने की वजह से उसे ‘इस्लामी आतंकवाद’ नाम देने की कोशिश की जाती है,  जो कि सरासर गलत है. अमरीकी अखबारों, भारतीय दक्षिणपंथी राजनेताओं और अमरीकी सरकार की तरफ से यह कोशिश होती है और उन्हें इस प्रचार में आंशिक सफलता भी मिलती है.

सच्चाई यह है कि अगर सही माहौल मिले तो मुसलमान आतंक को कभी भी राजनीतिक हथियार नहीं बनाएगा. जो अमरीका, पाकिस्तान और पाकिस्तानी मुसलमानों को लगभग पूरी तरह से आतंकवाद का केंद्र मानता है वही अमरीका भारत के मुसलमानों को आतंकवाद से बहुत दूर मानता है. यह देखना दिलचस्प होगा कि पिछले दिनों भारत में तैनात अमरीकी राजदूत डेविड मुलफोर्ड ने समय-समय पर अपनी सरकार के पास जो गुप्त रिपोर्टें भेजी थीं, उसमें उन्होंने साफ़ कहा था कि भारत में पंद्रह करोड़ से ज्यादा मुसलमान हैं लेकिन वे अपने आप को हर तरह की आतंकवादी गतिविधियों से दूर रखते हैं.  उन्होंने दावा किया कि भारत के मुसलमान अपने देश के जीवंत लोकतंत्र में पूरी तरह से शामिल हैं. साझा संस्कृति पर गर्व करते हैं और भारत के अल्पसंख्यक राष्ट्रवादी हैं.

अमरीकी राजदूत का यह कथन किसी कूटनीतिक सभा में दिया भाषण नहीं है. यह विकीलीक्स के हवाले से दुनिया को मालूम हुआ है और यह उन गुप्त दस्तावजों का हिस्सा है जो प्रतिष्ठित अखबार ‘हिन्दू’ के सहयोग से विकीलीक्स ने भारत में जारी किया था. डिस्पैच में लिखा है कि भारत के बहुसंख्यक मुसलमान उदारवादी राजनीति में विश्वास करते हैं और अपने देश के उद्योग और समाज में अच्छे मुकाम पर पहुंचने की कोशिश करते हैं. उन्होंने दावा किया कि बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम नौजवान मुख्य धारा में ही अपनी तरक्की के अवसर तलाशते हैं इसलिए यहाँ से आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के लिए रंगरूट नहीं मिल रहे हैं. डेविड मुलफोर्ड ने लिखा है कि भारत में भी इस्लाम में विश्वास करने वाले लोग कई समुदायों में बँटे हुए हैं लेकिन वे सभी राजनीति के सेकुलर धाराओं में सक्रिय होते हैं. धार्मिक अपील वाले संगठनों को भारत में कोई भी समर्थन नहीं मिलता. वे हाशिये पर ही रहते हैं. जबकि भारत में सभी धर्मों के नौजवानों के  हीरो आजकल मुस्लिम नौजवान ही हैं. मुलफोर्ड के डिस्पैच में शाहरुख खां, आमिर खान और सलमान खान का ज़िक्र भी है जो सभी धर्मों के नौजवानों के प्रिय हैं.

अजीब बात है कि शुरू से ही पाकिस्तान के साथ खड़े होने वाले अमरीका को अब पाकिस्तान पर भरोसा नहीं है जबकि अमरीका ने पाकिस्तान के बराबर साबित करने के चक्कर में हमेशा से ही भारत का विरोध किया था. 1971 के बंगलादेश मुक्ति संग्राम के दौरान तो पाकिस्तान की फौजी शेषजीहुकूमत को बचाए रखने के लिए उसने भारत पर सातवें बेडे़ के हमले की योजना भी बना दी थी. लेकिन आज उसी अमरीका को भारत में जीवंत लोकतंत्र नज़र आ रहा है जबकि पाकिस्तान को वह आतंकवादी देश घोषित करने की योजना पर काम कर रहा है.

लेखक शेष नारायण सिंह जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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