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पीआईबी की कछुआ चाल से पत्रकार परेशान, सरकारी प्रचार भी मुश्किल में

पत्र सूचना कार्यालय यानी पीआईबी, जिसके सिर पर भारत सरकार की महत्वपूर्ण सूचनाओं को जनता तक पहुंचाने का महती भार है और मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए समय पर सूचना के साथ कार्ड उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, एक बार फिर फिसड्डी साबित हुआ है। पीआईबी में कार्य संस्कृति की जो शैली अपनाई जा रही है उससे अंततः सरकार को ही खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। पत्रकारों को उचित सुविधाएं नहीं मिलने, समय पर सूचना नहीं उपलब्ध होने के अलावा उनके कार्ड रिन्युअल में तीन-तीन महीने तक विलंब होने जैसी घटनाएं इस महत्वपूर्ण इकाई की कार्य प्रणाली पर गंभीर सवालिया निशन खड़े कर रहा है। यह तीसरी बार है जब वार्षिक कार्ड रिन्युअल कार्य को कंप्यूटराइज्ड किये जाने के बावजूद तीन-तीन महीने तक कार्ड वितरण नहीं हो पा रहा है।

पत्र सूचना कार्यालय यानी पीआईबी, जिसके सिर पर भारत सरकार की महत्वपूर्ण सूचनाओं को जनता तक पहुंचाने का महती भार है और मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए समय पर सूचना के साथ कार्ड उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, एक बार फिर फिसड्डी साबित हुआ है। पीआईबी में कार्य संस्कृति की जो शैली अपनाई जा रही है उससे अंततः सरकार को ही खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। पत्रकारों को उचित सुविधाएं नहीं मिलने, समय पर सूचना नहीं उपलब्ध होने के अलावा उनके कार्ड रिन्युअल में तीन-तीन महीने तक विलंब होने जैसी घटनाएं इस महत्वपूर्ण इकाई की कार्य प्रणाली पर गंभीर सवालिया निशन खड़े कर रहा है। यह तीसरी बार है जब वार्षिक कार्ड रिन्युअल कार्य को कंप्यूटराइज्ड किये जाने के बावजूद तीन-तीन महीने तक कार्ड वितरण नहीं हो पा रहा है।

इससे पूर्व जब यही कार्ड व्यक्तिगत तौर पर तैयार होता था तो मात्र एक माह के अंदर बनकर तैयार हो जाता था। तो इसे कंप्यूटरीकरण का दोष माना जाए या पीआईबी अफसरों की मनमर्जी और निष्क्रियता को। कहना मुश्किल है, लेकिन यह दीगर है कि वर्तमान पीआईओ के कार्यकाल में लगातार ऐसी मुश्किलें सामने आ रही हैं, जिसे देखकर यह कहा जा सकता है कि भारत सरकार का प्रचार प्रसार तंत्र अब लंगड़ा लूला हो चुका है। यह पीआईबी कार्ड रिन्युअल और वितरण में उजागर हो जाता है, जो कार्य 31 दिसंबर 2011 को पूरा हो जाना चाहिए था वह 29 फरवरी 2012 तक नहीं पूरा हो सका था। व्यक्ति से काम कराने में जो समय लगता था वह काम यदि मशीन से कराने पर भी तीन माह का समय लगे तो पीआईबी की कर्तव्यपरायणता का नमूना ही कहा जाएगा?

वैसे दावा करने में पीआईबी अधिकारियों का जवाब नहीं है। लेकिन हकीकत के धरातल पर पूरा तंत्र अकर्मण्य, मनमर्जी, अफसरशाही, अयोग्यता का नमूना पेश करता हुआ नजर आता है। सरकारी प्रचार प्रसार का हाल यह है कि बहुत से मंत्रालयों की वेबसाइटें महीनों तक बिना किसी प्रेस विज्ञप्ति के यूं ही मुंह चिढ़ाती नजर आती है। इस तरह के कर्महीन तंत्र के भरोसे भारत सरकार की महत्ती योजनाएं जनता तक कैसे पहुंचेगी इसकी कल्पना की जा सकती है।

पीआईबी की जिम्मेदारियों में केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी करने की औपचारिकता ही नहीं निभानी होती है बल्कि उसे आम जनता से सरकारी योजनाओं के बारे में राय मशविरा भी हासिल करनी होती है ताकि सरकार को यह पता चल सके कि उसकी योजनाओं का क्या हश्र हो रहा है? पीआईबी को समय समय पर मीडिया से सहयोग करके ऐसी जानकारियों हासिल करनी होती है, जिसका उपयोग सरकार अपनी नीतियां बनाने के समय कर सके। लेकिन आज की स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि वह अपने रूटीन कार्यों को कर पाने में असमर्थ है, फीड बैक और मीडिया कोआपरेशन जैसे महत्वपूर्ण काम के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता। पीआईबी अधिकारियों की अकर्मण्यता के लिए निश्चित रूप से पीआईबी प्रमुख को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जो कि भारत सरकार की मुख्य प्रवक्ता हैं।

वर्तमान पीआईओ जिसे अब पीडीजी मीडिया कहा जाता है, उसका स्वभाव बदले की भावना वाली है इसके चलते वह पूरे मीडिया परिवार में अलोकप्रिय है। भले ही अपनी पहुंच के बल पर प्रोन्नति का रिकार्ड बना रही हों लेकिन उनकी कार्य प्रणाली से भारत सरकार को ही जनता तक पहुंचने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। पत्र सूचना कार्यालय में कार्यरत प्रवक्ताओं की हालत यह है कि उन्हें अपने मंत्रालय के बारे में जानकारी ही नहीं है। सवाल पूछने पर अफसरशाही वाले अंदाज में जवाब मिलता है, ऐसे में मीडिया अपने सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए किसी मंत्री या सचिव स्तर के अधिकारी तक पहुंचने के बजाय अपनी कलम से ही सरकारी कार्यक्रमों का पोस्टमार्टम करने लगा है। यह पीआईबी की जिम्मेदारी है कि वह पत्रकारों को उचित और समय पर जानकारी उपलब्ध करा दे ताकि सरकारी नीतियों की नकारात्मक व्याख्या न हो सके। यदि एक बार किसी अच्छी नीति की भी मीडिया ने नकारात्मक व्याख्या जनता के सामने परोस दिया तो फिर सरकार को नाकों चने चबाने पड़ जाते हैं अपनी सही व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए। आश्‍चर्य तो तब होता है जब इतनी भद्द पिटने के बावजूद प्रधानमंत्री स्तर पर इस महत्वपूर्ण तंत्र को सुधारने की पहल होती नहीं दिख रही है। सरकार ने अन्ना आंदोलन के समय अपनी लाचारी देखी है, पीआईबी चाहता तो उस आंदोलन के समय सरकारी नीतियों को भी मीडिया में जगह दिलाकर उस आंदोलन की धार को कम कर सकता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिला।

यह कहना कि पत्रकारों के लिए सूचना का एकमात्र साधन पीआईबी है, गलत होगा लेकिन यह साबित करना पीआईबी का काम है कि वह सरकार और जनता के बीच महत्वपूर्ण कड़ी है। इस कड़ी का महत्वपूर्ण भाग वे पत्रकार हैं जिन्हें सरकारी नीतियों की सकरात्मक जानकारी उपलब्ध कराकर वर्तमान डीपीओ सरकारी नीतियों को जन-जन तक पहुंचा सकते हैं। लेकिन आज की तारीख में ज्यादातर डीपीओ को किसी विभाग की जानकारी ही नहीं है, दंभी हैं, अफसरशाही के गुरूर में काम निपटाते हैं जैसे सरकारी नौकरी है तो एक दो पेज कभी कभार कोई सूचना दे दें। यही वे कारण है जिससे पत्रकार पीआईबी से दूर होते जा रहे हैं। वे अब पीआईबी पर सूचना के लिए आश्रित नहीं हैं बल्कि अन्य स्त्रोतों से मिली जानकारी को सनसनी बनाकर पेश कर रहे हैं, जिससे सरकार की इमेज को बट्टा लग रहा है। आखिर कब तक सरकार सोये रहेगी ऐसे अधिकारियों के प्रचार प्रसार के भरोसे?

मेरा अपना निजी अनुभव बताता है कि डीपीओ से किसी विषय पर जानकारी लेने के लिए फोन करता हूं तो वह उस तथ्य से अपने को अनजान घोषित कर देने में ही भलाई समझता है। यदि ऐसे ही कारपोरेट मीडिया कल्चर पनपता रहा तो भारत सरकार का सूचना तंत्र ढह जाएगा, लाचार, बेजार सूचना तंत्र के भरोसे सरकार अपनी नीतियों को जन जन तक कतई नहीं पहुंचा सकेगी। आखिर यह सरकार कब तक यह देखती रहेगी?

लेखक एमवाई सिद्दीकी कानून एवं न्‍याय और रेल मंत्रालय, भारत सरकार के पूर्व प्रवक्‍ता हैं.

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