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पुस्तक मेला में उपन्यास ‘वर्चस्व’ का लोकार्पण

अभिव्यक्ति फाउंडेशन के तत्वावधान में गिरिडीह झंडा मैदान में आयोजित पुस्तक मेला के उद्घाटन समारोह के मौके पर भोरंडीहा, गिरिडीह के 78 वर्षीय बसंत शर्मा लिखित उपन्यास ‘वर्चस्व’ का लोकापर्ण किया गया। लोकार्पण गिरिडीह विधायक निर्भय कुमार शाहाबादी, पूर्व विधायक चन्द्रमोहन प्रसाद, डीडीसी प्रमोद कुमार गुप्ता, एसडीओ संजय भगत, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कंचनमाला, उद्योग महाप्रबंधक कमलेश लोहानी, अभिव्यक्ति फाउंडेशन के कृष्णकांत और लेखक बसंत शर्मा ने संयुक्त रूप से किया। सभी ने पुस्तक मेला के आयोजन की सराहना की और स्थानीय प्रकाशकों को और भी पुस्तकें प्रकाशित करने को प्रेरित किया। उपन्यास ‘वर्चस्व’ में नारी सशक्तिकरण की इस सदी में पुरुषों का अपनी पत्नी पर वर्चस्व, पत्नी के अपने स्वतंत्र विवेक और इच्छा के बीच के संघर्ष, उसके साथ न्यायपालिका की ओर भी बढऩे की चेष्ठा करते भ्रष्टाचार के घृणित पंजे और उसके निर्ममतापूर्वक मचोड़ दिए जाने के दृढ़ संकल्प के संघर्ष को चित्रित किया गया है।

अभिव्यक्ति फाउंडेशन के तत्वावधान में गिरिडीह झंडा मैदान में आयोजित पुस्तक मेला के उद्घाटन समारोह के मौके पर भोरंडीहा, गिरिडीह के 78 वर्षीय बसंत शर्मा लिखित उपन्यास ‘वर्चस्व’ का लोकापर्ण किया गया। लोकार्पण गिरिडीह विधायक निर्भय कुमार शाहाबादी, पूर्व विधायक चन्द्रमोहन प्रसाद, डीडीसी प्रमोद कुमार गुप्ता, एसडीओ संजय भगत, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कंचनमाला, उद्योग महाप्रबंधक कमलेश लोहानी, अभिव्यक्ति फाउंडेशन के कृष्णकांत और लेखक बसंत शर्मा ने संयुक्त रूप से किया। सभी ने पुस्तक मेला के आयोजन की सराहना की और स्थानीय प्रकाशकों को और भी पुस्तकें प्रकाशित करने को प्रेरित किया। उपन्यास ‘वर्चस्व’ में नारी सशक्तिकरण की इस सदी में पुरुषों का अपनी पत्नी पर वर्चस्व, पत्नी के अपने स्वतंत्र विवेक और इच्छा के बीच के संघर्ष, उसके साथ न्यायपालिका की ओर भी बढऩे की चेष्ठा करते भ्रष्टाचार के घृणित पंजे और उसके निर्ममतापूर्वक मचोड़ दिए जाने के दृढ़ संकल्प के संघर्ष को चित्रित किया गया है।

बसंत शर्मा का यह दूसरा उपन्यास है, जिसे ऑनलाइन पब्लिकेशन ने बाजार में उतरा है। इसके पहले इनका नई डिग्रियां उपन्यास बाजार में आ चुका है और सराहा भी जा चुका है। बसंत शर्मा अब तक 17 उपन्यास लिख चुके हैं, जिसमें वर्चस्व (पुरुष के अहं सह न्यायपालिका की स्वच्छता पर), नई डिग्रियां (राजनीतिक प्रदूषण पर), प्रश्न चिह्न (उग्रवाद की समस्या पर), पलायन (विस्थापन की त्रासदी पर), अति का अंत (आधुनिक राजनैतिक धूर्तता पर), इकाई (विधवा विवाह पर), भय का भूत (नारी जागरण पर), नई पौध (नारी के सामाजिक क्रांति पर), मधुवा (एक स्वतंत्रता सेनानी की कथा), अंतर्धरा (नारी मानसिकता पर), टूटते मिथ (टूटती परंपराओं पर), विकृति (आधुनिकता के दिखावे) पर, मौत की मांद (अवैध रूप से कोयला उत्खनन कर जीविकोपार्जन) पर, समय का चक्र (ग्राम पंचायत चुनाव) पर, पूर्वा (राजनीति में नारियों के प्रवेश) पर है।

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