परीक्षा में अनूठा प्रयोग क्या शुरू हुआ, पूर्वांचल विश्वविद्यालय के डेढ़ लाख छात्रों का भविष्य तबाह हो गया है। करीब 40 फीसदी रिजल्ट लटका है। परीक्षाफल में धांधली का आरोप लगाते छात्र अब कुलपति के खिलाफ मोर्चा खोले हैं। शिक्षकों ने उनके साथ कदमताल शुरू कर दिया है। शिक्षक संघ अब राज्यपाल की ड्योढ़ी पर जहांगीरी-घंटा बजा रहे हैं। शिक्षकों का आरोप है कि इस प्रयोग में करोड़ों का घोटाला किया गया है। हैरत की बात है कि इस अफरी-तफरी के बावजूद कुलपति मौजूदा सत्र की परीक्षाएं मार्च तक कराने का ऐलान कर चुके हैं।
359 कालेजों से सम्बद्ध चार लाख छात्रों वाले पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सुंदरलाल गणित विषय के महारथी माने जाते हैं, लेकिन यह दिग्गज भी यहां के परीक्षा-घोटाले वाले मकड़जाल में फंस गया। करीब डेढ़ लाख कॉपियां का नतीजा लटका हुआ है। हालात तो यही हैं कि इनका नतीजा लगातार विवादों में फंसा रहेगा। आश्चर्य की बात है कि कॉपियों की कोडिंग-डिकोडिंग का जिम्मा सम्भाली एजेंसी को इतनी गड़बडि़यों के बावजूद 20 लाख का भुगतान दे दिया है। उधर, स्नातक के दूसरी कक्षाओं से लेकर स्नात्कोत्तर तक की कक्षाओं में नया प्रवेश शुरू नहीं हुआ है।
विवादों की शुरूआत हुई पिछले सत्र में कॉपियों की कोडिंग-डिकोडिंग से। दरअसल, रोलनम्बर के चलते कुछ छात्र उस मूल्यांकन-परीक्षक तक संपर्क कर मनचाहा नम्बर बढ़वा लेते थे। इसमें छात्र, शिक्षक और विश्वविद्यालय के कर्मचारी की संलिप्तता की आशंका रहती थी। मगर कुलपति चाहते थे कि मूल्यांकन की प्रक्रिया में परीक्षार्थी का रोल-नंबर परीक्षक को न दिया जाए और उसके लिए हर कॉपी पर कोड दर्ज हो। निदान के लिए तरीका अपनाया गया कि हर कॉपी के मुख्यपृष्ठ के उस आधे पन्ने को फाड़ कर उस पर कोडिंग कर ली जाए जिस पर रोल-नम्बर आदि ब्योरा दर्ज होता है। यह कोडिंग कॉपी और उसके अधपन्ने पर समान की जाए। मूल्यांकन के बाद कोडिंग के आधार पर कॉपी के नम्बरों को अनकोड किया जाए और इस तरह परीक्षाफल निर्विवाद बनाया जा सके।
कुलपति ने इसके लिए गोरखपुर की एक एजेंसी को काम सौंपा। बताते हैं कि इसके लिए डेढ़ करोड़ का मेहनताना अदा किया जाना था। गोपनीयता बनाये रखने के लिए रकम और एजेंसी का नाम गुप्त रखा गया। लेकिन इसके साथ ही बड़े विवाद खड़े हो गये। मसलन, परीक्षा-नियंत्रक ने इस नयी समानान्तर व्यवस्था से खुद को अलग कर लिया। जानकार बताते हैं कि इस बारे में परीक्षा-नियंत्रक ने शासन को तीन पत्र भी लिखे हैं। उधर खुद को बेइमान करार दिये जाने पर कर्मचारी पहले से ही क्षुब्ध थे। लेकिन जैसे ही एजेंसी की करतूतों का खुलासा हुआ, कुलपति के खिलाफ चौतरफा हमला शुरू हो गये। कई एजेंसियों ने इस चयन पर ऐतराज किया और कहा कि इतने बड़े काम के लिए खुला निविदा क्यों नहीं आमंत्रित की गयी।
सबसे बड़ा बवाल तो ज्यादातर कॉपी के अधपन्ने की गुमशुदगी से हुआ। पता चला कि कोड वाले अधपन्ने की गैरमौजूदगी में रिजल्ट कैसे तैयार किया जाए। बताते हैं कि इसी बीच अधपन्ने के विवाद पर यह पता कि कोडिंगवाली कॉपियों के मूल्यांकन-नम्बरों की लिस्ट में पंच-छेद हैं जिसके चलते उनके नम्बरों का पता चला पाना मुमकिन नहीं। आरोप लगे कि परीक्षकों ने ही यह गलती की थी। लेकिन पूर्वांचल विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के महामंत्री डा अनिल प्रताप सिंह का कहना है कि यह करतूत शिक्षकों की नहीं, बल्कि एजेंसी की है। अनिल प्रताप का कहना है कि नम्बरों की सूची यदि क्षतिग्रस्त थी तो उसे सौंपते समय एजेंसी ने चेक क्यों नहीं किया।
बहरहाल, इस विवाद के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने करीब 50 फीसदी छात्रों का रिजल्ट आउट कर दिया। लेकिन बाकी छात्रों का मामला लटका हुआ है। शिक्षक संघ का आरोप है कि अधपन्ना की गैरमौजूदगी में विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रभावित छात्रों को उनके पिछले परिणाम के अंक के औसत पर अंक देकर इस सत्र का रिजल्ट आउट किया है। राज कालेज छात्र संघ के अध्यक्ष राजेश सिंह यादव और धर्मापुर राजकीय कालेज के छात्र धर्मेंद्र यादव का कहना है कि यह अन्याय है। इससे हमारी श्रेणी-सुधार के बजाय भविष्य तबाह हो जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन की करतूत के लिए आखिर छात्रों के भविष्य पर क्यों दांव लगाया जाए। वे मांग करते हैं अगर पिछली परीक्षा के आधार पर औसत अंक ही देने हैं तो छात्रों को बोनस अंक मिलते चाहिए। शिक्षक संघ के महामंत्री अनिल प्रताप सिंह की मांग है कि कॉपी के नम्बर और कोड वाले अधपन्ने, छात्रों के पी-7 यानी अंकपत्र-लिस्ट और जिन छात्रों का रिजल्ट आउट हो गया है उसकी मार्क्सशीट का मिलान करा लिया जाए तो दूध-पानी साफ दिख जाएगा।
इस पूरे प्रकरण पर दो दिन तक प्रतीक्षा के बावजूद कुलपति प्रोफेसर सुंदरलाल ने बातचीत के लिए समय नहीं दिया और न उनकी तरफ से कोई जवाब ही दिया।
बातचीत
देवेंद्रनाथ सिंह, अध्यक्ष, वीरबहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय शिक्षक-संघ
दरअसल यह एक बड़े शिक्षा-घोटाला का मामला है, जहां मनमर्जी के चलते खजाने पर भारी रकम वारा-न्यारा हुआ। लाखों छात्रों का भविष्य तबाह हो रहा है, शिक्षकों की विश्वसनीयता पर भी दाग लगाया गया है। कुल 40 राजकीय और अनुदानित कालेजों के शिक्षकों से जो काम कराया जाना चाहिए, उसे 319 स्व-वित्तपोषित कालेजों के शिक्षकों को सौंपा गया। तब के वित्त अधिकारी अतुल श्रीवास्तव ने कोडिंग-डिकोडिंग की प्रणाली कुलपति को सौंपी थी। जबकि यह काम परीक्षा-नियंत्रक को करना चाहिए। लेकिन अतुल श्रीवास्तव, रिटायर्ड शिक्षक बीडी मिश्र, स्ववित्तपोषित शिक्षक अजय द्विेदी और विजय तिवारी की चौकड़ी ने पूरा बंडाधार कर दिया। न टेंडर, न मंजूरी। कुलपति ने जो चाहा, किया। मनमर्जी। लेकिन इसका खामियाजा भुगत रहे हैं दो लाख छात्र। हमारा संघ अब इस घोटाले को राज्यपाल के सामने खोलने जा रहा है।
एसएसआर यादव, परीक्षा-नियंत्रक
हां, मैं परीक्षा का नियंत्रक हूं। लेकिन इस नयी कोडिंग-डिकोडिंग प्रणाली से जुडे कामों से सम्बद्ध नहीं। इस नयी प्रणाली में शामिल सभी परीक्षाओं से अलग हूं। बाकी परीक्षाओं का काम जरूर देखता हूं मैं। मैं नहीं जानता कि इसमें किस एजेंसी का काम सौंपा गया है। यह भी नहीं जानता कि इस एजेंसी को कितनी रकम की अदायगी हुई। हां, इससे जुड़ी परीक्षाओं की कॉपियां विश्वविद्यालय में मौजूद हैं। लेकिन इसमें वहां क्या कैसे हो रहा है, मुझे नहीं पता। मैंने कहा ना कि इस पूरे प्रकरण पर मैं कुछ नहीं जानता। ऐसी हालत में आपके प्रश्नों का जवाब दे पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है। हां, नये सत्र की परीक्षाओं की तारीख अगले मार्च तक शुरू करने के लिए हम पूरी तरह सक्षम हैं।
कुमार सौवीर
वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ
09415302520


