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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सादर समर्पित एक कविता

“एक चुप १०० को हराता है”

इसलिए मन मोहन मेरे

तो बोल नहीं पाता है

कोशिशें तो तू बहुत करता है

मुहं अपना हिलाने की

“एक चुप १०० को हराता है”

इसलिए मन मोहन मेरे

तो बोल नहीं पाता है

कोशिशें तो तू बहुत करता है

मुहं अपना हिलाने की


क्या भरा है तेरे मुहं मैं

जो बोलने की जगह तू बस

मुस्कराता रहता है


जाता तो है तू ऑफिस से

घर की तरफ, इंतज़ार करती रहती है

सदा ही भाभीजी हमारी

उड़ता हुआ दिल तेरा क्यों

सोनिया जी की ड्योढ़ी पे

पहुंच जाता है


कौन सा पड़ा है अर्थशास्त्र तुने

जो देश का क़र्ज़ बढता ही जाता है

है कौन सी मज़बूरी तुझ पर जो उस

किताब का पन्ना भी तू फाड़ नहीं पाता है


गुरूद्वारे में तो तू रोज़ जाता है

गुरुवाणी की जगह सोनिया जी के गुण

क्यों हमेशा गाता है


बाबा नानक क्यों तेरे दिल में आते नहीं

है कौन सी मज़बूरी चश्मे पे तेरे

सोनिया जी का अश्क हमेशा छाया रहता है


उस बच्चे राहुल से क्यों डरता है तू इतना

सरदार है तू सरदार है वो कौन सी दुरी

जो भगत सिंह से हाथ तू मिला पाता नहीं


आज गुरुगोविंद सिंह जी भी शकल

तेरी देख शरमाते है वो

गुस्से से भरे वो अपनी

तलवार पे हाथ वो फिराते है


है कौन सी मज़बूरी अपने

घर में पड़ा आइना

तू देख पाता नहीं

शकल हो गयी तेरी

कितनी काली आइना भी तेरे सामने

आने से अब घबराता है


सोनिया जी ने अपने हाथों से कौन सी

मुगली घुट्टी तुझे कौन सी पिलाई

है कौन सी मज़बूरी ना रही याद तुझे

गुरु हरकिशन जी की नसीहतें


भुला कर शहादतें गुरु तेघ बहादुर जी की

बस बन गया तू आज कठपुतली बाई..


लेखक राजेंद्र गुप्‍ता मीडिया से जुड़े हुए हैं.

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