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प्रलोभनों का फांस : पालीवाल प्रकाशन नाबालिगों के सहारे

: आईएसीएम कम्प्यूटर संस्थान कर्मियों और स्वामी शरण की रोज होती है तू-तू मैं-मैं : देश में पत्रकारिता को राह दिखाने वाला कानपुर शहर अब जर्नलिस्टिक आकर्षण का लालच देकर इंटर, बीए कर रहे नाबालिग छात्रों को प्रलोभन दे फांस रहा है। शहर में इसका जीता-जगता उदाहरण पालीवाल प्रकाशन है। जी हां, वही पालीवाल डायग्नोस्टिक जो प्रदेश में भरोसेमन्द पैथालॉजी के नाम से जाना जाता है। ध्यान रहे कि एक सिरफिरे व्यक्ति ने डॉ. उमेश पालीवाल के दिमाग में पत्रकारिता के कीड़े घुसेड़ दिये हैं। जिस कारण कम पैसे से अधिक काम करवाने के लिये संस्थान के कार्यकारी सम्पादक आस-पड़ोस के स्कूल जाने वाले बच्चों को पत्रकारिता के आकर्षण का प्रलोभन देकर संस्थान से जोड़ लेते हैं और पगार के समय हड़काकर भगा देते हैं। कार्यकारी सम्पादक स्वामी शरण पालीवाल के नाम का बैनर देकर श्रमविभाग द्वारा तय मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। डॉक्टर उमेश पालीवाल इस सम्बन्ध में पूर्णतः शान्त हैं।

: आईएसीएम कम्प्यूटर संस्थान कर्मियों और स्वामी शरण की रोज होती है तू-तू मैं-मैं : देश में पत्रकारिता को राह दिखाने वाला कानपुर शहर अब जर्नलिस्टिक आकर्षण का लालच देकर इंटर, बीए कर रहे नाबालिग छात्रों को प्रलोभन दे फांस रहा है। शहर में इसका जीता-जगता उदाहरण पालीवाल प्रकाशन है। जी हां, वही पालीवाल डायग्नोस्टिक जो प्रदेश में भरोसेमन्द पैथालॉजी के नाम से जाना जाता है। ध्यान रहे कि एक सिरफिरे व्यक्ति ने डॉ. उमेश पालीवाल के दिमाग में पत्रकारिता के कीड़े घुसेड़ दिये हैं। जिस कारण कम पैसे से अधिक काम करवाने के लिये संस्थान के कार्यकारी सम्पादक आस-पड़ोस के स्कूल जाने वाले बच्चों को पत्रकारिता के आकर्षण का प्रलोभन देकर संस्थान से जोड़ लेते हैं और पगार के समय हड़काकर भगा देते हैं। कार्यकारी सम्पादक स्वामी शरण पालीवाल के नाम का बैनर देकर श्रमविभाग द्वारा तय मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। डॉक्टर उमेश पालीवाल इस सम्बन्ध में पूर्णतः शान्त हैं।

पालीवाल प्रकाशन में काम कर चुके अमित के अनुसार डॉ. उमेश पूर्णतः प्रोफेशनल व व्यवहारशील व्यक्ति हैं लेकिन जब से उनको पत्रकारिता के कीड़ा ने काटा है वो दूर की सोचने लगे हैं। अमित के अनुसार अभी तक उन्होंने स्वामी शरण श्रीवास्तव के द्वारा बताई गई पत्रकारिता की सुनहरी बातों को ध्यान में रख कर पालीवाल प्रकाशन पर जमकर पैसा बहाया है। डॉ. उमेश ने स्वामी शरण श्रीवास्तव द्वारा लिखित सूक्तायान, वेदो का इतिहास, वैदिक इतिहास, युगबोध, अष्टांग योग परिचय, शिव संकल्प, चेतना, ओम साधना, सरल संस्कृत व्याकरण की लगभग 10 हजार प्रतियां भक्ति प्रकाशन आर्यनगर कानपुर से प्रकाशित करवाई हैं। लेकिन अभी तक लाखों रुपयों की चोट खा चुके पालीवाल प्रकाशन को कमाई के नाम पर भुजी भांग भी नसीब नही हुई है। स्वामी शरण डॉक्टर उमेश को पत्रकारिता की अपने अनुभव की दुहाई देते हुये हर महीने मोटी पगार डकारते हैं।

और अपनी ढंकने के लिए अखबारों में रोजगार का विज्ञापन देकर मोटी तनखाह का आश्वासन देकर बच्चों को रखते हैं। पालीवाल का नाम होने के कारण युवा वर्ग में कदम रख रहे छात्र उमडे चले आते हैं विज्ञापन देखकर आये प्रोफेशनल को स्वामी शरण रखता ही नहीं है। हॉ जो बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर हो और इन्टर, बीए के छात्र हो उन्हें पहले 5 अंकों का वायदा कर रख लेता है बाद में उन्हें कानपुर के उच्च माध्यमिक, इन्टर कालेज, डिग्री कालेजों में सरल संस्कृत व्याकरण समेत वेदों, आखंड ज्योति, समाचार पत्रों, बेव पोर्टल आदि से चुराकर छापी हुयी किताबों को बेचने के लिये भेजता है। पाठक ऐसी पुस्तकों पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता। एक महीने जब बेचारा छात्र पगार मांगता है तो उससे स्वामी शरण श्रीवास्तव हड़काते हुए कहते हैं कि तुम ने एक माह में संस्थान को क्या फीडबैक दिया है? तुम्हारी कोई पगार संस्थान की ओर से नहीं बनती। असहाय छात्र इधर-उधर पगार की गुहार लगा शान्त बैठ जाता है।

पालीवाल प्रकाशन कानपुर स्थित जेके मन्दिर के सामने प्रदेश की विख्यात पैथॉलाजी है। जिसके मालिक डॉ. उमेश पालीवाल हैं जिनकी पत्नी डॉ. मृदुला पालीवाल, पालीवाल प्रकाशन की सचिव हैं। डॉ. मृदुला पालीवाल के नाम पर शिव संकल्प समेत आगामी प्रकाशन सम्पूर्ण स्वास्थ्य पत्रिका में स्वामी शरण लेख लिखते हैं। कभी-कभी डॉ. उमेश पालीवाल के माता-पिता के नाम को श्रीराम शर्मा के आस-पास नाम लिखकर पालीवाल परिवार से स्वामी शरण सहानुभूति जुटाता है। स्वामी शरण श्रीवास्तव की श्रम कानूनों की जानकारी न होने के कारण उन्होंने लगभग दो दर्जन लोगों को संस्थान के विजिटिंग कार्ड और आई कार्ड प्रदान किये हैं। जिनमें गौरव श्रीवास्वतव छात्र इंटर पुखराया निवासी शास्त्री नगर, हर्षिता छात्रा प्रथम वर्ष, अंकित चतुर्वेदी छात्र बीए प्रथम वर्ष, अनिल प्रजापति छात्र बीए प्रथम वर्ष, रितु बीए तृतीय वर्ष आदि शामिल हैं।

सिरफिरे सम्पादक से मालिक हलकान, सहकर्मी परेशान : ये प्रकाशन मेरे लिये स्थापित किया गया है। मैं प्रकाशन में नहीं आया मेरे लिये डॉक्टर उमेश पालीवाल ने यह बनवाया है। ये प्रवचन है पालीवाल प्रकाशन के कार्यकारी सम्पादक स्वामी शरण श्रीवास्तव के। जो बीते दो तीन सालों से पालीवाल प्रकाशन को हाइजेक किये हुए हैं। कुछ लोग तो यह भी बताते हैं कि स्वामी शरण श्रीवास्तव की बुद्धि के सामने मालिक एमबीबीएस डॉ. उमेश पालीवाल चारों खाने चित हो गये हैं। जबकि कुछ का कहना है कि पत्रकारिता का कीड़ा डॉ. साहब को लग जाने से उन्होंने ने स्वामी शरण जैसे सांप को पाल रखा है। दो वर्ष पहले तक स्वामी शरण श्रीवास्तव कानपुर के दैनिक जागरण कार्यालय में सुशोभित हुआ करते थे, लेकिन गन्दी आदतों और बुरी सोच के चलते जागरण ने उनसे किनारा कर लिया। मानसिक रूप से विकलांग स्वामी शरण गोण्डा जिले के हैं।

बीते वर्षो में स्वामी शरण श्रीवास्तव ने डॉ. उमेश पालीवाल से किताबों के नाम पर लाखों रुपये की राशि प्राप्त की है। जब डॉ. उमेश पालीवाल को ठगे जाने का एहसास हुआ तो उन्होंने एक आई नेक्स्‍ट टाइप समाचार पत्र निकालने की कार्य योजना तैयार की। उमेश पालीवाल ने विधिवत अपने कई दोस्तों से सम्पर्क किया। उनके कई डॉक्टर और पत्रकारिता में धमक रखने वाले लोगों ने सहयोग की हामी भरी। उमेश पालीवाल को मिल रहे सहयोगियों के समर्थन से स्वामी शरण को अपना वेद पर काम और कुर्सी डगमगाती नजर आई। उन्होंने तुरन्त पाशा फेकते हुए समाचार पत्र को मासिक पत्रिका में बदलने की लिये राजनीति करना आरंभ कर दिया और डॉक्टर को उलटे-सीधे मासिक पत्रिका के प्रलोभन देकर तैयार कर लिया। मासिक पत्रिका के नाम पर आईएसीएम जो डॉक्टर पालीवाल का फेन्चाइजी कम्प्यूटर संस्थान है वहां से चार-पॉच कम्प्यूटर उठाकर पास के एक केबिन में लगा दिये गये। फिर महेश झा जो एक प्रतिष्ठित अस्पताल में कार्यरत हैं तथा जिनका देश- प्रदेश के काफी डॉक्टरों से सम्पर्क हैं वे जुडे़। उन्होंने डॉक्टरों से सम्पर्क कर आर्टिकल एकत्र करने आरम्भ किये तो स्वामी शरण ने उनमें मीन-मेख निकालना आरम्भ कर दिया। जिससे उनमें अब दूरियां बढ़ गईं है। तथा विज्ञापन और सर्कुलेशन का काम देखने वाले महेश जस ने भी पगार ले कर सम्पूर्ण स्वास्थ्य पत्रिका से किनारा कर लिया है।

अब संस्थान में मात्र इंटर कर रहे गौरव और बीए प्रथम वर्ष की छात्रा हर्षिता ही सुबह नौ बजे से रात सात बजे तक पागल स्वामी शरण के साथ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और बेवसाइटों से देख-देख कर पत्रिका के पेज भरते हैं। स्वामी शरण की प्रिन्टर भक्ति प्रकाशन के मालिक विवेक मिश्र से भी नही बनती जिसके लिये उन्होंने अमर उजाला कानपुर में पेज बनाने वाले एक कर्मचारी से साठ-गांठकर वहां से क्वार्क एक्सप्रेस समेत कई साफ्टवेयर मंगवाये हैं। वही अब पेज आदि बनाने का कार्य कर रहा है। संस्थान में नौकरी के नाम पर नाबलिग छात्र-छात्राओं का रखकर उन्हें प्रताड़ित कर महीना पूरा होने पर बेइज्जत कर भगा दिया जाता है।

जोसेफ कॉसमॉस लोयल

 

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