पूरे पांच माह बीस दिन, बड़ा महुआ गांव के दलित परिवारों ने सामाजिक बहिष्कार झेला। हम जब उस गांव पहुंचे तब तक पांच महीने और 16 दिन बीत चुके थे। इस दौरान ग्रामीण जिला कलेक्टर से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगा चुके थे, मगर कहीं भी सुनवाई नहीं हुई। दलित व मानवाधिकार संगठनों की टोली जब बड़ा महुआ पहुंचकर पीड़ित परिवारों से मिली और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मामले को उच्च स्तर पर उठाने और आंदोलन की चेतावनी दिया तब जिला प्रशासन हरकत में आया।
हमने जिला कलेक्टर को दिए ज्ञापन में साफ शब्दों में बता दिया था कि एक हफ्ते में मामला नहीं सुलझने पर हम प्रचंड जनआंदोलन करेंगे। हमने सामाजिक बहिष्कार की इस शर्मनाक घटना पर एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट भी जारी की। साथ ही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य श्रीमती अरुणा राय, मनरेगा कौंसिल के सदस्य निखिल डे, केंद्रीय गृह राज्यमंत्री भंवर जितेंद्र सिंह तथा राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी ज्ञापन भेजकर पूरे घटनाक्रम से अवगत कराते हुए हस्तक्षेप की मांग की। सोशल साइटस पर भी इस बारे में लेख छपे, समाचार-पत्रों ने भी हमारे बड़ा महुआ पहुंचने को बड़ा समाचार बनाया।
इन सब बातों का नतीजा सुखद रहा, 28 फरवरी 2011 की रात, अतिरिक्त जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, उपखंड अधिकारी, तहसीलदार इत्यादि को लेकर बड़ा महुआ पहुंचे तथा ग्रामीणों के साथ एक रात्रि चैपाल की। जिसमें दोनों पक्ष के लोग मौजूद थे और दलित संगठनों के कार्यकर्ता भी स्थिति पर नजर रखने के लिए वहां पर उपस्थित थे। कुछ सांप्रदायिक संगठन के पदाधिकारी भी श्रेय लेने के लिए पहुंचे तथा मध्यस्थता करने का नाटक किया, जिस पर स्थानीय दलितों ने सवाल उठाया कि वे इतने दिन तक चुप क्यों रहे? पहले क्यों नहीं मध्यस्थता करने आए? अब जब दलित संगठनों की मांग और जिला प्रशासन की पहल पर ग्रामीणों के बीच सुलह हो रही है तो वे कहां से आ टपके? खैर, जिला कलेक्टर औंकार सिंह और कार्यवाहक पुलिस अधीक्षक राजेंद्र सिंह की मौजूदगी में दोनों पक्ष एक साथ बैठे। दोनों पक्षों ने गिले-शिकवे दूर किए, मन की गांठें खुली, सवर्णों को अपनी भूल का अहसास हुआ कि उन्होंने दलितों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। आपसी विवाद से गांव का विकास संभव नहीं है, मिल-जुलकर रहने में ही फायदा है। यह समझ जब बनी और संवाद हुआ, तो आपसी सहमति से सुलह हो गई तथा दलितों का बहिष्कार स्वतः ही समाप्त हो गया।
सुलह के बिंदु सम्मानजनक ही कहे जा सकते हैं। दोनों पक्षों के छह-छह लोगों की कमेटी ने तय किया कि वे भविष्य में इस गांव से किसी भी व्यक्ति के बहिष्कार की कोई शिकायत नहीं आएगी। जिला प्रशासन ने भी निर्देश दिए कि सुलह के बाद भी तीन दिन तक नायब तहसीलदार गांव में रहेंगे तथा समझौते के लागू होने पर निगरानी रखेंगे। इसके बाद भी स्थिति सामान्य नहीं हुई अथवा किसी व्यक्ति ने सामाजिक बहिष्कार जारी रखा तो जिला प्रशासन की ओर से मुकदमे दर्ज होंगे।
गांव की उपरोक्त संयुक्त कमेटी सभी दलितों को मनरेगा में काम हेतु प्रपत्र 6 भरवाएगी। जिससे 29 फरवरी से ही मनरेगा में काम मिलने लगेगा। जिन दलितों के मनरेगा में काम का भुगतान बकाया है, उनका भी शीघ्र ही भुगतान होगा। पीड़ित दलित रेगर समाज का सर्वे करवाकर एसडीएम तुरंत बीपीएल कार्ड बनवाएंगे। मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना का लाभ दलितों को मिलेगा। मनरेगा के मेट राधेश्याम को उसके पास रखे दलित परिवारों के जाब कार्ड भी तुरंत बांटने का निर्देश दिया गया। सार्वजनिक परिवहन में आ रही दिक्कत के मद्देनजर एक ट्रांसपोर्ट इंस्पेक्टर गांव में दूसरे दिन भी मौजूद रहा, जिसने दलितों का आटो व टैंपों में बैठना सुनिश्चित किया, नाईयों ने बाल काटने की हामी भरी तो होटल व रेस्टोरेंट संचालकों ने चाय, दूध व अन्य खाद्य पदार्थ देने का वादा किया। अनाज की पिसाई, प्रतिदिन जलापूर्ति आदि के लिए भी दलितों को आश्वस्त किया गया।
प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में यह भी तय हुआ कि ग्रामीणों की संयुक्त कमेटी अगर उचित मानेगी और लिखकर देगी तो दोनों पक्षों द्वारा दर्ज करवाए गए मुकदमे भी उठा लिए जाएंगे। इस प्रकार की सहमति के बाद जिला कलेक्टर औंकार सिंह दलित युवा जगदीश रेगर से गले मिले तथा बंशीलाल रेगर के घर पूरे सरकारी लवाजमे के साथ एक घंटे तक रूके। चाय पी तथा हर प्रकार की सहायता के लिए आश्वस्त किया।
बड़ा महुआ के दलित परिवारों ने इस फैसले पर प्रसन्नता जताई है तथा उन्होंने इस बात के लिए भी संतोष जाहिर किया कि दलित संगठनों के प्रयास तथा जिला कलेक्टर व प्रशासन के अन्य अधिकारियों द्वारा की गई कार्यवाही से उन्हें न्याय मिल पाया है। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार राजेश रवि ने अपनी त्वरित टिप्पणी में यह सवाल भी उठाया कि ‘‘बड़ा महुआ में पांच माह 20 दिन से चल रहा दलितों का बहिष्कार कलेक्टर ने दो घंटे की बातचीत के बाद निबटा दिया। सवाल यह उठता है कि अगर यह दो घंटे का काम था तो इसको करने में इतना समय क्यों लगा?’’
निश्चित रूप से इस सवाल से हमारी पूरी सहमति है मगर फिर भी यह मानना होगा कि जिला कलक्टर के इस प्रकार के प्रयास रंग ला रहे हैं जैसा कि इससे पूर्व उन्होंने आसींद क्षेत्र के करणगढ़ गांव के दलितों के सामाजिक बहिष्कार को खत्म करने में भी रात्रि चैपाल कर साहसिक कदम उठाया था। हां, यह बात भी सही है कि अभी भी भीलवाड़ा जिले में कई स्थान हैं जहां पर दलित इंसाफ के लिए संघर्षरत है। कहीं पर दलित महिलाएं डायन घोषित की जा रही हैं तो कहीं पर दलितों को गांव छोड़ने को मजबूर किया जा रहा है। मारपीट और जातिगत अपमान तो आम बात है ही। पुलिस द्वारा कार्यवाही में उदासीनता भी बड़ा मुद्दा है लेकिन जहां भी न्याय मिला है, उसकी सराहना की जानी चाहिए। बड़ा महुआ के 31 दलित परिवारों को मिले इंसाफ ने साबित किया है कि अगर प्रशासन की इच्छाशक्ति हो तो कोई भी गरीब, कोई भी दलित न्याय से वंचित नहीं रह सकता है। आवश्यकता बड़ा महुआ तथा करनगढ़ की तरह ही बड़े प्रशासनिक प्रयासों की है।
लेखक भंवर मेघवंशी ‘डायमंड इंडिया’ के संपादक हैं और दलित, आदिवासी एवं घुमंतु समुदायों के प्रश्नों पर राजस्थान में कार्यरत हैं। उनसे 09460325948 अथवा [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है


