क्या भारतेन्दु हरिश्चन्द्र बहुविवाह प्रथा के समर्थक थे? क्या वे धर्मांतरण के भी समर्थक थे? क्या वे मुस्लिम विरोधी नाटककार थे? लखनऊ में मंचित नाटक ‘गुलाम राधारानी के’ से भारतेन्दु की ऐसी छवि उभारी गई है, जिससे यह दिखाया जा सके कि वे मुस्लिम विरोधी कट्टर हिन्दुवादी, बहुविवाह प्रथा तथा धर्मांतरण के समर्थक स्त्री विरोधी नाटककार थे। इस सम्बन्ध में नाटक के कुछ संवादों पर गौर किया जा सकता है। नाटक का पात्र भारतेन्दु कहता है ‘विश्वनाथ मंदिर के पास जो मस्जिद है, वह हमें अच्छा नहीं लगता। हम चाहते हैं कि यह आँख का काँटा कोई दूर कर दे।’ पात्र इस काँटे को दूर करने की अपेक्षा विक्टोरिया के युवराज से करता है तथा उसमें वह भगवान ‘राम’ की छवि देखता है। उस राम की जिसने रावण का अन्त किया, अब विक्टोरिया के युवराज रूपी ‘राम’ विश्वनाथ मंदिर को इस मस्जिद से मुक्ति दिलायेंगे।
यह पात्र बहुविवाह के पक्ष में कई उदाहरण देते हुए कहता है ‘यह रीति तो प्राचीन काल से चली आ रही है। राजे महराजे तो कई कई विवाह करते आये हैं। देवी-देवताओं ने किये हैं। कृष्ण की तो 1008 पटरानियाँ थी।’ भारतेन्दु पात्र अपनी प्रेमिका को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करते हुए कहता है ‘आप यह पेशा छोड़ दीजिए। हिन्दू धर्म में आ जाइए। आपका नया नाम होगा- माधवी।’ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के जीवन पर यह नाटक किसी दक्षिणपंथी नाट्य संस्था ने किया होता तो यह बात समझ में आती लेकिन इस नाटक का मंचन भारतेन्दु के नाम पर गठित भारतेन्दु नाट्य अकादमी ने भारतेन्दु जयन्ती के अवसर पर 9 व 10 सितम्बर को लखनऊ में अकादमी के थ्रस्ट हॉल में किया। इसका निर्देशन प्रसिद्ध रंगकर्मी तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर ने किया। जब इस नाट्य मंचन को लेकर सवाल उठे तो अंकुरजी ने कहा कि इसमें रचनाकार का द्वन्द्व है और मेरा द्वन्द्व भी इसमें शामिल है। नाटक के ब्रोशर में नाटककार रामजी बाली का कहना भी द्रष्टव्य है। वह कहते हैं ‘इसमें लिखा गया काफी कुछ काल्पनिक खुराफत है जो शायद मेरी अपनी स्थिति को दर्शाते हैं।’ अर्थात इस नाटक के माध्यम से निर्देशक व नाटककार अपनी स्थिति और द्वन्द्व को सामने लाता है और इसे भारतेन्दु के जीवन पर आरोपित करता है।
किसी भी रचनाकार के अन्दर उसके अन्तर्विरोध होते हैं। भारतेन्दु में भी ऐसे अन्तर्विरोध मिल जायेंगे। रचनाकार को अपने विकास क्रम में ऐसे ही उबड़-खाबड़ रास्ते से गुजरना पड़ता है। इसी प्रक्रिया में वह अपनी राह बनाता है तथा उसके रचनात्मक व्यक्तित्व का विकास होता है। भारतेन्दु के जीवन में भी स्याह पक्ष हो सकते हैं। लेकिन उनका प्रबल पक्ष यह है कि वे ऐसे दौर के रचनाकार हैं जब देश गुलाम था तथा सामंती व पुनरुत्थानवादी मूल्य समाज में हावी थे। भारतेन्दु ने इन मनुष्य विरोधी मूल्यों के खिलाफ संघर्ष किया, सत्ता के खोखलेपन को उजागर किया, धार्मिक रुढ़ियों व पाखण्डों पर प्रहार किया। उन्होंने अभिजात्य रंगमंच की जगह जन नाटकों का विकास किया तथा अपने नाटकों के माध्यम से उन्होंने समाज के सत्य का उदघाटन किया। उनके साहित्य और नाटक का यही प्रबल पक्ष है। अपनी इन्हीं विशेषताओं की वजह से आज भी उनका साहित्य हमारे लिए अमूल्य निधि है। लेकिन अकादमी द्वारा उनकी जयन्ती के अवसर पर मंचित नाटक के माध्यम से उनके इस प्रबल पक्ष को नकारा गया। इसके विपरीत उन्हें कट्टर हिन्दूवादी, बहुपत्नी प्रथा के समर्थक, मुस्लिम विरोधी, सामंती मूल्यों का पोषक जैसा पेश किया गया।
सवाल है कि लेखकीय व निर्देशकीय स्वतंत्रता के नाम पर क्या लेखक व निर्देशक को ऐसी छूट मिलनी चाहिए? नटककार जिसे ‘काल्पनिक खुराफात’ कहता है, क्या यह उसके द्वारा सांस्कृतिक खुराफात नहीं है? फिर ऐसे सांस्कृतिक खुराफात को न्यायसंगत भी ठहराया जा रहा है। यही कारण है कि लखनऊ के सांस्कृतिक जगत में इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त हुई है। उर्मिल कुमार थपलियाल, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ, राजेश कुमार, अनिल रस्तोगी, के0 के0 वत्स, वीरेन्द्र यादव, कौशल किशोर आदि संस्कृतिकर्मियों ने अकादमी के इस ‘खुराफात’ का विरोध किया और भारतेन्दु नाटक अकादमी के इस कृत्य को भारतेन्दु का चरित्र हनन कहा है।
यह कोई पहली घटना नहीं है बल्कि मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती के वक्त भी अकादमी द्वारा मंचित नाटक ‘परदे मे रहने दो’ के द्वारा प्रेमचंद के चरित्र हनन का ऐसा ही प्रयास किया गया था। इस नाटक में प्रेमचंद को भ्रष्टाचारियों का दोस्त तथा अंग्रेज सत्ता का समर्थक के रूप में पेश किया गया था। भारतेन्दु के साथ भी यही कहानी दुहराई गई। इससे तो यही लगता है कि यह सब सुनियोजित है तथा अकादमी आज प्रतिक्रियावादी व अपसंस्कृति का केन्द्र बन गई है। इसके खिलाफ संस्कृमिकर्मियों की पहल जरूरी है ताकि अपनी विरासत की रक्षा की जा सके।
लखनऊ से कौशल किशोर की रिपोर्ट.


