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फर्जी मुठभेड़ के गुनहगार पुलिस वालों को फांसी.. सुप्रीम कोर्ट का बिलकुल सही फरमान

सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी मुठभेड़ के मामलों में बहुत ही सख्त रुख अपनाया है. राजस्थान के फर्जी मुठभेड़ के अक्टूबर २००६ के एक मामले की सुनवाई के दौरान माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में शामिल पुलिस वालों को फांसी दी जानी चाहिए. माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू  ने कहा कि अगर साधारण लोग कोई अपराध करते हैं तो उन्हें साधारण सज़ा दी जानी चाहिए लेकिन अगर वे लोग अपराध करते हैं जिन्हें अपराध रोकने  की ज़िम्मेदारी दी गयी है तो उसे दुर्लभ से दुर्लभ अपराध मान कर उन्हें उसी हिसाब से सज़ा दी जानी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी मुठभेड़ के मामलों में बहुत ही सख्त रुख अपनाया है. राजस्थान के फर्जी मुठभेड़ के अक्टूबर २००६ के एक मामले की सुनवाई के दौरान माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में शामिल पुलिस वालों को फांसी दी जानी चाहिए. माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू  ने कहा कि अगर साधारण लोग कोई अपराध करते हैं तो उन्हें साधारण सज़ा दी जानी चाहिए लेकिन अगर वे लोग अपराध करते हैं जिन्हें अपराध रोकने  की ज़िम्मेदारी दी गयी है तो उसे दुर्लभ से दुर्लभ अपराध मान कर उन्हें उसी हिसाब से सज़ा दी जानी चाहिए.

राजस्थान के इस मामले में पुलिस के बहुत बड़े अधिकारी भी शामिल हैं.दारा सिंह नाम के एक व्यक्ति को पुलिस ने यह कह कर मार डाला था कि वह हिरासत से भाग रहा था. जबकि उस व्यक्ति की पत्नी ने आरोप लगाया था कि  पुलिस ने सोचे समझे षड्यंत्र के तहत उसकी हत्या की थी. बात सुप्रीम कोर्ट तक पंहुच गयी और देश की सर्वोच्च अदालत ने सख्ती का रुख अपनाया और सी बी आई को आदेश दिया कि मामले की फ़ौरन जांच की जाए. अदालत ने आदेश दिया कि राज्य के अतिरिक्त पुलिस निदेशक ए के  जैन और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अरशद अली को भी गिरफ्तार करके उनसे पूछताछ की जाए. अभी सरकारी रिकार्ड में यह दोनों ही अफसर अपने को फरार दिखा रहे हैं.सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद देश में फर्जी इनकाउंटर के  मसले पर एक दिलचस्प बहस शुरू हो जायेगी. इन सवालों पर भी गौर करने की ज़रुरत है कि  फर्जी मुठभेड़ के मामलों में फौरी इंसाफ़ के चक्कर में कीं निर्दोष न मारे जाएँ. आने वालो दिनों में इस बात पर भी बहस होगी कि न्याय प्रशासन में मौजूद कमजोरियों का लाभ उठा कर असली अपराधी निर्दोष लोगों को फंसाने में कामयाब न हो जाएं.

इस बात में दो राय नहीं है कि आम आदमी को इंसाफ़ दिलवाने की कोशिश में पुलिस अपने अधिकारों का दुरुपयोग करती रहती है. लेकिन फर्जी मुठभेड़ों के कुछ ऐसे मामले भी प्रकाश में आये हैं जो सभ्य समाज के माथे पर कलंक से कम नहीं हैं.इस सिलसिले में एक संगमील मामला मुंबई की एक लडकी इशरत जहां का था जिसे गुजरात पुलिस के बड़े अधिकारी डी जी वंजारा ने तथाकथित आतंकियों के साथ अहमदाबाद में जून २००५ में फर्जी मुठभेड़ में मार डाला था. इशरत जहां  के घर वाले पुलिस की इस बात को मानने को तैयार नहीं थे कि उनकी लड़की आतंकवादी है. मामला अदालतों में गया और सिविल सोसाइटी के कुछ लोगों ने उनकी मदद की और जब सुप्रीम कोर्ट की नज़र पड़ी तब जाकर असली अपराधियों को पकड़ने की कोशिश शुरू हुई.

न्याय के उनके युद्ध के दौरान इशरत जहां की मां, शमीमा कौसर को कुछ राहत मिली जब गुजरात सरकार के न्यायिक अधिकारी, एस पी तमांग की रिपोर्ट आई जिसमें उन्होंने साफ़ कह दिया कि इशरत जहां को फर्जी  मुठभेड़ में मारा गया था और उसमें उसी पुलिस अधिकारी, वंजारा का हाथ था जो कि इसी तरह के अन्य मामलों में शामिल पाया गया था. एस पी तमांग की रिपोर्ट ने कोई नयी जांच नहीं की थी, उन्होंने तो बस उपलब्ध सामग्री और पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट के आधार पर सच्चाई को सामने ला दिया था. इशरत जहां के मामले में मीडिया के एक वर्ग की गैर जिम्मेदाराना सोच भी सामने आ गयी थी. अपनी बेटी की याद को बेदाग़ बनाने की उसकी मां की मुहिम को फिर भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था में विश्वास हो गया.

हालांकि एसपी तमांग की रिपोर्ट आने के बाद इशरत जहां की माना शमीमा कौसर ने बहुत कोशिश की. निचली अदालतों से उसे कोई राहत नहीं मिली. शमीमा कौसर ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार की और देश की सर्वोच्च अदालत का फैसला आया तब जाकर इशरत जहांइशरत जहां  केस के फर्जी मुठभेड़ से सम्बंधित सारे मामले रोक दिए गए. इस स्टे के साथ ही मामले को जल्दी निपटाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गयी है.  एसपी तमांग की रिपोर्ट में तार्किक तरीके से उसी सामग्री की जांच की गयी थी जिसके आधार पर इशरत जहां के फर्जी मुठभेड़ के मामले को पुलिस अफसरों की बहादुरी के तौर पर पेश किया जा रहा था. तमांग की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि जिन अधिकारियों ने इशरत जहां को मार गिराया था उनको उम्मीद थी कि उनके उस कारनामे से मुख्य मंत्री बहुत खुश हो जायेंगें और उन्हें कुछ इनाम -अकराम देंगे. अफसरों की यह सोच ही देश की लोकशाही पर सबसे बड़ा खतरा है. जिस राज में अधिकारी यह सोचने लगे कि किसी बेक़सूर को मार डालने से मुख्य मंत्री खुश होगा, वहां आदिम राज्य की व्यवस्था कायम मानी जायेगी.

यह ऐसी हालत है जिस पर सभ्य समाज के हर वर्ग को गौर करना पड़ेगा वरना देश की आज़ादी पर मंडरा रहा खतरा बहुत ही बढ़ जाएगा और एक मुकाम ऐसा भी आ सकता है जब सही और न्यायप्रिय लोग कमज़ोर पड़ जायेंगें. ज़ाहिर है ऐसी किसी भी परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए सभी लोकतांत्रिक लोगों को तैयार रहना पड़ेगा. अगर ऐसा न हुआ तो सत्ता का बेजा इस्तेमाल करने वाले हमारी आज़ादी को तानाशाही में बदल देंगें. ऐसा न हो सके इसके लिए जनमत को तो चौकन्ना रहना ही पड़ेगा, लोकतंत्र  के चारों स्तंभों, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया को भी हमेशा सतर्क रहना पडेगा.

राजस्थान के मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस सी के प्रसाद की बेंच ने ने निचली अदालत के ११ अप्रैल के उस आदेश पर सख्त एतराज़ किया जिसमें नए सिरे से एफआईआर लिखने का फैसला सुनाया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सीबीआई मामले की जांच कर रही थी तो नए एफआईआर का कोई मतलब नहीं है. जबकि सीबीआई की जांच सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही शुरू की गयी थी. लेकिन यह उम्मीद करना भी असंभव है कि सुप्रीम कोर्ट हर मामले को संज्ञान में लेगी. ज़रूरत इस बात की है कि देश का हर नागरिक अन्याय के खिलाफ हमेशा चौकन्ना रहे और अगर ज़रुरत पड़े तो आम आदमी लामबंद होकर न्याय के लिए आन्दोलन तक करने के लिए तैयार रहे.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स अखबार के नेशनल ब्यूरो चीफ के रूप में कार्यरत हैं.

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