दिल्ली का बस बलात्कार कांड-रोंगटे खड़े कर देने वाला, दिल दहला देने वाला। अगर जानवरों के पास जुबान होती तो वे भी शायद जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते, चिल्ला-चिल्लाकर कहते कि इन हैवान बलात्कारियों को जानवर और दरिंदा बताकर जानवर और दरिंदों का अपमान मत करो। इनकी प्रजाति हमारे जंगलों में नहीं पाई जाती, इंसानों के तैयार किए जंगल में पाई जाती है। अब सारे देश में इन हैवानों के लिए एक ही कोरस गूंज रहा है-फांसी दो, फांसी दो। सड़क चीख रही है- फांसी दो। मीडिया इस कोरस में अपना सुर मिलाते हुए इसे जैसे शहर-शहर, गांव-गांव, बस्ती-बस्ती पहुंचाने पर आमादा
है। जरूर फांसी दो मगर फांसी के नाम पर कुहासा पैदा मत करो। थोड़ा संतुलित होकर सोचो कि बलात्कारियों को फांसी पर लटका देने से क्या सचमुच बलात्कार रुक जाएंगे? क्या फांसी के कानूनी प्रावधान का भय सचमुच इतना बड़ा होगा कि यह दरिंदा प्रजाति सहम कर अपनी मांदों में सरक जाएगी? अगर ऐसा होता तो जिन अपराधों के लिए फांसी का दंड विधान मौजूद है; वे अपराध तो सिरे से गायब हो गए होते। तब न तो कोई हत्या होती, न दंगों में लोग मारे जाते, न आतंकी कुत्सा के शिकार होते!
किसी भी ऐसे कांड पर रंडापा खड़ा करना मीडिया की व्यावसायिक मजबूरी है लेकिन हमारे कथित कद्दावर राजनीतिकों, समाजविदें, सामाजिक संगठनों, मनोवैज्ञानिक जमातों की ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि उन्होंने अपने सारे स्वर इस हाहाकारी फांसी कोरस के हवाले कर दिये हैं। वे इंसानी चेहरों वाले दरिंदों को तो फांसी पर चढ़ाने की बात कर रहे हैं पर उनकी तरफ इशारा भी नहीं कर रहे जो ऐसे खूंखार दरिंदों के रहने-विचरने के लिए समूचे समाज को ही एक डरावने जंगल में तब्दील करने पर आमादा हैं। एक पल ठहरकर उन्हें यह तो सोचना चाहिए कि पकड़े गए बलात्कारियों के जैसे निरीह मां-बापों की औलादों को कौन दरिंदगी के सांचे में ढाल रहा है और क्यों? इस देश के तमाम धन पशुओं और सत्ता पशुओं के विपरीत जो अपनी बेलगाम औलादों की घिनौनी हरकतों पर, उनके द्वारा किए गए हत्या- बलात्कार जैसे कुत्सित अपराधों पर, पर्दा डालने के लिए पुलिस-अदालत सबको नचा डालते हैं। इन बलात्कारियों के मां-बापों में इतनी शर्म और संस्कारिता तो है कि वे स्वयं अपने कोखजायों को सजा देने की बात कर रहे हैं। आखिर ऐसे बेबस-लाचार और झुग्गियों में रहने वाले परिवारों के बच्चों को कौन पशु बना रहा है? और क्यों ये औलादें अपनी सारी करुणा, संवेदना को तिलांजलि देकर ऐसी हैवानियत को अपना चरित्र बना लेती हैं कि उन्हें एक औरत की देह सिर्फ नोचने और फाड़कर खा जाने की चीज नजर आती है। इस देश के किसी भी शहर-गांव को देख लीजिए : बेपढ़े, धनविहीन, बेरोजगार युवकों की जमातें इधर से उधर हाथ-पांव मारती नजर आ जाएंगी। नपुंसक सरकारों के पास न इन्हें शिक्षित करने की कोई व्यवस्था है, न इन्हें सामाजिक संस्कार देने की और न समुचित रोजगार देने की। ऐसे में ये लंपट सामंती मानसिकता वाले और हर अनुचित धंधे से पैसा बनाने को आतुर उन धन पशुओं के आसान शिकार बन जाते हैं, जो एक ओर तो राजनेताओं से
गठजोड़ किए रहते हैं और दूसरी ओर पुलिस-प्रशासन से।
सामान्य जनता तो मनमाने ढंग से पैसा वसूलने तथा आम लोगों को धौंसियाने-धमकाने के लिए इन्हें जो सस्ती सुलभ कर्मचारी फौज चाहिए होती है, वह उन्हें इन्हीं अनपढ़-अशिक्षित बेरोजगार युवकों से मिलती है। किसी भी ठेकेदार के यहां, किसी भी राजनेता के दरवाजे पर आपको इन युवकों की जमातें घिरी हुई मिल जाएंगी। यहां इन्हें चंद पैसों और कानून से अवैध संरक्षण के बल पर बाकायदा जानवर होने का प्रशिक्षण दिया जाता है। अगर इनकी नियुक्ति किसी बस या टेम्पों के ड्राइवर या कंडक्टर के रूप में की गई है तो इन्हें सिखाया जाता है कि नियम-कानूनों को धता बताकर मालिकों के लिए कैसे पैसा कमाया जाता है, कैसे अपराध-दर-अपराध करते हुए भी मालिक के रसूख के बल पर उन्मुक्त विचरा जा सकता है, कैसे सारी नैतिकताओं-मर्यादाओं और मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर जिंदगी को सिर्फ हुक्म बजा लाने वाली गुलामी में रूपांतरित किया जाता है। इस फौज के सिपहसालार भी लंपट अर्थव्यवस्था की चकाचौंध से प्रभावित होते हैं, इन्हें भी अपने तई थोड़ी मौज- मस्ती की जरूरत होती है, दारू-औरत की इनको भी ख्वाहिशें होती हैं; मगर इनके पास मालिक धन पशुओं के जैसी एकांतिक अय्याशगाहें नहीं होतीं। तब इन्हें जो चाहे जहां मिले, उसे ये अपना शिकार बना डालते हैं। इनकी जद में अगर कोई पुरुष आता है तो उसका पैसा लूटने से नहीं चूकते और कोई औरत आ जाए तो उसकी देह लूटने से। जब ये छोटे-मोटे कांड करते हैं तो इनके आका इन्हें आसानी से बचा लेते हैं। इस बचाव से बुलंद हौसला हुए ये लोग जब कोई बड़ा आपराधिक कृत्य कर डालते हैं, जिस पर मीडिया को खुल कर खेलने का अवसर प्राप्त होता हो, तब इनके आका आसानी से इनसे पल्ला झाड़ लेते हैं। बस बलात्कार कांड एक ऐसा ही कुकृत्य है। निठारी कांड बस बलात्कार कांड से कई गुना वीभत्स था। उस समय भी यह फांसी-कोरस उठाया। मगर क्या हुआ? अगर कोरस से कुछ बदलना होता तो अब तक बदल चुका होता। दरअसल, कोरस में शामिल होना एक बात है और जो समाज को दरिंदे पैदा करने वाला जंगल बनाने के ठेके लिए हुए हैं, उनसे लोहा लेना बिल्कुल दूसरी बात।
लेखक अरशद अली खान पत्रकार हैं.


