
Rajendra Yadav : आज 31 दिसंबर यानी वर्ष का अंतिम दिन। ना जाने कब से मैं नये साल का स्वा्गत दोस्तों के साथ मिलकर करता रहा हूं। खाना-पीना, हंसी-मजाक के साथ हमलोग 12 बजे के बाद अपने-अपने घरों की राह लेते थे। मगर आज मेरा मन किसी को बुलाने का नहीं है और मैं अकेले ही अपने भीतर रहकर यह वर्षांत मनाने जा रहा हूं। दामिनी की मत्यु ने मुझे अवसन्न कर दिया है। कितनी यातनायें भुगत कर उसने अंतिम सांस ली होगी। तय नहीं कर पा रहा हूं कि उसके हत्यारों को क्या सज़ा दी जाए। फांसी एक आसान समाधान है। वह अपराध की नहीं, अपराधी की समाप्ति का प्रतीक है। हमारी कोशिश अपराध को समाप्त करने की है। अगर रेप के अपराधी को फांसी की सज़ा होगी तो निश्चय ही वह रेप के बाद लड्की की हत्या कर देगा।
हत्या के बाद लाश को ठिकाने लगा देगा ताकि कानून के लिए कोई प्रमाण ही न बचे। ऐसे अपराधी पुरुष परिवार में बचपन से ही तैयार किये जाते हैं। जहां लड्का मालिक है और उसे सबकुछ करने की छूट है। वह अपने से नीची जाति वालों के लिए हमेशा एक आतंक है। गांवों में तो सवर्ण घरानों के लड्के अक्सर ही खेतों में काम करने वाली लड्कियों को पकड् कर रेप कर डालते हैं और कोई कुछ नहीं बोलता। जानते परिवारवाले भी हैं। यही प्रशिक्षण दामिनी जैसों के अंगभंग के रूप में सामने आता है। मेरे ख्याल से यह सज़ा दस-पंद्रह साल जेल की होनी चाहिए ताकि अपराधी पश्चाताप, आत्मधिक्कार और आत्ममविश्लेषण की मारक प्रक्रिया से गुजर सके।
निश्च्य ही फांसी इसका इलाज नहीं है। ना ही इसका इलाज वह है जो राष्टपति के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने बताया है कि लड़कियां जींस पहन कर डिस्को में जाती हैं, और डांस करती हैं। आवारा लड्कों के सामने वे एक प्रलोभन की तरह आती हैं और इसलिए वे रेप जैसा जघन्य अपराध कर बैठते हैं। इस हिसाब से तो हर लड्की को सिर्फ बुरका पहनना चाहिए। महिलाओं के प्रति यह सोच मध्यकालीन है। लड़कियां पढ़ेंगी-लिखेंगी, आत्मनिर्भर होंगी और विभिन्न पेशों में जाएंगी तो उन्हें अपने कपड़े भी वैसे ही सुविधाजनक पहनने होंगे। हमें उन्हें बर्दाश्त करने और उनका सम्मान करने के प्रशिक्षण से गुजरना होगा। हमारा वर्तमान समाज भूखे भेडि़यों और निरीह मेमनों से मिलकर नहीं बना है, बनना भी नहीं चाहिए।
जाने-माने साहित्यकार राजेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.


