प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही फैजाबाद जनपद के एक बाहुबली नेता जो की अभी जेल में निरुद्ध हैं, के नाम का सिक्का चल रहा है। कहने को तो विधायक जी जेल में है पर काम बाहर का पूरा करते हैं। हाँ, तरीका थोड़ा अलग है लेकिन लोगों को पसंद भी आ रहा है। बताते हैं कि काम कोई भी हो, किसी भी विभाग का हो या फिर किसी भी अधिकारी द्वारा न किया जा रहा हो बस जेल की मुहर दिखाइए कम शत प्रतिशत गारंटी के साथ होगा। किसी अधिकारी की क्या मजाल कि जेल की मुहर देखने के बाद काम को न करे! तो बस अब लोगों ने इस तरीके का सफलतापूर्वक प्रयोग करना सीख लिया है और बेरोकटोक अपना काम करवा रहे हैं। पता नहीं जेल के भीतर से बाहर निकलने के लिए बेचैन विधायकजी को जनपद में चल रहे उनके नाम के इस दुरुपयोग के बारे में पता है भी या कि नही, हमें नहीं पता, लेकिन भरोसा इसलिए नहीं होता कि जब जेल के भीतर रहकर विधायक जी पूरे चुनाव क्षेत्र को बारीकी से देखते थे, तो क्या इतनी छोटी बात उन्हें नही पता होगी?
काफी समय कांग्रेस में अपनी सेवा दे चुके और चुनाव के समय समाजवादी पार्टी में सामिल हुए एक विशेष जाति के नेता ने तो यहां तक कहा कि मैंने तो जेल की मुहर की ताक़त खुद आजमा कर देखा है। लोग कहते थे तो भरोसा ही नहीं होता था लेकिन एक दिन मैंने सोचा कि लोगों द्वारा कही जा रही बात की परख तो की जानी चाहिए। मैं खुद जेल गया लोगों की सुबह से लाइन लगी थी। ज्यादातर लोग बाहुबली विधायक जी से मिलने की पर्ची लगा रहे थे। बाद में माज़रा समझ में आया कि इनमें से कुछ ही लोग उनसे मिलने वाले थे बाकी तो बस मुहर लगवाकर चलते बन रहे थे। क्यूंकि उनका काम तो बस मुहर लगवाकर ही पूरा हो चुका था। मैंने भी मुहर लगवाया और सीधे जिला अस्पताल आ गया, जहां एक गांव से आये मरीज़ का इलाज करना था। उन्होंने बताया कि पहले तो मैं जाकर जब अस्पताल के अधीक्षक से मिला अपना परिचय दिया और समस्या बताया तो उसने लोड ही नहीं लिया। मैं खिसिया सा गया लेकिन तभी मुझे जेल के मुहर की याद आई, जो मैंने जेल जा कर लगवाया था। मैंने दांव खेल ही दिया और अस्पताल के अधीक्षक को अपने हाथ की तरफ इशारा करके मुहर दिखाया तो लगा कि उन्हें जैसे सांप सूंघ गया हो, उन्होंने तुरंत मुझे बैठाया पानी पिलाया और मेरा काम करते हुए कहा कि नेता जी आप नाहक जेल जाने की ज़हमत उठाते हैं। आखिर हम आपकी सेवा के लिए ही तो यहां बैठे हैं। कोई भी काम हो पहले मेरे पास आइये, न हो तब जेल जाइये। अब तो आपको शयद यकीन हो गया हो कि जेल की मुहर में कितनी ताक़त है।
कुंवर समीर शाही फैजाबाद में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


