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दुख-सुख

बकरीद : त्याग और कुर्बानी का त्यौहार

“ अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह के सिवा कोई माबूद (पूज्य नहीं) अल्लाह ही सबसे बड़ा है, सारी तारीफें अल्लाह के लिए हैं।“ दुनियां के तमाम मुसलमान इसी तकबीर को पढ़ते हुए और अपने रब की बड़ाई बयान करते हुए घरों से ईदगाह की तरफ ईदुल अजहा यानि बकरीद की नमाज अदा करने के लिए खुशी-खुशी जाते हैं। त्याग व कुर्बानी का त्यौहार बकरीद इस्लामी साल के आखिरी महीने जिल हिज्जा की दसवीं तारीख को मनाया जाता है। यह त्यौहार खसतौर से कुर्बानी का पर्व है। बकरीद उस महान कुर्बानी की याद दिलाता है जिसे अल्लाह के पैगम्बर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की राह में पेश किया।

“ अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह के सिवा कोई माबूद (पूज्य नहीं) अल्लाह ही सबसे बड़ा है, सारी तारीफें अल्लाह के लिए हैं।“ दुनियां के तमाम मुसलमान इसी तकबीर को पढ़ते हुए और अपने रब की बड़ाई बयान करते हुए घरों से ईदगाह की तरफ ईदुल अजहा यानि बकरीद की नमाज अदा करने के लिए खुशी-खुशी जाते हैं। त्याग व कुर्बानी का त्यौहार बकरीद इस्लामी साल के आखिरी महीने जिल हिज्जा की दसवीं तारीख को मनाया जाता है। यह त्यौहार खसतौर से कुर्बानी का पर्व है। बकरीद उस महान कुर्बानी की याद दिलाता है जिसे अल्लाह के पैगम्बर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की राह में पेश किया।

 

बात तकरीबन चार हजार साल पहले की है, हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम इराक के रहने वाले थे। अल्लाह ने उन्हें ख्वाब में बशारत दी की वह अल्लाह की राह में कुर्बानी पेश करें। इस पर उन्होंने अल्लाह की राह में उंट की कुर्बानी दी लेकिन उसके बाद भी उन्होंने सपना देखा कि अल्लाह उनसे कुर्बानी चाहता है। ख्वाब में उन्होंने यह भी देखा कि वह अपने बेटे को जिब्ह यानि बलि कर रहे हैं। लगातार तीन दिनों तक यही ख्वाब दिखायी देता रहा। बुढ़ापे में उन्हें लड़का पैदा हुआ था जो कि 13 साल का होने वाला था। वे समझ गये कि अल्लाह का हुक्म है वे अपने बेटे की कुर्बानी दें। अल्लाह मतलब ईश्वर का हुक्म जानकर कुर्बानी की खातिर राजी हो गये। हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने सोचा कि क्यों न कुर्बानी से पहले बेटे से राय ले ली जाए। जब आपने अपने बेटे इस्माईल को बताया तो उन्होने कहा कि अगर खुदा ऐसा चाहता है तो मुझे अपनी कुर्बानी पेश करने में कोई दिक्कत नहीं है। आप खुदा के हुक्म को पूरा करें।

 

इसके बाद बाप इब्राहीम अलैहिस्सलाम व बेटा इस्माईल अलैहिस्सलाम दोनों लोग जंगल की तरफ छुरी लेकर चल दिए रास्ते में शैतान दोनों लोगों के दिलों में बसवसे यानि भ्रम डालता है, बहकाने की कोशिश करता है कि बुढ़ापे में एक लड़का पैदा हुआ और तू उसे कुर्बान करने चला है। मगर वे तनिक न डिगे। सुनसान जंगल में एक बाप खुद के 13 साल के बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान करने के लिए लिटाता है और बेटे की आंख पर पट्टी बांधते हैं इसके बाद अल्लाह का नाम लेकर बेटे की गर्दन पर छुरी चला देते हैं। छूरी चलाने के बाद जब आंख से पट्टी खोलते हैं तो क्या देखते हैं कि बेटे की जगह दुम्बा यानि भेडे के शक्ल का जानवर की कुर्बानी हो गई। उसी वक्त अल्लाह ने फरमाया कि ’’ ऐ इब्राहीम ख्वाब में दिए मेरे हुक्म को तुमने पूरा किया। इस मुश्किल इम्तिहान में तुम खरे उतरे, हमने तुम्हारी कुर्बानी कुबूल की। अल्लाह ने आपके ख्वाब को सच कर दिखाया है।“ उसी समय से इदुल अजहा यानि बकरीद के नमाज के बाद से कुर्बानी की रस्म चली आ रही है।

 

बकरीद की नमाज के बाद लोग आपस में गले मिलकर खुशी-खुशी घर वासप आते हैं और अपने पालतू जानवर जिसमें बकरा, उंट, दुम्बा आदि की कुर्बानी

अल्लाह की राह में पेश करते हैं। उन सभी मुसलानों पर कुर्बानी जरूरी है जो जकात देते हैं और समर्थ हैं। कुर्बानी के जानवर में न कोई एैब हो और न ही कोई बीमारी। कुर्बानी के जानवर का गोस्त यानि मांस अपने सगे सम्बंधियों, पड़ोसियों, मिस्कीनों, गरीबों में बांटा जाता है। खस बात यह है कि कुर्बानी के जानवर का मांस व खाल जानवर काटने वाले को मजदूरी में देना नाजायज है। कुर्बानी सिर्फ जानवर को जिबह करने देना ही नहीं बल्कि इसका मकसद
अपने कीमती व महबूब चीज को अल्लाह की राह में कुर्बान करना है। कुरान पाक में अल्लाह ने फरमाया है कि ’’अल्लाह को आपके गोश्‍त यानि मांस और खून की हाजत व जरूरत नहीं है, अल्लाह तो आपके तकवे व दिल को देखता है। जिसका मिशाल इब्राहीम ने पेश किया है।’’

 

मौलाना खालिद खां बताते हैं कि ‘कुर्बानी का मकसद इंसान में अल्लाह की ऐसी मुहब्बत व ईश भय पैदा करना है ताकि इंसान अल्लाह की राह में पवित्र व कीमती चीज भी कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहे और बड़ी-बड़ी कुर्बानी देने के लिए हिम्मत व साहस रखे।’ ईदुल अजहा यानि बकरीद पूरी तरह से खुदा यानि ईश्वर के हुक्म का पालन करना तथा उसके लिए बड़ी से बड़ी और कीमती व अजीज चीज को न्यौछावर करने का संदेश देता है।

 

लेखक एम अफसर खां सागर पत्रकार हैं.

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