लखनऊ का 5ए कालिदास मार्ग जहाँ देश के सबसे बड़े सूबे के सेनापति का आवास है। यूं तो पिछले पाँच वर्ष से यहाँ का रास्ता आम लोगो के लिए बंद था पर अब यहाँ एक अलग ही महौल है, हर कोई इस मार्ग का प्रयोग अब कर सकता है। एक रिक्शा वाले से पूछने पर वह बड़े गर्व से बताता है कि अब हम भी मुख्यमंत्री अवास के सामने से जा सकते हैं और ऐसा भैया के वजह से संभव हुआ है। यूपी में आज हर सपा कार्यकर्ता भैया के गुण गा रहे है कहते है उन्हीं की वजह से तो हम सत्ता में है आज। भैया यनी कि अखिलेश यादव। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले सरगर्मियां तेज थी, क्योकि भ्रष्टाचार और मुख्यमंत्री का लोगों से दूर रहने के कारण 17 वर्ष बाद बनी पूर्ण बहुमत की बसपा सरकार का जाना तय था। ऐसे में लोगो के बीच चर्चा का विषय था इस बार सूबे की कमान किसके हाथ होगी? अगर हम इस चुनाव में देखे तो युवा चेहरा काफ़ी देखने को मिला कांग्रेस के युवराज राहुल, सपा के अखिलेश और रालोद के जयंत चौधरी लेकिन मुख्य लड़ाई राहुल और अखिलेश के बीच देखने को मिली। एक बेहद शांत स्वाभाव का तो दूसरा एंग्री यंग मैन।
इन दोनों के बीच जनता का कयास कि इन दोनों भइया में से सूबे का सरताज कौन होगा? कुछ ने राहुल भइया का नाम लेना मुनासिब समझा तो कुछ ने अखिलेश भैया का वहीं कुछ लोग ऐसे भी रहे जिन्होंने कहा कि दोनों भइया मिल कर प्रदेश की तरक्की करेंगे। खैर 6 मार्च को परिणाम आते ही एक भइया दिल्ली में हार की जिम्मेदारी लेते मीडिया के सामने दिखे वही दूसरे भैया राजभवन में सरकार बनाने का दावा करते मिले। जैसे ही सपा को प्रचंड बहुमत मिला लोगों के बीच कयासों का दौर चल पड़ा कि युवा नेतृत्व होगा या फिर नेता जी (मुलायम) ही गद्दी संभालेंगे? 9 मार्च तक अखिलेश यादव जहाँ अपने पिता के नेतृत्व का भरोसा दे रहे थे, वहीं दस मार्च को आचनक से उनके नाम की मुहर लगती दिखी और अंत: उनके नाम की घोषणा भी हो गई। और इसी के साथ वह बन गये देश के सबसे बड़े सूबे के सबसे नौजवान सेनापति। अखिलेश के चुनाव में किये मेहनत का फल उन्हें मिल चुका था पर यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें कई कुर्बानियाँ भी देनी पड़ी। तीन साल पहले अगर हम जा कर देखें तो किसी को यहाँ यकीन नहीं था कि सपा सरकार बना पायेगी पर आज यह हकीक़त है।
2009 तक सपा गुंडों की पार्टी हुआ करती थी, जिसका खमियाजा उसे 2007 के विधानसभा में उठाना पड़ा और सपा को तब और मुंह की खानी पड़ी जब अखिलेश यादव के इस्तीफे के बाद रिक्त हुई फिरोजाबाद सीट पर बहू डिंपल को चुनाव लड़ाना मुलायम को भारी पड़ा और पूर्व समाजवादी और कांग्रेसी राजब्बर के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। पार्टी की जम कर किरकिरी हुई। पत्नी के हार के बाद तिलमिलाये अखिलेश पार्टी की छवि सुधारने के लिए जमीनी कसरत में लग गए, और उन्होंने 2012 के विधानसभा चुनाव के लिए वहीं से कमर कस ली। उन्होंने चुनाव में टिकट के लिए प्रत्याशियों के इंटरव्यू लिए और बाहुबली लोगों के बजाये स्वच्छ छवि और युवाओं को टिकट देना मुनासिब समझा हालांकि उनके इस फैसले से पार्टी के अंदर भी दरार देखने को मिली, जहाँ अखिलेश ने टिकट को लेकर अपने चाचा शिवपाल यादव की भी नहीं सुनी और बाहुबली डीपी यादव को पार्टी में नहीं शामिल कर कड़ा कदम उठाया। पार्टी को हाईटेक बनाने और ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ने के लिए उन्होंने कंप्यूटर और सोशल नेटवर्किंग का भी जम कर प्रयोग किया। इन सब के अलावा अखिलेश ने अपनी अलग युवा टीम बनाई जिसमें उन्होंने पढ़े-लिखे और स्वच्छ छवि वाले युवाओं को तरजीह दी।
अखिलेश के युवा टीम में शामिल आनंद भदौरिया 35 साल का यह वही युवा है, जिसे लखनऊ में आंदोलन के दौरान तत्कालीन डीआईजी डीके ठाकुर ने बड़ी बर्बरता से अपने बूट से कुचला था और वह तस्वीर पूरे राष्ट्र में मीडिया के जरिये दिखी और सुर्खियां बनी। उसी सुर्खियों का फायदा हुआ आनंद भदौरिया को और अखिलेश ने उन्हें तत्काल समाजवादी लोहिया वाहिनी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से नवाज़ दिया। एक और युवा जिसने सपा की नाउम्मीद को हकीक़त में बदल दिया वो है पवन पांडे। लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक और पूर्व छात्र नेता जिसे अखिलेश ने फैजाबाद के अयोध्या सीट से प्रत्याशी बनाया, जहाँ भाजपा 1991 से काबिज थी। पवन के पास चुनाव लड़ने के पैसे नहीं थे, अखिलेश ने उन्हें चुनाव में हर सुविधा मुहैया करायी। पवन उस वक्त भी सुर्खियों में आये जब चुनाव आयोग ने उनकी शादी यह कहते हुए टाल दी कि चुनाव का खर्च शादी में दिखा दिया जायेगा लिहाजा शादी चुनाव बाद हो। चुनाव हुआ और परिणाम आया तो पवन अयोध्या के नये नेता बनकर उभरे। एक और बड़ा नाम बनकर उभरा इस चुनावा में वो था अभिषेक मिश्रा का, आईआईएम अहमदाबाद में एसोसिएट प्रोफेसर और पूर्व आईपीएस अधिकारी के पुत्र, अखिलेश ने उन्हें चुनाव लड़ने को राजी किया और लखनऊ से प्रत्याशी बनाया तो विपक्ष ने भी चुटकी ली कि अब एसी में रहने वाले जनता की सेवा करेंगे परंतु नतीता आया तो परिणाम पक्ष में था।
इन सब के अलावा अखिलेश के चुनाव में जिसने महत्वपर्ण भूमिका निभाई उनमें रेडियो मिर्ची के जॉकी नावेद सिद्दीकी, अखिलेश के रथ यात्रा में उनके साथ हर जगह नज़र आने वाले संजय लाठर, एएमयू अलीगढ़ के पूर्व छात्र अध्यक्ष नफीस अहमद और यूपी में छात्रसंघ का आवाज बुलंद करने वाले सुनील यादव ’साजन’ प्रमुख थे। इनके अलावा खुद अखिलेश ने भी काफी मेहनत की और लोगों से खुद साक्षात होने के लिए निकल पड़े क्रांति रथ लेकर। कभी रथ से तो कभी साइकिल से अखिलेश जहाँ-जहाँ भी गये लोगों का भारी हुजूम देखने को मिला। इसके अलावा अखिलेश सपा में हुये पूर्व में गुडांगर्दी के लिए मांफी भी मांगी और लोगों को विश्वास दिलाया इस बार उनकी सरकार कोई ग़लती नहीं करेगी। लोगों को अखिलेश की यह शैली पंसद आई और जनता ने उन्हें प्रंचड बहुमत से नवाज कर सर आँखों पर बैठाया। इस बार का चुनाव जहाँ अखिलश के लिए कई संभावनायें ले कर आया वहीं राहुल के लिए सबक ले कर आया कि प्रदेश की राजनीति परदेश में बैठ कर नहीं होती। बहरहाल अब इस प्रदेश को नौजवान नेता मिल गया है लेकिन उसके आगे कई चुनौतियां भी हैं और उन्हें इन सारी चुनौतियों से पार पाना होगा और पिछड़ते प्रदेश को विकास की ओर अग्रसर करना होगा। अगर अखिलेश इन सारी चुनौतियों से पार पा लिया तो आने वाले कई चुनाव अपने नाम कर सकेंगे अन्यथा ये जनता सब जानती है और अगले चुनाव में उनका भी वही हश्र हो सकता है जो इस वक्त उनके विरोधीयों का है।
लेखक अविनाश तिवारी इलाहाबाद विश्वद्यिलया के छात्र हैं.


