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बथानी टोला की पीड़ा और भूमिहारों की ठसक

दोस्तों, पिछले दिनों जब मुझे दिल्ली में वनवास से अस्थायी मुक्ति मिली और मैं पटना आ रहा था, तब एक दिलचस्प घटना घटी। मैं जिस डब्बे में सवार था, उस डब्बे के लोग राजनीतिक रुप से अधिक जागरुक थे। उनकी जागरुकता के कारण ही देर रात तक मुझे अनचाहे वचन सुनने पड़े। सुबह होने पर उनका व्याख्यान शुरु हो गया। हालांकि देर रात के राजनीतिक प्रवचन की तुलना में सुबह में हो रही वार्तालाप कुछ अधिक कर्णप्रिय लगी। वे बथानी टोला के बारे में बात कर रहे थे। सभी नीतीश सरकार के उस बयान का विरोध कर रहे थे, जिसमें सरकार ने बथानी टोला के फ़ैसले के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी।

दोस्तों, पिछले दिनों जब मुझे दिल्ली में वनवास से अस्थायी मुक्ति मिली और मैं पटना आ रहा था, तब एक दिलचस्प घटना घटी। मैं जिस डब्बे में सवार था, उस डब्बे के लोग राजनीतिक रुप से अधिक जागरुक थे। उनकी जागरुकता के कारण ही देर रात तक मुझे अनचाहे वचन सुनने पड़े। सुबह होने पर उनका व्याख्यान शुरु हो गया। हालांकि देर रात के राजनीतिक प्रवचन की तुलना में सुबह में हो रही वार्तालाप कुछ अधिक कर्णप्रिय लगी। वे बथानी टोला के बारे में बात कर रहे थे। सभी नीतीश सरकार के उस बयान का विरोध कर रहे थे, जिसमें सरकार ने बथानी टोला के फ़ैसले के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही थी।
अपनी आदत के अनुसार मैं एक अच्छा श्रोता बना रहा। जैसे ही ट्रेन ने डुमरांव स्टेशन को पार किया, मैंने बथानी टोला जाने का निश्चय किया। करीब एक घंटे के बाद ट्रेन आरा स्टेशन पर खड़ी थी और मैं आरा स्टेशन के बाहर चाय का आनंद ले रहा था। सोच रहा था कि बथानी जाने का कौन सा तरीका अपनाया जाये। इसी उधेड़बुन में मैंने 5-6 लोगों से बथानी टोला जाने के लिए बस या किसी अन्य सवारी गाड़ी के बारे में पूछा। मुझे घोर आश्चर्य हुआ जब लोगों ने बथानी टोला के बारे में अनिभिज्ञता प्रकट की। मेरे एक मित्र संदीप, जो मेरे हमपेशा हैं, मैंने उन्हें फ़ोन पर बथानी टोला जाने के बारे में बताया। ठीक दस मिनट के अंदर ही वो मेरे सामने अपने अग्निदूत यानी मोटरसाइकिल के साथ हाजिर थे। एक बार फ़िर चाय का आनंद लेने के बाद हम बथानी टोला के रास्ते पर अग्रसर थे। खेतों में गेहूं काटा जा चुका था। गर्म हवा के थपेड़े चेहरे को रह रहकर झुलसा देती थी।

करीब डेढ घंटे की यात्रा के बाद हम बथानी टोला के बाहर खड़े थे। संदीप ने मुझे इशारा किया। कुछ लोग गांव की सीमा के बाहर बैठे थे। उनके हाथों में रायफ़लें थीं। संदीप ने बताया कि ये लोग बड़का खड़ाऊं टोला गांव के हैं। जबसे बथानी टोला नरसंहार का फ़ैसला आया है, तबसे बड़का खड़ाऊं के लोग बथानी टोला आने-जाने वाले हर आदमी पर “निगाह” रखते हैं। मुझे उनसे कोई लेना-देना नहीं था और मैंने संदीप को आगे बढ़ने को कहा। बथानी टोला की सीमा में प्रवेश करने के साथ ही एक स्मारक पर नजर पड़ी। यह स्मारक माले द्वारा बथानी टोला नरसंहार में मारे गये लोगों की स्मृति में स्थापित किया गया था। स्मारक के नीचे बने शिलापट्ट पर मारे गए सभी लोगों के नाम लिखे थे। मैं कुछ आवश्यक जानकारियां नोट ही कर रहा था कि कुछ लोग आ गये। न तो उनके चेहरे पर बथानी टोला का दर्द था और न ही उनकी वाणी में ही।

वे मुझसे कह रहे थे कि मैं कैसा पत्रकार हूं, जिसके पास कैमरा नहीं है। मुझसे पहले संदीप ने जवाब दे दिया था। मैंने लखिया देवी के बारे में पूछा। एक किशोर ने उसके बारे में कहा कि अभी वह अपने घर में होगी। मैंने उस किशोर से लखिया देवी के घर का रास्ता पूछा। बथानी टोला की उबड़खाबड़ गलीनुमा सड़क पर चलते हुए हम उसके घर के दरवाजे पर खड़े थे और वह अपने घर के अंदर बच्चों के साथ खाना खा रही थी। हम बाहर खड़े रहे। मुझे आश्चर्य हो रहा था। लखिया देवी के घर को छोड़कर अधिकांश लोगों के घर पक्के थे। इससे पहले कि मेरा मन कुछ और सोच पाता लखिया देवी घर के बाहर आ चुकी थी। उसने अपने घर के आगे बने बथानी में एक खटिया पर बैठने का आग्रह किया। थोड़ी देर के बाद उसने हमें पानी पीने को दिया। टेलीफ़ोन से हुई बातचीत का हवाला देते हुए मैंने अपना परिचय उसे दिया। फ़िर उसका घर पक्का होने के बजाय कच्चा होने के बारे में पूछा। उसने सवालिया लहजे में जवाब दिया कि जो लोग मारे गये, सरकार ने केवल उनके परिजनों को ही 2 लाख रुपए मुआवजा और सरकारी नौकरी दी। चूंकि उसके परिवार में कोई मरा नहीं, इसलिए वह मुआवजे और नौकरी दोनों से वंचित रह गई। बताते चलें कि 16 साल पहले रणवीर सेना के नरपिशाचों ने लखिया देवी का स्तन काट लिया।

लखिया देवी ने बताया कि वह खुद भी खेती करती है और पति दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। 5 बेटियां और एक बेटा है। सभी स्कूल में पढने के लिये 3 किलोमीटर दूर जाते हैं। संदीप ने सवाल किया कि बड़का खड़ाऊं टोला में तो प्राथमिक विद्यालय है ही, फ़िर दूर क्यां? लखिया देवी ने कहा कि हम लोगों को बड़का खड़ाऊं जाने की इजाजत नहीं है। मैंने जब इस इजाजत के बारे में विस्तार से पूछा तब उसकी आंखें भर आईं। मैं समझ गया था। लखिया देवी के घर पर सत्तु पीने के बाद हम लालचंद चौधरी के घर पर पहुंचे। लालचंद जी आरा गए हुए थे। उनकी अनुपस्थिति में कोई बताने वाला नहीं था। उपस्थित लोगों से मैंने उस दरवाजे को देखने की इच्छा प्रकट की, जहां रणवीर सेना के जुल्म का गवाह आज भी जिंदा है। अलकतरा से पेंट किये गये दरवाजे को दिखाते हुए लोगों ने उस सुराख को भी दिखाया जहां गोली धंसी है। मैंने दिल को संतुष्ट करने के लिये सुराख को साफ़ कर झांकने की कोशिश की। गोली स्पष्ट तौर पर दिख गयी।

मैंने बथानी टोला के लोगों से बड़का खड़ाऊं जाने की बात कही। अधिकांश लोगों ने कहा कि आप वहां नहीं जायें। वहां के लोग बड़े बदमाश हैं। अभी हाल ही में एक पत्रकार को उनलोगों ने खूब मारा-पीटा था। संदीप इस खबर के बारे में जानते थे, इसलिए उसने सिर हिलाते हुए अपनी सहमति दे दी। मैंने कहा कि चलो आज हम भी मार खाकर देखते हैं। पहले तो संदीप ने इन्कार किया, लेकिन वह मेरे साथ हो गए। हम बड़की खड़ाऊं जा रहे थे। रास्ते में कर्बला की उस जमीन को भी देखा, जिसके कारण रणवीर सेना ने रक्तपात मचाया था। एक ऊंचे टीले पर हरा झंडा लहरा रहा था और उसी जमीन पर के भगवा झंडा भी पूरी मुस्तैदी से लहरा रहा था। मैंने संदीप से पूछा तो उसने बताया कि कर्बला की जमीन पर प्रशासन ने मुसलमानों को हरा झंडा और बड़का खड़ाऊं के लोगों को भगवा फ़हराने की इजाजत दे रखी है। वैसे इस जमीन पर आजतक धारा 144 लगा हुआ है। लेकिन यहां कानून कोई नहीं मानता है।

बड़की खड़ाऊं पहुंचने पर एक दालान के पास हम रुके। लोग ताश खेल रहे थे। मैंने उनके मतलब की बात से बातचीत की शुरुआत की। वे नरसंहार को जायज ठहरा रहे थे। जायज ठहराने के क्रम में वे बथानी टोला के दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को गालियां भी दे रहे थे। जब मैंने उनसे कहा कि नीतीश सरकार ने फ़ैसले कि खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है, तब वे हंस रहे थे। एक के बाद एक 6-7 कद्दावर भूमिहार नेताओं का नाम लेते हुए लोगों ने कहा कि नीतीश कुमार की औकात नहीं है कि वह फ़ैसले के बारे में कोई बात कहे। आजतक उसने कभी कुछ कहा है इस बारे में? बड़की खड़ाऊं टोला में भूमिहारों की ठसक उनके बाप-दादाओं के ठसक सरीखा ही है। कुछ नहीं बदला है। भूमिहारों ने बथानी टोला का बहिष्कृत कर रखा है। कोई राजनीतिक दल अब बथानी टोला नहीं जाता। यहां तक कि चुनाव में भी कोई वोट मांगने नहीं जाता। हम लौट रहे थे। रास्ते में हम सोच रहे थे कि बथानी की पीड़ा और फ़िर भूमिहारों की ठसक का इलाज क्या हो सकता है। क्या कभी लखिया देवी को इंसाफ़ मिल पायेगा? अगर किसी को सजा मिल भी गयी तो क्या वह अपने सुनहरे दिनों को जी पाएगी जो उसने खो दिया? ऐसे अनेकों प्रश्न दिमाग में उठापटक कर रहे थे और मैं इंटरसिटी ट्रेन में सवार होकर अपने लिए एक जगह तलाश कर रहा था।

लेखक नवल किशोर कुमार अपनाबिहार डाट ओआरजी के संपादक हैं.

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