वर्धा : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के 15 वें स्थापना दिवस के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा ने आज शनिवार को कहा कि वैकल्पिक विकास के मॉडल की बात करना आज उसी तरह अर्थहीन है जैसे कभी यूटोपिया की बात करना समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक काल में था। कोई भी व्यवस्था सामने की हकीकत के संदर्भ में ही बनती है, बनी-बनाई कल्पना के अनुरूप नहीं। ऐसे किसी भी मनचाही ब्लूप्रिंट को लागू करने का प्रयास या तो धर्मांधता को जन्म देता है या तानाशाही को। बराबरी व पारस्पिरिक सहयोग से विकास का नया मॉडल बन सकता है। हबीब तवीर सभागार में आयोजित भव्य समारोह की अध्यक्षता कुलपति विभूति नारायण राय ने की। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में साहित्यकार केशुभाई देसाई, कुलसचिव डॉ. के.जी. खामरे मंचस्थ थे।
‘विकास का वैकल्पिक मॉडल’ विषय पर विमर्श करते हुए सच्चिदानंद सिन्हा ने कहा कि प्रकृति से तालमेल बिठा कर चलने वाली कोई भी व्यवस्था समता के मूल्यों पर ही आधारित हो सकती है। शोषणमुक्त समाज में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की क्षमता गैरबराबर समाज से अधिक होती है, क्योंकि गैरबराबरी से ही दिखावे के लिए बेजरूरत तामझाम पर खर्च जरूरी होता है, और बाजार आश्रित पूंजीवादी समाज में तो बेजरूरी वस्तुओं के उत्पादन व उपभोग की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे नियंत्रित करने से पूंजीवादी व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। उन्होंने कहा कि आज चूंकि पर्यावरण का संकट विविध रूपों में हमारे अस्तित्व के लिए सर्वाधिक महत्व का बन गया है, इसलिए हमें समाज निर्माण की वैसी दिशा अपनानी होगी जो पर्यावरण के लिए कम से कम नुकसानदेह हो।
वर्तमान विकास के मॉडल पर टिप्पणी करते हुए श्री सिन्हा ने कहा कि धरती के संसाधनों का संतुलित व जीवन के लिए जरूरी उपयोग तभी संभव है, जब आदमियों के बीच गैरबराबरी न हो और वे पारस्पिक सहयोग पर आधारित छोटी इकाइयों में रहें जैसे कृषि क्रांति के पहले के दिनों में रहते थे तब जीवन का आधार फल-मूल जमा करना और आखेट था। आज हम उस अवस्था में नहीं जा सकते। उसका सबसे बड़ा कारण हमारी विशाल जनसंख्या है। इस भीड़ भरी दुनिया में खेती ही जीवन का आधार हो सकती है। कृषि छोटी व सहयोगी होगी। यह एक सोची-समझी बाध्यता होनी चाहिए, नहीं तो हम उन पुराने दिनों की तरफ लौट सकते हैं जब गुलामों व कृषकों से विशाल साम्राज्य कायम हुए। समाज में सब कुछ अनियंत्रित नहीं होता। काफी कुछ मूल्यों के आधार पर मनुष्यों की संस्कृति द्वारा निर्धारित होता है। इस हजार साल के इतिहास का सबक हमें ऐसे समाज के सांस्कृतिक निर्धारण में सहायक होगा और अंतत: हममें यह विश्वास दृढ़ करेगा कि प्रकृति और समग्र जीव जगत की रक्षा के साथ ही हमारा अपना अस्तित्व भी जुड़ा है। ‘स्काई इज द लिमिट’ वाला विज्ञापन बकवास है। आदमी धरती से बंधा है और वह तभी तक जीवित रहेगा जब तक यह बंधन कायम है।
सच्चिदानंद सिन्हा ने प्राकृतिक संसाधनों से आम जनों को वंचित किए जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि सबसे पहले तो वन प्रदेशों या अन्य जगहों में रहने वाले आदिवासियों के परंपरागत जीवन से कोई छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। इन्हें सैलानियों के हस्तक्षेप से भी मुक्त रखना होगा। वन प्रदेशों और आदिवासी-बहुल क्षेत्रों में परिवेश से छेड़छाड़ प्रतिबंधित होनी चाहिए। मसलन, वनों की कटाई, खनिजों के लिए खनन, उनके लिए असुविधाजनक रेल या रोड का विस्तार, क्षेत्र में बहने वाली जलधारा, झरनों, नदियों के प्रवाह को रोकना आदि। साहित्यकार केशुभाई देसाई ने गांधी से एक पत्रकार द्वारा पूछे गए सवाल का जिक्र करते हुए कहा कि सबसे बड़ी समस्या कौन सी है, तो गांधीजी ने जवाब दिया कि लोगों का संवेदनशून्य हो जाना सबसे बड़ी चिंता है। हम आज और भी संवेदनहीन होते जा रहे हैं। एक लेखक के लिए सृजन केवल आनंद के लिए नहीं, अपितु समय व समाज के प्रति वफादार होनी चाहिए। विश्वविद्यालय के विकास कार्यों व प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशील नजरिए से नई राह बनते देखकर उन्होंने कहा कि हर भाषा में एक विभूति नारायण राय पैदा हो और हर भाषा में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय हो।
अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि आज विकास और विनाश का मॉडेल गड्मड हो गया है। उपभोक्तावादी दौर में मनुष्यता के निहित खतरे जहां कि शोषण, असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है। प्रभु वर्ग चाहते हैं कि हम उनके बताए मार्ग पर ही चलें। आज जो संकट पैदा हो रहा है इसके लिए हमें जल, जंगल, जमीन व अन्य प्राकृतिक संसाधनों को बचाए रखने की जरूरत है। सृजन विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो.सुरेश शर्मा ने संचालन किया तथा कुलसचिव डॉ.के.जी.खामरे ने आभार व्यक्त किया। विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत गांधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो…’ से समारोह की शुरूआत हुई। अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ प्रदान कर किया गया। दिल्ली में गैंगरेप के कारण छात्रा की असामयिक मृत्यु की याद में दो मिनट का मौन रहकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर मूलचंद बड़जाते, से.रा.यात्री, संजीव, विजय मोहन सिंह, भरत महोदय, प्रो.सूरज पालीवाल, प्रो.अनिलके. राय ‘अंकित’, प्रो.के.के.सिंह, प्रो.मनोज कुमार, प्रो.शंभू गूप्त, प्रो.रामबीर सिंह, प्रो.विजय कौल, मारिया नेज्यैशी, डॉ.नृपेन्द्र प्रसाद मोदी, कनकमल गांधी, वसंत पांडेय, मुरलीधर बेलखोड़े, शेख हाशम, पुष्पराज, अरूण माहेश्वरी सहित बड़ी संख्या में शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी, विद्यार्थी, पत्रकार व वर्धा के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
पुस्तक मेले का हुआ उदघाटन– महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के 15 वें स्थापना दिवस के अवसर पर समता भवन के प्रांगण में आयोजित पुस्तक मेले का उदघाटन साहित्यकार केशुभाई देसाई द्वारा किया गया। उदघाटन समारोह में अध्यक्षीय वक्तव्य में कुलपति विभूति नारायण राय ने विश्वविद्यालय में इतने अधिक संख्या में प्रकाशकों द्वारा स्टॉल लगाए जाने पर खुशी जताते हुए आह्वान किया कि यहां के लोगों को पुस्तक मेले से लाभ उठाना चाहिए, ताकि ‘अध्ययन-अध्यापन की संस्कृति’ विकसित हो सके। 29 से 31 दिसंबर तक आयोजित पुस्तक मेले में देशभर के हिंदी के प्रतिष्ठित प्रकाशकों द्वारा 35 स्टॉल लगाई गई हैं। इस अवसर पर साहित्यकार से.रा.यात्री, कुलसचिव डॉ.के.जी.खामरे, प्रो. अनिल के.राय ‘अंकित’, प्रो.सूरज पालीवाल, प्रो.मनोज कुमार, नरेन्द्र सिंह सहित बड़ी संख्या में शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
31 को होंगे विविध कार्यक्रम– महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा अपना 15 वां स्थापना दिवस मना रहा है। इस अवसर पर 29 से 31 दिसंबर को विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। 31 दिसंबर को भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ही एक फूड फेस्टीवल का आयोजन किया गया है। फूड फेस्टीवल में विविध प्रकार के व्यंजनों के 25 स्टॉल लगाए जाएंगे।


