: पद्मावती को भाजपाई हुमायूं ने गले की फांस की तरह निकाला : हुमायूं ने राजनीतिक स्वार्थो के चलते पद्मावती को रौंद डाला : पद्मवती अब औकात दिखा रही है स्व-जातीय भाईयों को साथ लेकर : रानी पद्मावती को राजनीतिक संरक्षण की दरकार थी, सो बहना ने भाई को अपनी रक्षा का बाकायदा ठेका देता हुए उसकी कलाई पर राखी बांध दी। लेकिन भैया हुमायूं तो दूसरी ही संस्कृति का पैरोकार था। अपनी सांस्कृतिक विचारधारा का झंडाबरदार और वैचारिक पार्टी का कर्मठ। चूंकि राजनीति रिश्ते नहीं मानती, इसलिए ताजा-ताजा बना हुमायूं राजनीति का भैया बनने के ठीक बाद सैंया बनने की जुगत में जुट गया।
नतीजा, बलबन की ताकत के बिना रजिया गुंडों में फंस गयी और द्रौपदी की तरह उसकी लाज जिस तरह स्टेट गेस्ट हाउस में लूटी गयी, उसकी कीमत चुकाने के लिए इस बहना ने स्वजातीय भाइयों का दामन फिर थाम लिया और उनके साथ मिलकर अपने पूर्ववर्ती राजनीतिक भाइयों की पार्टी के साथियों की कई बार सरेआम कुटाई के रूप में वसूली और इस तरह बहना ने अपनी इज्जत की नीलामी रोक पाने में नाकाम रहे भाजपाई हुमायूं-नुमा दु:शासनों के साथ सारा बकाया अदा कर लिया।
भाई के भाइयों की गजक-नुमा कुटाई-पिटाई का दौर अभी तक जारी है। हर जगह अब इनकी सेहत हल्की की जा रही है। हालत यह है कि अब किसी भी आयोजन में दर्जन-डेढ़ दर्जन से ज्यादा कार्यकर्ता जुटते ही नहीं। प्रदेश अध्यक्ष तो युवा कार्यकर्ताओं के सीधे संघर्ष कार्यक्रम में जाने के बजाय, पार्टी मुख्यालय में एनजीओ प्रकोष्ठ में सदारत करना ज्यादा पसंद करते हैं।
तो, आज बात रक्षाबंधन की। कैसे भी हो, यूपी में यह पर्व आज बीत रहा है। मगर भारतीय संस्कृति की पुनीत और पवित्र भावना से ओतप्रात यह पर्व कम से यूपी की राजनीति में पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंगा दिख रहा है। कल तक जो भाई अपनी कलाई में बहना की राखी बंधवाने को बेताब दिखते रहते थे, आज वे अपनी ही बहना को दु:शासनों से घिरा देख तो रहे ही हैं, साथ ही ऐसे दु:शासनों को उनके कृत्यों को जल्दी क्रियान्वित करने के लिए ललकार भी रहे हैं।
तर्क यह है कि बहना ने ही अपनी कामकाज की शैली से अपने किसी राजनीतिक भाई को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। कुछ भी हो, भाजपा के इस भाई का विरोधी खेमा यह तर्क दे रहा है कि बिना पार्टी की राय जाने हुए किसी को भी अपनी बहन बना लेने की जिम्मेदारी पार्टी के दूसरे कार्यकर्ता और नेताओं को भी उसका भाई बनवा देना उचित नहीं है। कुछ रसीले भाई भी हैं, जो दबेछिपे यह भी कहते हैं कि एक ही पार्टी में हैं तो क्या हुआ, बहन का मसला तो व्यक्तिगत होता है और ऐसी कोई संवैधानिक शर्त अब तक नहीं बनी जिसमें कोई किसी की बहन के साथ सम्पर्क नहीं रख सकता। अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि यहां बात होरही है यूपी की मुख्यमंत्री मायावती और उनके मुंहबोले भाई लालजी टंडन की।
वैसे भी त्योहार मनाने में यूपी का कोई जवाब नहीं। हां, शैली अलग-अलग जरूर है। काशी में लाउडस्पीकर पर खुलेआम नंग-धड़ंग गालियां विश्वविख्यात हैं जिनकी शुरूआत चकाचक बनारसी ने की थी। अब उनके पक्ष में तर्क यह है कि जो बात सहूलियत से नहीं समझायी जा सकती, उसे चकाचक बनारसी ने ठेठ देशज गालियों की मार्फत हर आम-ओ-खास तक चकाचक पहुंचा दिया। वहां चकाचक बनारसी के कैसेट आज भी बिकते हैं।
कानपुर की होली तो पूरे पखवाड़े चलती है। पैसा नहीं बचा तो पूरब के इस मैनचेस्टर के बदहाल लोगों ने कीचड़ का सहारा ले लिया। अब कीचड़ के साथ गाली तो अनिवार्य है ही। जैसे दारू के साथ चिकना, भले ही वह सिर्फ प्याज-नमक-मिर्च ही क्यों न हो। अब अपनी इस शैली को वे कनपुरिया शैली करार देते और प्रशंसा करते नहीं अघाते। फेसबुक पर कनपुरिया क्लब का जायजा जरूर लीजिएगा जहां कानपुर के लोगों ने यह तीर मारा, वह तीर मारा के नारे गुंजायमान होते रहते हैं।
अवध की होली मर्यादा पुरूषोत्तम को समर्पित होती है। लेकिन अब चूंकि राम रहे नहीं, इसलिए देवर-भौजाई या प्रेमी-प्रमिका इस अवसर का उपयोग गोलाई-मापी के लिए करते हैं। लेकिन सार्वजनिक अभद्रता की गुंजाइश किसी को नहीं है। आज भी। सावन के झूले के अवसर को छोड़कर जहां पूरा अवध क्षेत्र एक घिनौनी हरकत और मानसिकता से सराबोर दिखायी देता है। बुंदेलखंड में शालीनता इसलिए है क्योंकि यह भुखमरी से पीडित है। रूहेलखंड में शाइस्तगी है, जबकि पश्चिम मैं तो जनजीवन में ही रोजमर्रा गालियां हैं। ऐसे में किसी खास उत्सव की जरूरत भी क्या है।
तो बचा लखनउ। यह नवाबी शहर 15-20 दिन पहले से ही होली के लिए तैयार हो जाता है। बाद में महंगी हो जाने के डर से लोग दारू पहले ही खरीद कर रख लेते हें। लेकिन पूरी शान-बान-आन के साथ होलिका दहन में लोग भले ही न पहुंचें, लेकिन सुबह साढ़े दस बजे से लेकर पौने ग्यारह बजे तक होली मनाते जरूर हैं। आज के इस युग में पंद्रह मिनट क्या कम होते हैं। कंडोम कंपनियां भले ही लाख दम भर लें, लेकिन यह समय सीमा किसी भी हालत में चौथाई घंटा से ज्यादा नहीं बढ़ पाती। इसके बाद शुरू होता है लखनऊ के नवाबों के अंदाज वाला दौर।
और रही बात इस नवाबी शौक का, तो राजनीति में रक्षाबंधन के पंद्रह साल पहले शुरू हुई इस घटना और उसके बाद के घटनाक्रम में इसे साफ तौर पर देखा जा सकता है।


