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बहस में वक्‍त न गवाएं : नीचे से सफाई की शुरुआत करें

छत पर कौवों की वीट पड़ी है, कमरा मकड़ी के जालों से भरा पड़ा है। परिवार में बहस हो गयी कि पहले छत साफ करें या कमरा। गृहणी सयानी थी। कमरा रोजमर्रा के रहने की जगह है। पहले इसे साफ कर लें। अगली छुटटी में छत भी साफ कर लेंगे। फैसला लेना है कि “सफाई जरूरी है या बहस” यदि बहस में दिन गुजारने लगे तो कमरा-छत दोनों गन्दे रह जायेंगे।

छत पर कौवों की वीट पड़ी है, कमरा मकड़ी के जालों से भरा पड़ा है। परिवार में बहस हो गयी कि पहले छत साफ करें या कमरा। गृहणी सयानी थी। कमरा रोजमर्रा के रहने की जगह है। पहले इसे साफ कर लें। अगली छुटटी में छत भी साफ कर लेंगे। फैसला लेना है कि “सफाई जरूरी है या बहस” यदि बहस में दिन गुजारने लगे तो कमरा-छत दोनों गन्दे रह जायेंगे।

पिछले छह महीनों से बहस चल रही है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल दायरे में लेना है या नहीं। कोई कहने वाला नहीं कि चलो छोड़ों क्रियान्वयन धरातल से शुरू तो करो। ऊपर के घोटालों का मसला करोड़ों-अरबों रुपये का है परन्तु नागरिक की आज परेशानी क्या है-

1. बिना पैसे मोबाइल चोरी तक की एफआईआर नहीं होती।

2. आय प्रमाण पत्र तीन सौ रुपये और तीन दिन तक धक्कों की एवज में ही मिलता है।

3. बिना रिश्वत नये वाहन का पंजीकरण नहीं होता जिसके मानक का ग्राहक से लेना देना नहीं,  ड्राइविंग लाइसेन्स तो दूर की बात है।

4. वाणज्यिकर का रिटर्न हो पंजीयन, या कचहरी का कोई कागज जमा कराना हो, बिना घूस के जमा नहीं होता।

5. पुलिस वाले पीड़ित से ही भद्दी भाषा में बोलते हैं।

6. दाखिले के लिए प्राइवेट कॉलिज लाखों की रिश्वत लेते हैं।

7. सम्पत्ति खरीदो या बेचो रजिस्ट्री कार्यालय का कमीशन बंधा हुआ है। 

ऐसे हजारों पाइन्ट हैं जिस पर प्रत्येक नागरिक को दिन में कई बार आमना सामना करना पड़ता है। दिल्ली वाले लोकपाल को शिकायत दर्ज कराना तो लम्बा व खर्चीला काम है। हमें तो हर शहर व कस्बे में आठ-दस शक्ति सम्पन्न ‘लोकमान्य’  चाहिए जो शिकायत आते ही टेलीफोन पर सम्बन्धित अधिकारी से सवाल कर सकें। हमें हर कस्बे में सिविल सोसायटी, अन्ना हजारे, केजरीवाल व किरण बेदी चाहिए। परम्परागत नेताओं को किनारे करने के बाद ही समाज सुधरेगा। ये नेता तो चाहेंगे कि एफआईआर न हो, नेता के फोन पर रिपार्ट लिखी जायेगी या दाखिले की रिश्वत में पांच-दस हजार की कमी होगी तो नेता का एहसान चुकाने के लिए उसके चुनाव में कार्य करना होगा, ध्यान रहे, बंधुआ मजदूरों का जीवन छोड़ कर सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन जीने वाला अपने क्षेत्र का गांधी होगा। एक बार धरातल की सफाई शुरू हो गयी तो कोई सरकार या उसका ओहदा ऐसा नही होगा जिस पर लोकपाल का नियन्त्रण न हो।

लेखक गोपाल अग्रवाल समाजवादी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। इन दिनों समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के हिस्से हैं। मेरठ निवासी गोपाल से संपर्क   के जरिए किया जा सकता है।

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