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बहुभाषी रचना पाठ में जुटे देशभर के दिग्‍गज साहित्‍यकार

वाराणसी :  वाराणसी, साहित्य अकादेमी और हिन्दी विभाग, बीएचयू के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय बहुभाषी रचना पाठ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष प्रो. विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि बहुभाषीय संस्कृति के इस देश में बहुभाषी रचना पाठ का होना भाषाई एकता और राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि रचना का विकास श्रुति परम्परा से ही हुआ है। इस दृष्टि से यह आयोजन रचना की स्वाभाविकता से जुड़ा है।

वाराणसी :  वाराणसी, साहित्य अकादेमी और हिन्दी विभाग, बीएचयू के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय बहुभाषी रचना पाठ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष प्रो. विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि बहुभाषीय संस्कृति के इस देश में बहुभाषी रचना पाठ का होना भाषाई एकता और राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि रचना का विकास श्रुति परम्परा से ही हुआ है। इस दृष्टि से यह आयोजन रचना की स्वाभाविकता से जुड़ा है।

उन्होंने कहा कि रचना का सत्य वास्तविक सत्य होता है, उस सत्य को जनता तक पहुँचना चाहिए। उन्होंने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि साहित्य उस घटना को दर्ज करता है, जिसे राजनीति, समाज, इतिहास नहीं दर्ज कर पाया हो। वाल्मीकि की पहली कविता ”माँ निषाद प्रतिष्ठा”  जो कि साहित्य की पहली कविता है, वह एक पक्षी की करूण दशा पर व्यक्त हुई थी। श्री तिवारी ने कहा कि साहित्यकार और साहित्य स्वाभाविक रूप से हिंसा और घृणा का विरोधी होता है। वह शोषण के विरोध में ही अपनी अभिव्यक्ति सदैव करता है।

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि मलयालम भाषी कवि मैथ्यू थॉमस ने कहा कि काशी भारतीय संस्कृति की प्रतीक है, लेकिन सबको अपनी-अपनी काशी की खोज करनी पड़ती है। उन्होंने वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता के अन्तर्सबंधों की सूक्ष्म व्याख्या की। मैथ्यू थॉमस ने कहा कि गहन आध्यात्मिकता की सूक्ष्म दृष्टि साहित्य के अलग सम्भावना का द्वार खोलती है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि साहित्य अकादेमी में हिन्दी के संयोजक माधव कौषिक ने कहा कि नई पीढ़ी ने भाषाई संकीर्णताओं को दूर कर दिया है। भारत एक अकेला देश है जो कि 24 भाषाओं को व्यक्त करता है। उन्होंने कहा कि बहुभाषी रचना पाठ भाषाई दीवार को तोड़ने का कार्य करता है। कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादेमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया। उन्होंने साहित्य अकादेमी के होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की। आए हुए अतिथिओं का धन्यवाद ज्ञापन बीएचयू हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. राधेश्‍याम दूबे ने किया।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र में कहानी पाठ का आयोजन हुआ। जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह ने की। काशीनाथ सिंह जी ने तद्भव में प्रकाशित अपनी ‘खरोंच’ नामक कहानी का पाठ किया। यह कहानी विश्वास के समाप्त होने जाने से उपजी व्यक्ति की स्थिति को व्यक्त करती है। इस कहानी में एक ऐसे बेबस व्यक्ति का जिक्र है, जो सहज ही किसी के झांसे में आ जाता है। इस पात्र का नाम ही काशी है। उसे एक चौराहे पर एक व्यक्ति अपनी साइकिल और एक बच्चे के साथ मिलता है। कुछ ही पलों में वह व्यक्ति काशी को अपने विश्वास में ले लेता है और उसकी मोटरसाइकिल लेकर भागता है। जब काशी को एहसास होता है तो वह उसे पकड़ने के लिए भागता है, लेकिन गर्मी की भरी दोपहर में वह गलियों में गुम हो जाता है। तब काशी सोचता है कि जाएगा कहां, उसकी साइकिल और बच्चा तो मेरे पास हैं ही। लेकिन लौटकर काशी चौराहे पर आता है तो न ही वहां बच्चा होता है और न ही साइकिल।

इस सत्र में नवनीत मिश्र ने अपनी अप्रकाशित कहानी ”इतना अंधेरा क्यों हैं”  पढ़ी। यह मध्यवर्गीय जीवन यथार्थ की कहानी है। जिसमें अंधेरे की व्याप्ति घर के बाहर और भीतर दोनों स्तरों पर व्याप्त है। इस कहानी में नए प्रयोग भी हुए है, जहाँ एक कहानी चलती है और उसके बीच ही दूसरी कहानी शुरू हो जाती है। कहानी पाठ की इस कड़ी में नीरजा माधव ने अन्यथा पत्रिका में प्रकाशित ”चुप चंतारा रोना नहीं”  का पाठ किया। यह कहानी एक निम्नवर्गीय स्त्री के जीवन और मध्यवर्गीय समाज की संवेदनहीनता को व्यक्त करती है। यह एक ऐसी महिला की कहानी है जो वैवाहिक या अन्य अवसर पर पूड़ियां बेलने का कार्य करती है। उसके बेटे को एक शादी में बुत बनाकर खड़ा किया जाता है। जाड़े का दिन। नंगे बदन बुत बने बेटे को देख मां का दिल कचोटता है। वह उसे पूड़िया खिलाने की कोशिश करती है, मगर डांट दी जाती है। अंत में पता चलता है कि लड़का बेहोश हो गया। वह सिसकने लगती है। लड़की का पिता कहता है ”चुप चंतारा, रोना नहीं”, शादी हो रही है। चंतारा चुप होकर अस्पताल की ओर चल देती है।

सत्र में दयानंद पाण्डेय ने ”फेसबुक में फँसे चेहरे”  नामक कहानी का पाठ किया। यह कहानी आधुनिक तकनीक से उपजी जीवन स्थिति को व्यक्त करती है। लेखक ने इस कहानी के जरिये नेट सर्फिंग की मौजूदा विसंगतियों पर चोट की है। इस कहानी का पात्र रामसिंगार फेसबुक पर चैटिंग का आदी हो जाता है। वह खासकर महिलाओं के साथ अश्लील चैटिंग करता है। एक दिन उसे एक ऐसी लड़की मिल जाती है, जो उससे भी ज्यादा अश्लील बातें करने लगती है। रामसिंगार का दिमाग हिल जाता है और वह चैटिंग छोड़कर गांव चला जाता है। वहां उसे जो तस्वीर दिखती है उससे उसका दिमाग पूरी तरह बदल जाता है। शहर लौटने पर वह सोचता है कि फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग उसके गांव जैसे इलाकों को महत्व क्यों नहीं देतीं। वह गांव का विवरण फेसबुक पर डाल देता है, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता। कुछ दिन बाद उसे जो जवाब मिलते हैं, उन्हें पढ़कर निराश हो जाता है। फेसबुक छोड़ देता है, लेकिन फिर कुछ दिन बाद यह सोचकर कि यह नहीं तो क्या करूंगा, फिर चैटिंग करने लगता है। इसमें लेखक ने सवाल उठाया है कि कहीं फेसबुक चैटिंग नशा तो नहीं है? इसी सत्र में कथा लेखिका मुक्ता ने ”आईने के पार”  कहानी के माध्यम से स्त्री जीवन की पीड़ा को उकेरने का प्रयास किया गया है। आधुनिक जीवन शैली की छत्रछाया में मध्यवर्गीय परिवार की सोच क्या हो सकती है। कैसे आईना अतीत की यादों को कुरेद सकता है। इसी ताने बाने से बुनी यह कहानी ”कथादेश”  पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

अगले दिन 10 जुलाई को तीसरे सत्र का आरंभ काव्य पाठ से हुआ। जो कि तीसरे और चौथे दो सत्रों में विभाजित था। इस काव्य पाठ में उड़िया, तमिल, कोंकणी, बांग्ला, हिन्दी, भोजपुरी समेत कई अन्य भारतीय भाषाओं के 20 कवियों ने अपनी कविताएँ पढ़ी। दो सत्रों में चले इस काव्य पाठ की अध्यक्षता क्रमशः वरिष्ठ हिन्दी कवि विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी और तमिल कवि सिर्पी बालसुब्रहृण्यम ने की।

काव्य पाठ का आरम्भ हिन्दी के वरिष्ठ कवि ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं से हुआ। उन्होंने ‘कमदिल कनदिल’,  ‘सर्वभक्षी’ और ‘चन्द्रबली जी नहीं रहे’ कविताओं का पाठ किया। ‘कमदिल कनदिल’ कविता गहरे अर्थों में निम्नवर्गीय व्यक्ति की व्यथा है, लेकिन अत्यन्त ही सूक्ष्मता से। ‘चन्द्रबली जी नही रहे/यह एक छोटा सा वाक्य/तुम पर आसमानी बिजली की तरह टूटता है’, पंक्तियों के माध्यम से जब कवि ने कविता का पाठ किया तो सबको यह महसूस हो रहा था कि यह बिजली उनके ऊपर भी गिर रही है। बांग्ला के प्रसिद्व कवि अमिताभ चौधुरी ने अपनी बंग्ला और अंग्रेजी की कविताओं का पाठ किया, जिसमें ‘वर्षा’, ‘धर्म-अधर्म’ आदि मुख्य रही।

प्रसिद्ध गीतकार हरिराम द्विवेदी ने कई प्रसिद्ध गीत सुनाया। जिसमें – ”सिन्घु घाटी के पर्वत के सौ-सौ नमन्/अपने लोक परिपाटी के सौ-सौ नमन्” नामक गीत की काफी सराहना की गयी। उड़िया की कवयित्री प्रवासिनी महाकुड ने ‘पिता’, ‘मोक्ष’, ‘लड़की’ और ‘तितली’ नामक अपनी कई कविताओं का पाठ प्रस्तुत किया। चन्द्रकला त्रिपाठी ने ‘टाइटेनिक का अमर छन्द’, ‘प्रेम की छिपी हुई इबादतें’ कविता का पाठ किया। जिसमें एक स्त्री की सीमित दुनिया को विस्तृत करने की कोशिश है। युवा कवि श्रीप्रकाश शुक्ल ने ‘मोबाइल व लड्डू’ और ‘अड़ीबाज’ नामक कविताओं का पाठ किया। ‘मोबाइल व लड्डू’ नामक कविता की इन पंक्तियों  को श्रोताओं ने खूब सराहा – ‘यह एक दिन की बात है/कि एक तरफ मेरा मोबाइल बज रहा था/और दूसरी तरफ मेरे हाथ में एक लड्डू था/ जो लगातार पिघल रहा था।’  इस अवसर पर व्योमेश शुक्ल ने ‘होना था’ और ‘लिखा गया माना जाय’ आदि कविताओं का पाठ किया।

भोजपुरी के कवि प्रकाश्‍ उदय ने ‘कहो का हाल चाल’ गीत सुनाया। गीतकार श्रीकृष्ण तिवारी ने ‘भीलों ने बांट लिया वन राजा को खबर न लगी’ अपनी प्रसिद्ध गीत से सबका मन मोह लिया। हिन्दी के गजलकार वशिष्‍ठ अनूप ने ‘अंधेरा था घना, लेकिन कई दीपक जला दिए’, सुनाया। युवा कवि रामाज्ञा राय ने ‘बुनकर’, ‘नग्नता’, ‘नया आपात काल’ आदि  कविताएँ सुनाई। कोंकणी के प्रसिद्ध कवि पुंडलिक नायक ने ‘गुमशुदा गाय’, ‘हम कौन है?’ आदि कविताएँ सुनाई। जिसमें जीवन की व्यथा को काफी गहाई से उकेरा गया है। साहित्य अकादेमी में हिन्दी के संयोजक माधव कौशिश ने ‘रोने का रूलाने का हुनर ढूढ़ रहे हैं/ हम दुवाओं में असर ढूढ़ रहे है।’ शेर सुनाए। उन्होंने ‘नया ज्ञानोदय’ के जून, 11 के अंक में प्रकाशित अपनी कविता ‘सबसे मुश्किल मोड़ पर’ का पाठ किया जिसकी इन पंक्तियों को श्रोताओं ने काफी पसंद किया – ”खाप पंचायत के बर्बर फैसले हैं/सैकड़ों मासूस फांसी पर चढ़े हैं/हाथ में हथियार लेकर रात आई/बहन का दुश्मन हुआ है आज भाई।”  इस अवसर पर सदानंद शाही ने ‘माजरा क्या है’, ‘हरी मिर्च’ कविताओं के माध्यम से समाप्त हो रही संवेदना को व्यक्त किया। ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने ‘दिल्ली’ पर लिखी अपनी कविता सुनाई जिसमें नगर की व्यथा कथा के बीच गांव की मार्मिक याद का चित्रण किया गया है। उन्होंने महानगरों में काम की तलाश में जाने वाले ग्रामीण युवकों की बुरी हालत का चित्रण पेश किया है।

वरिष्ठ हिन्दी कवि विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने अपनी ‘आरा मशीन’  नामक कविता का पाठ किया जिसमें पेड़ों को दर्द उकेरते हुए व्यवस्था पर करारा प्रहार किया गया है। ‘आरा मशीन’ में कटने वाली लकड़ियों का पूरा दृश्य उत्पन्न करने के बाद कवि पेड़ के माध्यम से यह दिखाता है कि अब इन कटी लकड़ियों से बनी कुर्सी पर राजा बैठेगा और वन महोत्सव मनायेगा। तमिल के प्रतिष्ठित कवि सिर्पी बालसब्रह्मण्यम ने कहा कि मुझे यहां आकर काफी गर्व हो रहा है। उन्होंने बताया कि तमिल साहित्य के जनक सुब्रह्मण्यम भारती 1897 से 1907 तक लगातार वाराणसी में रहे और यहां की संस्कृति को आत्मसात किया। जब रेडियो की शुरुआत नहीं हुई थी, तभी उन्होंने कहा था कि कोई ऐसा यंत्र बनना चाहिये, जिससे वाराणसी के छात्रों की आवाज को कांचीपुरम में सुनाया जा सके। साहित्य अकादमी सम्मान और साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार पा चुके सिर्पी ने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक आडंबर पर सशक्त प्रहार किये। इसके साथ ही साथ अशोक पाठक, वंदना मिश्र, ओम निश्‍चल, ब्रह्माशंकर पाण्डेय, अनंत मिश्र आदि कवियों ने काव्य पाठ किया।

दो सत्रों में चले काव्य पाठ का संचालन साहित्य अकादेमी के सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया। आए हुए अतिथियों और कवियों का धन्यवाद ज्ञापन साहित्य अकादेमी में, हिन्दी के संयोजक माधव कौशिक जी ने किया। उम्मीद है कि साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित इस रचना पाठ की अनुगूंज आगे के दिनों में बनी रहेगी। बनारस में यह पहली बार सम्भव हुआ कि हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों ने इतनी आपसी संवेदनगत निकटता महसूस की।

 

वाराणसी से रविशंकर सोनकर/ रविशंकर उपाध्‍याय की रिपोर्ट.

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