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बाइस साल की अपनी पत्रकारिता जिंदगी में ऐसा मंत्री कभी न देखा

बाइस साल की अपनी पत्रकारिता की जिंदगी में मैंने कभी यह नहीं देखा कि एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर देश का कानून मंत्री प्रेस कांफ्रेंस बुलाये और पत्रकारों के सवाल पूछने पर कहे कि मैं तुम्हें अदालत में देख लूंगा। साथ ही प्रेस कांफ्रेंस शुरू होने से पहले ही ऐलान कर दे कि मैं इन इन सवालों के जवाब नही दूंगा। आखिर एक सौ बीस करोड़ आबादी वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सरकार चलाने वाले मंत्री की अब यही हैसियत रह गयी है कि वह खुले आम पत्रकार को धमकी दे और शटअप कहे। खून की बात कहे। जिंदा न लौट पाने की बात कहे। और, यह सब कहकर वह खुद मंत्री पद पर बना रहे।

बाइस साल की अपनी पत्रकारिता की जिंदगी में मैंने कभी यह नहीं देखा कि एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर देश का कानून मंत्री प्रेस कांफ्रेंस बुलाये और पत्रकारों के सवाल पूछने पर कहे कि मैं तुम्हें अदालत में देख लूंगा। साथ ही प्रेस कांफ्रेंस शुरू होने से पहले ही ऐलान कर दे कि मैं इन इन सवालों के जवाब नही दूंगा। आखिर एक सौ बीस करोड़ आबादी वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सरकार चलाने वाले मंत्री की अब यही हैसियत रह गयी है कि वह खुले आम पत्रकार को धमकी दे और शटअप कहे। खून की बात कहे। जिंदा न लौट पाने की बात कहे। और, यह सब कहकर वह खुद मंत्री पद पर बना रहे।

सारा विवाद देश के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद के ट्रस्ट द्वारा विकलांगों के उपकरण आदि बांटने से संबंधित मामलों का है। इस ट्रस्ट को केन्द्र सरकार बड़ा अनुदान देती है। ताजा विवाद केन्द्र के इक्हत्तर लाख रूपये के वितरण का है। इस रूपये से विकलांगों के लिए उपकरण आदि खरीदने और उन्हें प्रशिक्षित किया जाना था। केन्द्र ने यह धनराशि उनके ट्रस्ट को उपलब्ध करा दी।

होना यह चाहिए था कि यह ट्रस्ट विधिवत उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में शिविर आयोजित करता। विकलांगों को उनके बेहतर जीवन यापन के लिए प्रेरणा देता। उनके जीवन में काम आने वाले उपकरण उन्हें उपलब्ध कराता। यह इस ट्रस्ट की कानूनी जिम्मेदारी थी और साथ ही खुर्शीद परिवार का नैतिक दायित्व भी कि वह विकलांगों को किसी प्रकार की कोई परेशानी न होने दे। मगर सारा विवाद तब शुरू हुआ जब आजतक चैनल की टीम ने इस ट्रस्ट के काम काज की पड़ताल की।

इस पड़ताल में पाया गया कि इस इक्हत्तर लाख का भारी गोलमाल ट्रस्ट द्वारा किया गया है। बड़ी संख्या में विकलांगों को उपकरण या तो मिले नही अथवा जो उपकरण मिले वह गलत रूप में मिले। अर्थात जिसका पैर खराब उसे कान से सुनने वाली मशीन दे दी गयी। इस तरह के बड़े आरोप खुर्शीद परिवार के उपर लगे। मगर इससे भी गंभीर और संनसनीखेज आरोप यह था कि इस ट्रस्ट के शिविरों के कामकाज का सत्यापन जिन अधिकारियों ने किया था उनके हस्ताक्षर ही फर्जी थे। कुछ अधिकारियों के शपथ पत्र तक फर्जी बना दिये गये थे। मैनपुरी के तत्कालीन सीडीओ तथा वर्तमान में लखनऊ विश्वविद्यालय के रजिस्टार जेबी सिंह ने स्पष्टड्ढ रूप से कह दिया कि उनके हस्ताक्षर फर्जी तरीके से बनाये गये हैं।

इस आरोप के बाद सनसनी फैल गयी। यह आरोप देश के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के परिवार पर लगे थे। देश भर में इसका विरोध शुरू हो गया। केजरीवाल की टीम ने तो इस मामले में आर पार की लड़ाई का ऐलान ही कर दिया। इसके बाद सलमान खुर्शीद ने इंडिया टुडे गु्रप के मालिक अरूण पुरी पर मानहानि का मुकदमा कर दिया और अपने उपर लगे आरोपों की सफाई के लिए प्रेस कांफ्रेंस बुला डाली।

प्रेस कांफ्रेंस में जिस तरह पत्रकारों और कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के बीच तनातनी हुई वह लोकतंत्र के लिए शुभ नही माना जा सकता। गुस्से में सलमान खुर्शीद ने जो आचरण पेश किया उसे देश के कानून मंत्री के आचरण के अनुरूप नही कहा जा सकता। जब रंगा मिस्त्री नामक एक लाभार्थी को बुलाकर उसे यह कहलवाया गया कि उसे कान की सुनने की मशीन मिल गयी है तो वहां उपस्थित सलमान खुर्शीद के समर्थक नारे बाजी करने लगे और मामला यहीं नही रूका। देश के कानून मंत्री अपनी प्रेस कांफ्रेंस में खुद ही ताली बजाने लगे।

देश के कानून मंत्री को इतना भी समझ नही आया कि उपकरण सिर्फ रंगा मिस्त्री को ही नही बांटे गये बल्कि सैकड़ों लाभार्थियों को यह उपकरण दिये गये। उन सैकड़ों में से सिर्फ एक व्यक्ति को बुलाकर और उससे यह कहलवाकर कि उसे कान की मशीन मिल गयी यह सुनकर ताली बजाकर खुश हो रहे कानून मंत्री आखिर क्या संदेश देना चाह रहे थे। इक्हत्तर लाख रूपये लेकर एक व्यक्ति से यह कहलवाना कि उसे कान की मशीन मिल गयी क्या पर्याप्त है। या सारे इक्हत्तर लाख रूपये का हिसाब किताब सिर्फ इतना है कि उन्होंने इतने रूपयों में से एक व्यक्ति को कान की मशीन दिलवा दी।

इस ट्रस्ट में की गयी धांधलियों की जांच जारी है। यूपी सरकार अपने राजनैतिक नफा नुकसान की दृष्टि से यह जांच करवायेगी। मगर फिलहाल इन आरोपों से कानून मंत्री की जो छवि धूमिल हुई है और केन्द्र सरकार बचाव की मुद्रा में है। इसका भविष्य क्या होगा। सलमान खुर्शीद अपने इस अमर्यादित आचरण के बावजूद दिल्ली दरबार में अपना सिंहासल मजबूत रखेंगे या दिल्ली दरबार उनसे किनारा करेगा। इस सबसे महत्पूर्ण बात यह है कि आखिर खुर्शीद परिवार किस उद्देश्य के लिए यह ट्रस्ट चला रहा था। अगर इस ट्रस्ट को वास्तव में विकलांगों की मदद करनी होती तो वह अधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर क्यों करवाता साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि आखिर किस योग्यता के आधार पर सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट को इतनी बड़ी धनराशि अनुदान के रूप में दी गयी जिस अनुदान को उन्हें विकलांगों के लिए खर्च करना था।

उत्तर प्रदेश में और देश भर में कई स्वयंसेवी संस्थायें विकलांगों के बीच में दिन रात कार्य कर रही है और बेहतर कार्य कर रही हैं। उनको न चुनकर एक केन्द्रीय मंत्री की पत्नी के ट्रस्ट को चुनना और उसे लाखों करोड़ो रूपये दे देना कौन सा नैतिकता का तकाजा है। अगर सलमान खुर्शीद साहब को विकलांगों के बीच काम करना ही था तो उन्हें सांसद निधि से दो करोड़ रूपये प्रतिवर्ष मिलता है। उसका एक बड़ा हिस्सा वह विकलांगों के हित में खर्च कर सकते थे। मगर इस पैसे का फिर इतना गोलमाल नही हो सकता जैसा अब उन्होंने करके दिखा दिया।

खुर्शीद साहब शायद यह भूल गये कि वह इस देश की सत्ता पर अपनी चकाचैंध दिखा रहे है। मगर इससे ऊपर एक और ईश्वर की सत्ता होती है जिसकी लाठी में आवाज नही होती। अगर खुर्शीद साहब यह बात समझते तो इस तरह मानसिक विकलांग नही होते।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.


 

संजय शर्मा के लिए अन्य विश्लेषणों-आलेखों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- 

भड़ास पर संजय शर्मा-1

भड़ास पर संजय शर्मा-2


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