बिहार सरकार इन दिनों राज्य के सौ साल पूरा होने का जश्न पूरे जोशो खरोश से मना रही है। दिल्ली के बाद अब मुंबई में भी बदले बिहार का जश्न मनाने मुख्यमंत्री जाने वाले हैं। पटना में भी करोड़ों रूपये फूंक सरकारी नकली दीवाली मनाई गई थी। विज्ञापनों के जरिये बदलते बिहार की चमक दिखाने की पूरी कोशिश की सुशासन बाबू की सरकार ने। बावजूद इसके असलियत नहीं छिप पा रही। नीचे लिखा ऐसा ही एक विज्ञापन को ज़रा गौर से पढ़ें तो आपको पटना में लगे सरकारी होर्डिगों की याद आ जाएगी जिनपर लिखा होता था कि मैं बिहार हूं। मैंने अपने जीवनकाल के सौ वर्ष पूरे कर लिये हैं। इन सौ वर्षों में मैंने अपनी धरती पर कई ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल देखे हैं। मैं कई धरोहरों के उत्थान और पतन का साक्षी रहा हूं। अपने धरोहरों पर मुझे हमेशा गर्व रहा है। यह मेरे शान में चार चांद लगाते रहे हैं “लेकिन वक्त के साथ इनकी चमक फीकी पड़ती जा रही है और इनमें से कई तो बंद होने के कगार पर आ गये हैं। आज इसकी शुरुआत तारामंडल से हो गई है” चौंकिये मत, यह बिहार सरकार का विज्ञापन नहीं है बल्कि राज्य के एक धरोहर का सच है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि राजधानी का गौरव और देश भर में पटना को अलग पहचान दिलाने वाला तारामंडल पिछले एक हफ्ते से बंद है। यहां की लगभग सारी मशीनें ठप पड़ चुकी है। तारामंडल अपनी स्थापना के बीसवें साल में ही दम तोड़ चुका है। गौरतलब है कि वर्ष 1988 में सत्येन्द्र बाबू ने तारामंडल की आधारशिला रखी और वर्ष 1991 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने इसका उद्घाटन किया। जापान और कोलकाता के धोष-बोस एंड एसोसिएट्स के सहयोग से इसका निर्माण हुआ। गोडो ऑप्टिकल्स ऑफ जापान के द्वारा इंस्ट्रूमेंट की सप्लाई की गई। सूत्र बताते हैं कि करोड़ों की लागत से बने राजधानी के इस ऐतिहासिक धरोहर के रख-रखाव के प्रति शुरू से ही लापरवाही बरती गई। नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर तारामंडल के ही एक स्टाफ ने बताया कि यहां स्टार प्रोजेक्टर, एस्ट्रोविजन, जेनरेटर, एसी सहित लगभग 90 उपकरण खराब पड़े है। उन्होंने बताया कि आज मेंटेनेंस के अभाव में तारामंडल का यह हाल हो गया है। मेंटेनेंस पर प्रति वर्ष लगभग साढ़े चार लाख रुपये खर्च किये जाते हैं लेकिन मेंटेनेस के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है।
उन्होंने बताया कि चार कंप्रेशर को हमेशा 18-20 डिग्री सेल्सियस पर चलाना था लेकिन इसे 30-350 सेल्सियस पर चलाया जा रहा था। यूपीएस भी कई वर्षों से बदला नहीं गया था। यहां जेनरेटर भी जल चुका है। पिछले आठ दिनों से तारामंडल बंद है और इसमें काम करने वाले 12 स्थायी और 5 अस्थायी स्टाफ अपने भविष्य को ले सशंकित हैं। क्यों और कैसे इस हाल तक पहुंचा तारामंडल? जब इस संबंध में हमने विज्ञान एवं प्रावैधिकी विभाग के मंत्री से संपर्क करना चाहा तो उनका मोबाइल उनके सिक्योरिटी गार्ड को पास था। जब विभाग के प्रधान सचिव अरूण कुमार सिंह से इस संबंध में पूछने से वे तारामंडल बंद होने की खबर से अपने आपको अनजान बताते हुए कहते हैं कि इसके लिए तो प्रोजेक्ट डाइरेक्टर हैं वही पूरी जानकारी देंगे। परियोजना निदेशक उपेन्द्र नारायण सिंह ने जो जानकारी दी वह चौंकाने वाली थी। उन्होंने बताया कि हमने इस संबंध में 2008 में ही सरकार को सूचना दे दी थी कि तारामंडल बंद होने के कगार पर है। लेकिन अभी तक इसकी सुध नहीं ली गई है। वह अपने आप को नन टेक्निकल बताते हुए कई मामलों से बचते नजर आये।
उन्होंने बताया कि मैं बिहार प्रशासनिक सेवा से आया हूं और इतिहास का छात्रा रहा हूं। देश में दूसरे सबसे बड़े तारामंडल का हाल 100 वर्षों के अंदर ऐसा कैसे हो गया? सरकार ने 2008 में ही इसकी सुध क्यों नहीं ली? क्या वह इसके बंद होने का इंतजार कर रही थी? ऐसे कई सवाल हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा है। राज्य की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर सरकार ने भव्य समारोह का आयोजन किया था। वर्तमान सरकार सूबे में सुशासन लाने का दावा करती है। लेकिन राजधनी में स्थित ऐतिहासिक धरोहरों का क्या हाल है उसे नहीं पता है। शताब्दी समारोह के समापन कार्यक्रम में भाग लेने कल राजधानी में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी आ रहे हैं। उन्हें भी यह पता नहीं होगा कि राज्य की सरकार अपने धरोहरों को संजोने में भी सफल नहीं रही है। तारामंडल का यह हाल प्रदेश को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने का दावा करने वाली सरकार के मुंह पर एक तमाचा है। एक नन टेक्निकल ऑफिसर को टेक्निकल पोस्ट पर काबिज करना भी संदेहास्पद है। केवल बीस वर्षों में उपकरणों का ठप पड़ जाना कहीं-न-कहीं भ्रष्टाचार की कहानी कह रहा है। शताब्दी के जश्न के बीच सरकार जगकर अपने धरोहरों पर ध्यान देगी या ऐसी खबरों का गला घोंट सिर्फ सुशासन का ढोल पीटेगी। क्या अब भी सरकार की नींद खुलेगी?
लेखक राजीव रंजन चौबे सांध्य प्रवक्ता खबर के संपादक हैं.


