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बुनकरों की समस्याएं राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बने

आज़ादी की बीते 63 सालों में देश के लाखों बुनकरों की समस्याएं और उनकी ग़रीबी दूर होने की बजाय बढ़ती ही चली जा रही है। सरकार की ओर से मिलता है तो बस आश्वासन। देश के जिन हिस्सों में बुनकरों की संख्या ज़्यादा है वहाँ आप जाएँ तो पाएंगे कि विकास की राह में यह इलाक़ा कितना पीछे छूट गया है। दूसरों के तन ढंकने के लिए कपड़ा बुनने वाले बुनकर नंगे बदन काम करते हुए दो जून की रोटी को तरस रहे हैं। गंदगी और बीमारियों के साथ तालेमल बिठाते हुए काम कर रहे इन लोगों ने शायद यह मान लिया है कि उनके हिस्से में इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं। ना तो न्यूनतम मज़दूरी मिलती है और ना ही लोककल्याणकारी राज्य की सुविधाएँ; शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी आदि भी इनके हिस्से नहीं आता है। हर रोज-रोटी की चिंता में हड़तोड़ परिश्रम करने सारा परिवार जुटा रहता है ऐसे में बच्चों को स्कुल भेजने की सोच नहीं पाते। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब मिलकर काम करते हैं तो मुश्किल से गुजर हो पाता है। घर में किसी के बीमार होने या बेटी की शादी के बाद मकान बेचना पड़ रहा है।

आज़ादी की बीते 63 सालों में देश के लाखों बुनकरों की समस्याएं और उनकी ग़रीबी दूर होने की बजाय बढ़ती ही चली जा रही है। सरकार की ओर से मिलता है तो बस आश्वासन। देश के जिन हिस्सों में बुनकरों की संख्या ज़्यादा है वहाँ आप जाएँ तो पाएंगे कि विकास की राह में यह इलाक़ा कितना पीछे छूट गया है। दूसरों के तन ढंकने के लिए कपड़ा बुनने वाले बुनकर नंगे बदन काम करते हुए दो जून की रोटी को तरस रहे हैं। गंदगी और बीमारियों के साथ तालेमल बिठाते हुए काम कर रहे इन लोगों ने शायद यह मान लिया है कि उनके हिस्से में इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं। ना तो न्यूनतम मज़दूरी मिलती है और ना ही लोककल्याणकारी राज्य की सुविधाएँ; शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी आदि भी इनके हिस्से नहीं आता है। हर रोज-रोटी की चिंता में हड़तोड़ परिश्रम करने सारा परिवार जुटा रहता है ऐसे में बच्चों को स्कुल भेजने की सोच नहीं पाते। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब मिलकर काम करते हैं तो मुश्किल से गुजर हो पाता है। घर में किसी के बीमार होने या बेटी की शादी के बाद मकान बेचना पड़ रहा है।

देश में लाखों बुनकर परिवार क़र्ज़ और ग़रीबी के चलते इस धंधे को छोड़ चुके हैं और जो बचे हुए हैं वे अब आत्महत्या करने पर मजबूर है। चुनाव आते ही हजारों करोड़ की ऋण माफ़ी और अन्य योजनाओं की घोषणा कर दी जाती है लेकिन राहत के नाम पर ग़रीब बुनकरों को एक फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई। वर्तमान में अधिकांश बुनकर पावरलूम चला कर कपड़ा तैयार करते हैं। उनकी समस्याएं भी हस्तकरघा बुनकरों से कम नहीं हैं। बावजूद इसके विद्युत करघा (पावरलूम) चलाने वाले बुनकरों को बुनकर क्रेडिट कार्ड का लाभ नहीं मिल रहा है। पूछने पर अधिकारी कहते है कि बुनकर क्रेडिट कार्ड हस्तकरघा बुनकरों के लिए हैं। कागजों पर तो हर साल केन्द्र की ओर से महत्‍वाकांक्षी बताए जाने वाली योजनाएं बनाई जाती है। पिछले वर्ष भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा पावरलूम सर्विस सेंटर के माध्यम से देश भर में ‘एकीकृत कौशल विकास योजना’ का हल्ला मचाया गया था। इस योजना के तहत बेसिक वीविंग, शटललेस वीविंग, जॉबर व फिटर, फैब्रिक प्रोडेक्शन एवं एडवांस ट्रेनिंग इन फैशन एण्ड डिजाइन टेक्नोलॉजी समेत पांच विधाओं में बुनकरों को प्रशिक्षित कर व्यापार की मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही गयी थी। लेकिन महीने बीते जाने पर भी वह योजना कहीं धरातल पर दिखाई नहीं पड़ती है।

भारत में खेती के बाद असंगठित क्षेत्र में सबसे बड़ा रोजगार उपलब्ध करने वला क्षेत्र है बुनकरी – बिहार के भागलपुर, यूपी में वाराणसी, भदोही, आज़मगढ़, चंदौली, मऊ, टाडा, मऊरानीपुर, ललितपुर, इलाहाबाद और पिलखुआ, हरियाणा के सोनीपत और पानीपत, राजस्थान के कोटा, उत्तराखंड, छत्‍तीसगढ़, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सहित देश भर में तक़रीबन 63 लाख बुनकर हैं। सवाल उठता है कि आबादी के हिसाब से सबल बुनकर समुदाय की समस्याएं कभी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा क्यों नहीं बन पाती है? क्यों नहीं कोई राजनीतिक दल इनके पक्ष में खड़ा दिखाई पड़ता है? इन सवालों के जबाव में बुनकरों की समस्या पर सालों से काम कर रहे भाजपा बुनकर प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक बसंतजी कहते हैं कि देश में इतने सालों में बुनकरों की हकमारी होती आ रही है। अब देश भर के बुनकर अपने अधिकारों की मांग को लेकर सजग और संगठित हो रहे हैं। हमारी मांग है कि प्रत्येक जिले में दिल्ली हाट जैसा उपक्रम स्थापित हो जहां बुनकर अपना तैयार वस्त्र की प्रदर्शनी व बिक्री कर सके।

उन्‍होंने कहा कि बुनकरों के सारे कर्जे अविलम्ब माफ कर उनको कच्चे माल की उपलब्धता और आधुनिक तकनीक मुहैया कराए जाएँ। वर्ष भर में बुनकरों को अधिकतम 100 दिन का ही काम मिल पाटा है, उनको वर्ष भर काम मिले इसकी व्यवस्था केन्द्र सरकार करे। इनके लिए भी नरेगा जैसी योजना और विशेष स्वास्थ्य बीमा योजना चलाई जाए। किसान कैबिनेट की तरह बुनकर और कारीगर कैबिनेट बने। बुनकर-कारीगर कमीशन, बुनकरों के लिए यूनिवर्सिटी, अलग से बैंक और अलग से मंत्रालय बनाया जाए। ऐसे ही मांगों को लेकर हम आगामी 8 जून को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हजारों बुनकरों का राष्ट्रीय सम्मलेन कर रहे हैं। बहरहाल, बुनकरों का राष्ट्रीय सम्मलेन दिल्ली में आयोजित होने से उम्मीद की जा रही है कि बुनकरों की समस्याओं पर राजनीतिक दलों के बीच साथ खड़े होने की होड़ शुरू होगी। इससे पहले भी यूपी चुनाव के दौरान मायावती और राहुल गाँधी के बीच बुनकरों की बदहाली को लेकर एक दूसरे पर आरोप लगाए गए थे।

लेखक जयराम विप्‍लव पत्रकारिता से जुड़े हुए है.

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