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बेशर्म हो गई हैं सरकारी कंपनियां, खबरों का भी कोई असर नहीं

जी हाँ, इस बात को पढ़कर कुछ लोग तो जनता के इस कथन पर बहुत बुरा सोचेंगे लेकिन जो लोग इस बात की गहराई में जायेंगे उनकी जरूर इस बात पर सहमती बन जायेगी. दरअसल आजकल के दौर में देखने को मिल रहा है कि अगर आप किसी समस्या की खबर को प्रमुखता से उठाते हो और उसमें किसी अधिकारी के शामिल होने की बू आती है तो आप छाप-छाप कर थक जाओगे, लेकिन समस्या जस की तस रहेगी. ना तो उस समस्या का समाधान ही होगा ना ही समस्या पैदा करने वालों पर कोई कार्रवाई ही होगी. हां, आपके पीछे कुछ लोग जरूर लग जायेंगे जो आप खरीदने की कोशिश करेंगे अगर आप बिक तो ठीक नहीं तो आपको अस्पताल या ऊपर पहुंचाने का पुख्ता बंदोबस्त जरूर कर दिया जाएगा.

जी हाँ, इस बात को पढ़कर कुछ लोग तो जनता के इस कथन पर बहुत बुरा सोचेंगे लेकिन जो लोग इस बात की गहराई में जायेंगे उनकी जरूर इस बात पर सहमती बन जायेगी. दरअसल आजकल के दौर में देखने को मिल रहा है कि अगर आप किसी समस्या की खबर को प्रमुखता से उठाते हो और उसमें किसी अधिकारी के शामिल होने की बू आती है तो आप छाप-छाप कर थक जाओगे, लेकिन समस्या जस की तस रहेगी. ना तो उस समस्या का समाधान ही होगा ना ही समस्या पैदा करने वालों पर कोई कार्रवाई ही होगी. हां, आपके पीछे कुछ लोग जरूर लग जायेंगे जो आप खरीदने की कोशिश करेंगे अगर आप बिक तो ठीक नहीं तो आपको अस्पताल या ऊपर पहुंचाने का पुख्ता बंदोबस्त जरूर कर दिया जाएगा.

इसका उदाहरण आपको दे भी दें. पिछले 4 साल से धौलपुर जिले में ओवरब्रिज बनाने का काम चल रहा है, कछुआ चाल से चल रहे इस काम कि वजह से पूरा धौलपुर धूलपुर में तब्दील हो चुका है, अब तक सैकड़ों लोग दमा और खांसी जैसी घातक बीमारियों के शिकार हो चुके हैं. इसका कारण इसे बना रही कम्पनी की लापरवाही है, इस कम्पनी ने इस ओवरब्रिज को बनाने से पहले ना तो सर्विस रोड़ दिया ना ही खोदी गई सड़कों को ठीक से बंद किया, जिस वजह से आये दिन यहाँ हादसे होते रहते हैं. इस खबर को राज्य का एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र प्रतिदिन प्रमुखता से छाप रहा है. ये खबर पिछले कई महीनों से लगातार छापी जा रही है. इस खबर को इस समाचार पत्र ने जनता का मुद्दा बनाकर पेश किया था, लेकिन कुछ लोगों ने अब समाचार पत्र पर ही उंगली उठाना शुरू कर दिया है. लोग समाचार पत्र पर आरोप लगा रहे हैं कि वो लापरवाही से काम कर रही कम्पनी से पैसे चाहते हैं.

आरोप लगाने वाले वही लोग है जिनकी समस्या को देखकर ये मुद्दा उठाया गया था. अब दूसरा और सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या ये खबर जिले के किसी आला अधिकारी ने नहीं पढ़ी. अगर नहीं पढ़ी तो उसे अधिकारीगिरी करने का हक़ नहीं और अगर पढ़ी तो आजतक कार्यवाही क्यू नहीं हुई. क्या दाल में कुछ काला है? अब अधिकारी के बाद यही सवाल राज्य के मंत्रियों और राजनेताओं से पूछे तो उनका भी यही हाल है. पिछले कई सालों से बीमारी और दुर्घटनाओं की मार झेल रही इस जनता के दुःख से इन नेताओं को फर्क नहीं पढ़ता. अगर कार्रवाई की बात करे तो अधिकारी हो या नेता इस मामले में पूरी की पूरी दाल काली नजर आती है.

खैर, अब खबरों पर होने वाली कार्रवाई कहां तक जाती है और बाद में उनका क्या हश्र किया जाता है ये किसी से छिपा नहीं. अब यहाँ एक सवाल में भी आप लोगों से पूछने की चेष्टा कर रहा हूँ कि अगर कोई समाचार पत्र या टीवी चैनल गलती से किसी मंत्री या नेता को कुछ ऐसा कह दे जो उसे चुभ जाए तो फिर देखिये ये नेता कैसे उस खबर पर आपत्ति जाहिर करते हैं. अब सवाल ये है कि अपने गिरेबान में हाथ जाने पर ये नेता और अधिकारी तिलमिला जाते हैं. क्या इन्हें जनता के दर्द का कोई आभास नहीं. क्या ये भूल गए कि लोकतंत्र में जिस सत्ता का सुख ये भोग रहे हैं, वहां जाने का रास्ता इसी जनता के घर होकर जाता है. खैर जो भी आप कुछ भी कहे पर मैं इतना जरूर कहूंगा कि वे मूतमईन की पत्थर पिघला नहीं करते….हम बेकरार है आवाज में असर के लिए…..जय हिंद.

लेखक नीरज नरवार धौलपुर में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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