रायपुर। युवा उपन्यासकार तथा दैनिक हरिभूमि में कार्यरत पत्रकार ब्रह्मवीर सिंह के उपन्यास दंड का अरण्य का विमोचन 2 मार्च को होगा। ख्यात प्रकाशक, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित उपन्यास नक्सवाद से उपजे दर्द को लेकर निष्पक्ष दृष्टि है। उपन्यास का विमोचन मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के मुख्य आतिथ्य तथा केंद्रीय कृषि मंत्री डॉ. चरणदास महंत की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में किया जाएगा। मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर होंगे। विमोचन समारोह के आयोजक हरिभूमि पत्र समूह के प्रबंध संपादक डा. हिमांशु द्विवेदी हैं। 2 मार्च शाम 6 बजे कार्यक्रम सिविल लाइंस स्थित न्यू सर्किट हाउस के कांफ्रेंस हॉल में होगा।
नक्सली और खाकी के बीच पिसती आदिवासियों की सांसों का लेखा-जोखा है और मौतों के बाद छलके आंसुओं को स्वर देती अभिव्यक्ति है। सैकड़ों लोगों की हत्याओं के सौदागरों, गुनाहगारों के चेहरों से नकाब उठाता है। बेबस लोगों की लाशों पर भावनाओं के कारोबार का कड़ुवा सच है। लेखक को उम्मीद
है कि उपन्यास नक्सलवाद के बाद उपजी लोगों की बेबसी को नये नजरिए से परिभाषित करेगा। विचारों के आवरण को हटाएगा…सच को न देखने के लिए मुंदी आंखों को खोल सकेगा।
वह ऐसे मनुष्यों की मौत से उपजा सवाल है, जिनका जीवन हद तक कठिन है, जिन्हें सहजता से कुछ हासिल होता है तो वो है मौत…। जो मर गए हैं वो अपने पीछे छोड़ गए हैं अपनों की जिंदा लाशें और जो बच गए हैं उनकी एक-एक सांस दूसरों के रहमोकरम पर है। वनवासी कहलाने वाले लोगों को कभी मुखबिरी के शक में, कभी नक्सली होने के भ्रम में, क्षत-विक्षत लाश में तब्दील होते देखना रोज की दास्तान है, कभी साक्षात, कभी तस्वीरों में। माओवादियों की गिरफ्त में, सैन्य बलों के खौफ में जीते-मरते लोगों की बेबसी का सहमा-सा सवाल ही इस पुस्तक के लेखन की वजह बना है। आखिर, कैसे संभव है…? सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में किसी इंसान को काट दिया जाए, वह भी उसके परिजनों के सामने। सिर्फ इसलिए क्योंकि शक है कि वह पुलिस का मुखबिर है। यह होता है खुलेआम…दंडकारण्य में। छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, झारखंड और महाराष्ट में। पश्चिम बंगाल समेत देश के कई राज्यों में वैसे ही हालात हैं।
आखिर, कैसे संभव है…? पुलिस झुंडों में इंसानों का शिकार कर दे, नक्सली बताकर और कहीं उफ तक न हो…। मरने वाले वनवासी ही हैं। हर तरफ मौत उन्हीं के हिस्से में हैं तो उनकी तरफ कौन है? अगर सब हितैषी हैं तो उनके विरुद्ध कौन, उनका हत्यारा कौन, उनका अपना कौन? आदिवासियों के हित में आग उगलती मीडिया, उनके अधिकार के लिए लड़ते संगठन, सरकारी लड़ाकुओं और माओ के वैचारिक वंशज? इन्हीं सवालों से उपजी पीड़ा की शब्दिक अभिव्यक्ति है दंड का अरण्य। संभव है, पुस्तक की कुछ पंक्तियां नक्सलियों को हद तक नागवार गुजरें, कुछ पात्र राजनेताओं को खुद की भूमिका में नजर आएं। कुछ अध्याय पुलिस और सशस्त्र बलों की भुकटियां तान सकते हैं। या फिर…मीडिया या स्वयंसेवी संगठनों के कुछ मंसूबे शब्दों में साकार दिखने लगें। यह संभव है…।


