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भाजपा को ही निगलने को तैयार है पार्टी का बूढ़ा शेर

ब्लाग के जरिये भाजपा की अंदरुनी राजनीति पर टिप्पणी कर लाल कृष्ण आडवाणी ने संकेत दे दिये हैं कि गडकरी के भाजपा के चलाने के तौर तरीकों वह नाखुश हैं, और 2014 के आने वाले चुनावों में प्रधनमंत्री की दावेदारी उनके जीते जी तो कम से कम कोई नहीं ले सकता। सभी जानते हैं कि नितिन गडकरी संघ द्वारा पार्टी पर थोपे गये नेता हैं। हाल ही में 5 राज्यों के विधान सभा चुनावों में लाल कृष्ण आडवाणी के मना करने के बावजूद उन्होंने एनएचआरएम घोटाले के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में न सिर्फ शामिल किया बल्कि उनके प्रचार प्रसार अभियान की कमान भी पार्टी के कार्यकर्ताओं के कंधे पर ही रखा, लिहाजा भ्रष्टाचार के खिलाफ चले अन्ना के आन्दोलन की सहानुभूति भी पार्टी खोती गई।

ब्लाग के जरिये भाजपा की अंदरुनी राजनीति पर टिप्पणी कर लाल कृष्ण आडवाणी ने संकेत दे दिये हैं कि गडकरी के भाजपा के चलाने के तौर तरीकों वह नाखुश हैं, और 2014 के आने वाले चुनावों में प्रधनमंत्री की दावेदारी उनके जीते जी तो कम से कम कोई नहीं ले सकता। सभी जानते हैं कि नितिन गडकरी संघ द्वारा पार्टी पर थोपे गये नेता हैं। हाल ही में 5 राज्यों के विधान सभा चुनावों में लाल कृष्ण आडवाणी के मना करने के बावजूद उन्होंने एनएचआरएम घोटाले के आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में न सिर्फ शामिल किया बल्कि उनके प्रचार प्रसार अभियान की कमान भी पार्टी के कार्यकर्ताओं के कंधे पर ही रखा, लिहाजा भ्रष्टाचार के खिलाफ चले अन्ना के आन्दोलन की सहानुभूति भी पार्टी खोती गई।

दूसरे तरफ झारखंड के राज्य सभा चुनावों में एक ऐसे उम्मीदवार को समर्थन दिया जो सिर्फ और सिर्फ पार्टी की फंडिंग करता था। पार्टी में मनीतंत्र के हावी होने एवं कार्यकर्ताओं के पार्टी से मायूस होने की स्थिति में आखिरकार आडवाणी का धैर्य जबाव दे ही गया और जिस तरह केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरी भाजपा अपना वजूद टटोल रही थी, उस बीच आडवाणी की पार्टी के खिलाफ टिप्पणी ने सारा माहौल ही बदल कर रख दिया। अब यह तो तय हो गया है कि अब भाजपा संघ, मोदी, गडगरी और आडवाणी के बीच रस्साकस्सी में फंसी रहेगी, ऐसी स्थिति में एनडीए का क्या होगा यह बड़ा सवाल खुद भाजपा के सामने ही आ खड़ा हो गया है, जिससे पार पाना फिलहाल तो भाजपा के लिये सम्भव नहीं दिखता। बाजपेयी युग की समाप्ति के बाद धर्मनिरपेक्षता की राह पर निकले आडवाणी जिन्ना की मजार पर क्या गये संघ ने उनको किनारे लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

जाहिर बात है कि आडवाणी जैसा जमीनी नेता इस स्थिति को कैसे बर्दास्त कर सकता था। ये आडवाणी का कमाल ही था जिन्होंने रथ यात्राओं के जरिये भाजपा को न सिर्फ सत्ता का स्वाद चखाया बल्कि कांग्रेस का विकल्प भी दिया। इस योगदान को अनदेखा कर संघ ने उन्हें बेआबरु करके नागपुर के सेवक को भाजपा की कमान थमाया, उससे यह आक्रोश तो आना ही था। लंबे समय से प्रधनमंत्री की कुर्सी पर निगाह लगाये आडवाणी की बिना पर कभी मोदी तो कभी गडकरी का नाम उछाला जा रहा था। ऐसी स्थिति में कुटिल राजनीतिज्ञ आडवाणी ने अगर ‘भारत बंद’ के ही दिन को अपनी भड़ास निकालने का उपयुक्त समय चुना इससे कम से कम उनके दो अरमान तो पूरे हो गये। पहला भारत बंद का मजा लूटने का भाजपा का सारा जोश शाम होते-होते ठंडा पड़ गया, दूसरा गडकरी विरोधी नेताओं को उन्होंने यह संदेश तो दे ही दिया कि वह जब चाहें संघ और गडकरी की हवा निकाल सकते हैं।

वैसे भी दूसरी बार अध्यक्ष बनने को तैयार गडकरी क खास संजय जोशी को गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी ने ठिकाने लगाया है। उससे अडवाणी को भी लग रहा है कि पार्टी के अंदर के लोगों के जरिये ही संघ और गडकरी दोनों को उनकी औकात बताई जा सकती है। 2014 के चुनावों में कांग्रेस के नुकसान को भुनाने में लगी पार्टी के लिये इससे बड़ा झटका क्या हो सकता है कि उसका बूढ़ा घायल शेर अब उनको ही निगलने को तैयार हो गया है। ऐसी स्थिति में भाजपा के नेता रोये कि हंसे उन्हें खुद ही समझ में नहीं आ रहा है, क्योंकि अपने ही अपने घर को उजाड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

लेखक संजय पांडेय आगरा में दैनिक अमर भारती से जुड़े हुए हैं.

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