Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

भाजपा : विकल्प या प्रतिलिपि?

अगर भाजपा के मुंबई अधिवेशन का लक्ष्य सिर्फ नितिन गडकरी को दुबारा अध्यक्ष बनवाना था तो उसमें तो उसे सौ प्रतिशत सफलता मिली है। यों भी गडकरी के अलावा विकल्प भी क्या था? जब छाछ खट्टी हो तो उसे पीनेवाले कितने मिलते हैं? इस समय भाजपा की जो हालत है, वह एक ऐसे शेर की है, जिसके आठ पांव और दो सिर हैं। भला उस पर सवारी कौन करे? इस सवारी के लिए गडकरी से ज्यादा भला उम्मीदवार कौन हो सकता था, जिसका कोई निजी एजेंडा नहीं है, जिसकी किसी नेता से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है और जिसकी महत्वाकांक्षा का कोई सुराग किसी पत्रकार को अभी तक नहीं लगा है। उन्हें जब भी कहा जाएगा, वे अपनी चदरिया जस की तस धर देंगे और नागपुर चलते बनेंगे।

अगर भाजपा के मुंबई अधिवेशन का लक्ष्य सिर्फ नितिन गडकरी को दुबारा अध्यक्ष बनवाना था तो उसमें तो उसे सौ प्रतिशत सफलता मिली है। यों भी गडकरी के अलावा विकल्प भी क्या था? जब छाछ खट्टी हो तो उसे पीनेवाले कितने मिलते हैं? इस समय भाजपा की जो हालत है, वह एक ऐसे शेर की है, जिसके आठ पांव और दो सिर हैं। भला उस पर सवारी कौन करे? इस सवारी के लिए गडकरी से ज्यादा भला उम्मीदवार कौन हो सकता था, जिसका कोई निजी एजेंडा नहीं है, जिसकी किसी नेता से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है और जिसकी महत्वाकांक्षा का कोई सुराग किसी पत्रकार को अभी तक नहीं लगा है। उन्हें जब भी कहा जाएगा, वे अपनी चदरिया जस की तस धर देंगे और नागपुर चलते बनेंगे।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि गडकरी के पुनर्निर्वाचन के अलावा मुंबई अधिवेशन में से निकला क्या? निकला यह कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। निकला यह कि मोदी ने संघ को झुका दिया और संजय जोशी का इस्तीफा करवा दिया। और यह भी निकला कि सुषमा स्वराज और अरूण जेटली जैसे नेता हाशिए में चले गए और लालकृष्ण आडवाणी घर के ‘अति वृद्घ’ की उपमा पा गए। ऐसा नहीं है कि भाजपा नेताओं ने मुंबई अधिवेशन में जमकर भाषण नहीं दिए या सरकार के विरूद्घ उन्होंने अपनी भड़ास डंटकर नहीं निकाली या अध्यक्ष ने कोई भी प्रेरणादायक या मौलिक बात नहीं की। यह सब कर्मकांड हुआ लेकिन छवि क्या बनी? क्या यह बनी कि भाजपा देश का सशक्त विपक्षी दल है? क्या वह कांग्रेस का विकल्प बन सकता है? क्या उसके पास ऐसा वैकल्पिक नक्शा है, जो दिग्भ्रम में फंसे देश को नई दिशा दिखा सके? शायद नहीं। दूर-दूर तक नहीं।

देश के आम आदमी को क्या पड़ी है कि कौन प्रधानमंत्री बनेगा? सुषमा बने, आडवाणी बने या मोदी बने, उसकी बला से! उसे क्या मिलनेवाला है? डॉ. मनमोहन सिंह जैसे महान अर्थशास्त्री  ने प्रधानमंत्री बनकर क्या तीर मार लिया? मंहगाई डायन ने वह मार लगाई है और भ्रष्टाचार का राक्षस देश की छाती पर ऐसा सवार है कि उसने प्रधानमंत्री पद को ही फीका नहीं कर दिया है बल्कि अर्थशास्त्र के ज्ञान पर भी प्रश्न-चिन्ह लगा दिया है। भाजपा अधिवेशन में और उसके पहले जितने भाजपाई नाम प्रधानमंत्री पद के लिए उभरे हैं, क्या उनमें से एक भी ऐसा है, जो तारणहार दिखाई पड़ता है? नरेंद्र मोदी ‘विकास-पुरूष’ का नया चोला धारण जरूर कर रहे हैं लेकिन ‘विनाश-पुरुष’ का जो डामर उनके कपड़ों पर अब तक चिपका हुआ है, वह अगले आम चुनाव तक धुल पाएगा या नहीं, यह स्वयं उन्हें भी पता नहीं है। इस साल के अंत तक गुजरात में होनेवाली उनकी तीसरी जीत शायद उन धब्बों को धो डाले लेकिन उसके पहले उन्हें संभावित प्रधानमंत्री घोषित करना उनके अवसरों पर तुषारापात करना है। इससे न पार्टी को फायदा है न देश को! न सूत है न कपास है लेकिन हवा में ही लट्मलट्ठा चल रहा है।

भाजपा ने तो ऐसी कोई घोषणा नहीं की है। यह शायद मीडिया की कृपा है। हमारा मीडिया बड़ा जादूगर है। तिल का ताड़ बनाने में उसका कोई मुकाबला नहीं है। वह अन्ना हजारे को गांधी बना देता है और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री! बाद में वह अपने हाथ भी मलता है और आंखें भी। दांत भी पीसता है। लेकिन वह क्या करे? वह भी लहर के साथ बह रहा है। जब राजनीति इतनी उथली हो गई है तो वह पागल है, जो गहरे में गोता लगाएगा? अभी भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है लेकिन मीडिया ने कर दिया है। भाजपा छाछ को भी फूंक-फूंककर पी रही है। पिछले चुनाव में उसने अपने प्रधानमंत्री की घोषणा कर दी थी। बाद में जो हुआ, वह सबको पता है। मीडिया का तर्क यह रहा हो कि संजय जोशी को गडकरी लाए और गडकरी को संघ लाया और फिर गडकरी को दुबारा अध्यक्ष बनने के पहले संजय को हटाना पड़ा याने मोदी जीता और संघ हारा। यह बहुत ही भोला विश्लेषण है। क्या मोदी संजय के मुकाबले कम संघी हैं? क्या वे वसुंधरा राजे हैं? क्या मोदी का एजेंडा संघ का एजेंडा नहीं है? मोदी से बढ़कर संघ का ‘पोस्टर बॉय’ कौन है? एक व्यक्तिगत मामले को तूल देकर मीडिया ने भाजपा के मुंबई अधिवेशन को पटरी से नीचे उतार दिया। वास्तव में मोदी के आग्रह ने संजय जोशी को नई ऊँचाई दे दी। मोदी को क्या फायदा हुआ, यह वह खुद नहीं बता सकते। क्या संघ से पंगा लेकर वे प्रधानमंत्री बन सकते हैं? गुजरात में वे अपने दम पर काफी कुछ कर सकते हैं लेकिन भारत सिर्फ गुजरात नहीं है।

सिर्फ भाजपा और संघ भी अपने दम पर किसी को प्रधानमंत्री नहीं बनवा सकते? गठबंधनवाले नेताओं और पार्टियों को पटाए बिना कौन प्रधानमंत्री बन सकता है। नरेंद्र मोदी ने पटाने की कला कभी सीखी ही नहीं। वह तो अटाने और खटाने के पंडित हैं। वह देश के किसी भी मुख्यमंत्री के साथ अपने का अटा (प्रतिस्पर्धा) सकते हैं और शंकरसिंह वाघेला, केशु भाई और हरेन पंड्या जैसों को खटाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है।

मुंबई अधिवेशन से अगर कोई आशा की लहर उठती, कोई आंदोलन का आह्रवान आता, कोई विकल्प उभरता तो आज के हालात में भाजपा भारत की आवाज बन जाती। लेकिन लगता है कि भाजपा कांग्रेस का विकल्प बनने की बजाय कांग्रेस की ही प्रतिलिपि बनती चली जा रही है। जैसे नागनाथ, वैसे सांपनाथ! कोई विचारधारा नहीं, कोई नेतृत्व नहीं, कोई दृष्टि नहीं और कोई राष्ट्रीय लक्ष्य नहीं। उसे न तो जनता को जगाना है, न उसे शिक्षित करना है और न ही उसे अहिंसक प्रतिरोध के लिए तैयार करना है। न ही गांधी और लोहिया की तरह भ्रष्टाचार के विरूद्घ सविनय अवज्ञा का आव्हान करना है। सत्ता-कामना के अलावा कोई कामना नहीं है। कहां गई, वह ‘निराली’ पार्टी? यह पार्टी नहीं है, अब यह सिर्फ चुनावी मशीन रह गई है, जैसी कि कांग्रेस है। मुंबई अधिवेशन में चुनाव की भी कोई तैयारी नहीं दिखी। उसकी जरूरत भी क्या है? भाजपा पर तो कांग्रेस की कृपा अपने आप बरस रही है। कांग्रेस खुद भाजपा के लिए थाली सजा रही है। उसे तो बस जीमने के लिए बैठना भर है। देश भूखा मरे तो मरा करे। उसकी चिंता किसे है?

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक जाने माने राजनीतिक विश्‍लेषक हैं.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...