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भाजपा, हवा-हवाई नेता और नूरा कुश्‍ती

शायद पिछले आम चुनावों में हुई गलतियों को बीजेपी नेताओं ने भुला दिया है। क्यों कि पिछले आम चुनावों के रिजल्ट को लेकर तो बीजेपी के कुछ नेता इतने आशान्वित थे कि रिजल्ट आने से पहले से ही अपने मनपसंद मंत्रालयों को लेकर अपनी अपनी उन्होंने चौसर बिछानी शुरु कर दी थी..पर क्या करें..भारतीय भलमानुसों का..जिसने बीजेपी नेताओं को उनकी जमीन दिखा दी। खैर ये तो रही बात पिछले चुनावों की। अब बात करते हैं वर्तमान की…हालात यूपीए के खिलाफ हैं…बीजेपी को लगता है कि इस बार वो सत्ता में आ सकते हैं…इसलिये बीजेपी नेताओं ने एक बार फिर से (संभावित) 2014 में होने वाले आम चुनावों में फतह हासिल करने को लेकर सपने देखने शुरु कर दिये हैं। जब सरकार ने पेट्रोल के दाम बढ़ाये तो बीजेपी को बैठे बिठाये मौका मिल गया और आनन फानन में मुम्बई बैठक में बीजेपी संसदीय दल के नेता एल के आडवाणी ने एनडीए की तरफ से 31 मई को भारत बंद की घोषणा कर दी। जनता तो नाराज ही थी सो समर्थन मिलना ही था…बीजेपी को भी लगा कि उसको भी इस सफल बंद से सियासी फायदा मिलेगा लेकिन क्या करें बीजेपी की अन्तरकलह का…उसी समय सामने आ गया खुद आडवाणी का ब्लॉग..जिसने पूरा दृश्य ही बदल दिया और एक बार फिर से चर्चा शुरु हो गई बीजेपी की नूरा कुश्ती की। 

शायद पिछले आम चुनावों में हुई गलतियों को बीजेपी नेताओं ने भुला दिया है। क्यों कि पिछले आम चुनावों के रिजल्ट को लेकर तो बीजेपी के कुछ नेता इतने आशान्वित थे कि रिजल्ट आने से पहले से ही अपने मनपसंद मंत्रालयों को लेकर अपनी अपनी उन्होंने चौसर बिछानी शुरु कर दी थी..पर क्या करें..भारतीय भलमानुसों का..जिसने बीजेपी नेताओं को उनकी जमीन दिखा दी। खैर ये तो रही बात पिछले चुनावों की। अब बात करते हैं वर्तमान की…हालात यूपीए के खिलाफ हैं…बीजेपी को लगता है कि इस बार वो सत्ता में आ सकते हैं…इसलिये बीजेपी नेताओं ने एक बार फिर से (संभावित) 2014 में होने वाले आम चुनावों में फतह हासिल करने को लेकर सपने देखने शुरु कर दिये हैं। जब सरकार ने पेट्रोल के दाम बढ़ाये तो बीजेपी को बैठे बिठाये मौका मिल गया और आनन फानन में मुम्बई बैठक में बीजेपी संसदीय दल के नेता एल के आडवाणी ने एनडीए की तरफ से 31 मई को भारत बंद की घोषणा कर दी। जनता तो नाराज ही थी सो समर्थन मिलना ही था…बीजेपी को भी लगा कि उसको भी इस सफल बंद से सियासी फायदा मिलेगा लेकिन क्या करें बीजेपी की अन्तरकलह का…उसी समय सामने आ गया खुद आडवाणी का ब्लॉग..जिसने पूरा दृश्य ही बदल दिया और एक बार फिर से चर्चा शुरु हो गई बीजेपी की नूरा कुश्ती की। 

इस एक ब्लॉग ने बीजेपी कार्यकर्ताओं की मेहनत पर पूरा पानी फेर दिया..कार्यकर्ताओं की मेहनत इसलिये बोल रहा हूं कि इस पूरे बंद में बड़े नेता तो सड़क पर कहीं दिखाई ही नही दिये…आडवाणी, गडकरी, जेटली और सुषमा स्वराज सहित कई बड़े नेता अपने एसी कमरों से बाहर ही नही निकले। लेकिन आडवाणी के ब्लॉग के समय को लेकर चर्चा आज भी बनी हुई है। और दबे स्वर में बीजेपी के आला नेता भी इस बात को मानते हैं कि आडवाणी जी ने अपने ब्लॉग में जो लिखा है वो सही लिखा है। फिर अब रही सही कसर मोदी और जोशी के खेल ने पूरी कर दी। लेकिन पार्टी की समस्या केवल इतनी नही है और नई भी नही है। बीजेपी और संघ इस खामी को जानते हैं लेकिन इसके बाबजूद भी इसको दूर नहीं कर पा रहे। माना जा रहा था कि नितिन गडकरी के आने के बाद स्थिति में बदलाव आयेगा…जमीनी कार्यकर्ताओं को संगठन में जगह मिलेगी..सम्मान मिलेगा लेकिन अब गडकरी का एक कार्यकाल सामने आ गया है…समीक्षा करें तो समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। पार्टी की सबसे बड़ी समस्या है चेहरे की और जमीन पर काम करने वाले नेताओं की। दूसरी तरह के नेताओं की तो बीजेपी में भरमार हैं…जिसके पास जितनी ज्यादा सिक्योरिटी..वो अपने को उतना ही बड़ा नेता समझता है। आज पार्टी में ऐसे नेताओं की संख्या ज्यादा हो गई हैं जो समझते हैं कि केवल टीवी चैनल्स पर चमकने से और जुगाड़ से संगठन में बड़ा पद मिलने से ही वो बड़े नेताओं की कतार में शामिल हो गये हैं।

दूसरी ओर गडकरी के शासन में पार्टी वकीलों पर ज्यादा निर्भर हो गई हैं। एक बड़े वकील साहब को उच्च सदन का नेता बना दिया तो दूसरे को महामंत्री के साथ साथ प्रवक्ताओं का भी हेड बना दिया। अब गडकरी साहब ने तो इनको दो दो पोस्ट एक साथ दे दी..पर बेचारे कार्यकर्ता फंस जाते हैं..क्यों कि इन नेताजी का परिचय कराते समय एक भी पोस्ट भूली तो उस बेचारे कार्यकर्ता की खैर नहीं। और तो और अगर पत्रकार भी इनको भूल से मुख्य प्रवक्ता की जगह केवल प्रवक्ता बोल दें तो उसको बाइट मिलनी असंभव हो जाती है। और ऊपर से तुर्रा ये कि ये साब बड़े गर्व से बताते हैं कि ये रामलला के वकील भी हैं..जैसे खुद भगवान श्रीराम इनके पास आये थे प्रार्थना करने कि हे श्री श्री जी आप ही मेरा केस लड़ने की कृपा करें। और फिर बाकी के वकीलों ने तो कुछ किया ही नहीं होगा। अब तीसरे वकील साब को भी राज्यसभा गिफ्ट में दे दी गई है। इनके भी अगर आपको दर्शन करने हों तो किसी न किसी न्यूज चैनल पर आपको मिल ही जायेंगे। वास्तव में देखा जाये तो इन वकील नेताओं का जनता या आम कार्यकर्ताओं से न कोई सीधा संवाद है ओर न कोई मतलब। हां इतना जरुर है कि राज्यसभा मिलने और न्यूज़ चैनल्स पर दिखने से इनकी वकालत की फीस जरुर बढ़ जाती है। अगर इनको कोई छोटा चुनाव भी लड़वा दिया जाये तो ये शायद इनको अपनी हैसियत पता चल जाये। और फिर बात अगर कानूनी राय या पार्टी केसों की है तो बाजार में पैसा फैंको…एक से बढ़कर एक वकील मिल जायेंगे…और जो समर्पित कार्यकर्ता कुछ दूसरे कारणों से चुनाव नही लड़ पाते उनको राज्यसभा में भेजना चाहिए….लेकिन पता नही ये छोटी सी बात कब पार्टी की समझ में आयेगी।

अब बात महामंत्रियों की कर लेते हैं। वरिष्ठ महामंत्री के बारे में कहावत है कि वो तो केवल अपने को मुख्यमंत्री बनाने के ताने बाने में ही लगे रहते हैं…एक अन्य महामंत्री अपना चुनाव हारने के बाद भी राज्यसभा में आ ही गये क्यों कि अपने अध्यक्ष और संघ के चहेते हैं.. इसलिये कई राज्यों के प्रभारी भी हैं भले ही खुद के अपने राज्य में पार्टी अपनी पहचान के संकट से गुजर रही हो.. लेकिन कहते हैं न कि जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का। महिला महामंत्री ने तो एक स्थानीय कारण को ही राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर पार्टी को ही टूट के कगार पर ला दिया था। ऐसे ही अन्य महामंत्री है जिनमें से आधों का तो कोई जनाधार नहीं है और जो रणनीति बनाते हैं पार्टी के 10 प्रटिशत वोट बैंक बढ़ाने की। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बीजेपी में कुछ मुस्लिम नेता भी हैं। लेकिन शायद ही इनका लाभ पार्टी को कभी मिला हो.. हां ये जरुर है कि ये पार्टी से फायदा उठाते रहते हैं… इनको मंत्री या सांसद बनाने का बाद भी 1 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक नही बढ़ा। इससे तो अच्छा होगा कि युवा और नये मुस्लिम चेहरों को सामने लाया जाये जो जमीन पर संर्घष करें लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या बीजेपी या गडकरी ऐसा दुस्साहस कर पायेंगे.. फिर आखिर कैसे 2014 के चुनावों में पार्टी की नैय्या पार लगेगी। क्या बीजेपी में जमीन से जुड़े नेताओं की वाकई में कमी आ गई है…क्या केवल एसी कमरों में बैठकर रणनीति बनाने से जीत हासिल हो जायेगी। यूपी चुनावों की हार के बाद भी बीजेपी इस ज़मीनी हकीकत को अब भी नहीं समझ पाई है। मुम्बई कार्यकारिणी में जरुर घोषणा की गई अब यूपीए सरकार के खिलाफ बीजेपी पार्टी संगठन संसद से सड़क तक की लड़ाई लड़ेगी…लेकिन शायद पार्टी नेताओं ने इसका गलत ही अर्थ निकाल लिया क्यों कि मुम्बई कार्यकारिणी के बाद  बीजेपी संगठन की ही लड़ाई सड़क पर आ गई हैं। और पिर ऐसा न हो कि 2014 में भी पिछले चुनावों से हाल हो…फिर बीजेपी नेता यही बोलेंगे कि…

न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम

न इधर के रहे, न उधर के रहे।

लेखक अंकुर शर्मा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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