उत्तर प्रदेश में चुनावी खुमार उतर चुका है साथ ही हारे-जीते सभी योद्धा अपने अपने शिविरों में लौट चुके हैं और अब शुरू हो चुकी है समीक्षा के नाम पर होने वाला नाटक-नौटंकी। सभी पार्टियां हार की समीक्षा के नाम पर कुछ न कुछ कर रही हैं। दिल्ली में राहुल गाँधी ने दूसरे नंबर पर रहे पार्टी प्रत्याशियों के साथ बैठक कर राय जानी और दिशा निर्देश भी दिए लेकिन सबसे मज़ेदार है भाजपा की समीक्षा। जरा गौर फरमाइए पार्टी विद डिफरेंस की डिफरेंट वर्किंग पर चुनाव से पहले राष्ट्रीय से लेकर प्रांतीय नेता सभी चिल्ला-२ कर कह रहे थे कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम चौंकाने वाले होंगे और भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाएगी। हालांकि भाजपा कार्यकर्ता की समझ नहीं आ रहा था क़ि ऐसी कौन सी संजीवनी बूटी नेताओं के हाथ लग गई जिसके बल पर नेता सैकड़ा पाने क़ी बात दूर पूर्ण बहुमत क़ी बात कर रहे हैं।
खुद पार्टी के एक प्रदेश महामंत्री की माने तो मुख्यमंत्री पद के एक दावेदार जो अब विधायक दल के नेता के रूप में युवा को मौका देने की वकालत कर रहे हैं, उनके यहां बाकायदा कैबिनेट और राज्य मंत्रियों की सूची बनने के साथ ही साथ विभागों को भी आबंटित कर दिया गया था और विभागों को लेकर कुछ लोगों ने अपनी नाराज़गी तक प्रकट कर दी थी। चलिए माना की कपोल कल्पनाओं में जीना भाजपा वालों की पुरानी आदत है, जो हकीक़त से मीलों नहीं कोसों दूर होती है, तो उसके परिणाम जैसे आने थे वैसे ही आये। छिबरामऊ, किदवई नगर, लखनऊ कैंट, लखनऊ मध्य, सरोजनीनगर, कन्नौज जैसी लो प्रोफाइल सीट्स जहां क़ि हार अवश्यम्भावी थी, ऐसी सीटों की बात छोड़िए बड़े-बड़े दिग्गज चुनाव हार गये। सूर्य प्रताप शाही, केशरी नाथ त्रिपाठी, ओमप्रकाश सिंह, रमापति राम त्रिपाठी समेत कई अन्य बड़े नेताओं को भी विरोधियों ने धूल चटा दी। शाही जी ने तत्काल मीडिया को अपने इस्तीफे की जानकारी दी लेकिन अगले ही दिन से पार्टी के कार्यक्रमों में बतौर अध्यक्ष उपस्थित भी होने लगे।
पूरे घटनाक्रम के बाद कार्यकर्ताओं ने सोचा कि शायद अब नेताओं की निद्रा टूटेगी और अभी तक अपने ही आभामंडल में आत्ममुग्ध लोग इमानदारी से हार के कारणों पर समीक्षा करेंगे लेकिन यहां भी कार्यकर्ताओं को निराशा ही हाथ लगी. उम्मीद थी की निष्पक्ष लोगों का पैनल बैठ कर १-१ विधानसभा की समीक्षा करेगा पर हुआ इसका उल्टा, जो चुनाव हारे थे उनकी ही अध्यक्षता में समितियों का गठन किया गया और उन्होंने ही अपनी समीक्षा कर हार का चैप्टर क्लोज कर दिया और अपने -२ नाम आगामी विधान परिषद के मनोनयन के लिए पैनल में शामिल करवा दिए। इससे पूर्व टिकट बंटवारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक पिछड़े नेता को भी राज्यसभा भेज दिया गया था।
दरअसल भाजपा के साथ त्रासदी यह है कि ये पराजित सेनापतियों की हताश फ़ौज में तब्दील हो चुकी है और पार्टी में चुनाव हार-२ कर वरिष्ठ हो चुके नेताओं के पास खोने को कुछ शेष नहीं रहा है क्योंकि वे चुनाव हारे या जीतें उनके लिए राज्यसभा और विधान परिषद की सदस्यताएँ आरक्षित हैं और मजे की बात यह है क़ि स्वयं पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी अपने कमरों में कार्यकर्ताओं से उनके क्षेत्र में हुई हार के किस्से लहिया चना के चटखारे के साथ सुनते हैं। वर्तमान में भाजपा के रणनीतकारों का ध्यान निकाय चुनावों में बसपा के वोट बैंक क़ी तरफ है, इसमें वे कितना सफल होंगे ये तो इस बार की ही तरह चुनाव परिणामों से ही पता लगेगा किन्तु मौके क़ी नजाकत को अगर समझे तो पार्टी नेताओं का ध्यान दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाने क़ी कोशिश करने की बजाय अपना खुद का वोट बेस तैयार करने की तरफ होना चाहिए।
लेखक क्रांति किशोर मिश्र लखनऊ में सुदर्शन टीवी के ब्यूरोचीफ हैं.


