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भारतीय राजनीति में नैतिकता किस चिडि़या का नाम है?

पिछले कुछ दिनों से भारतीय राजनीति में एक शब्द नैतिकता काफी तेजी से चल रहा है। हर राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप लगाते हुए नैतिकता के नाते इस्तीफे की मांग करते है। अभी कुछ दिन पहले ही जब देश के विधि मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद पर जाकिर हुसैन ट्रस्ट के नाम पर फर्जीवाडा करने का आरोप लगा तो तुरंत ही मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने नैतिकता के नाते कानून मंत्री से इस्तीफा माँगा। इसी तरह जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर जमीन हड़पने के आरोप लगे तो कांग्रेस ने नैतिकता के नाम पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से उनके इस्तीफे की मांग कर डाली। पर नैतिकता इन दलों में कितनी बची है इसकी बानगी पिछले दिनों के घटनक्रम में देखने को मिलती है।  

पिछले कुछ दिनों से भारतीय राजनीति में एक शब्द नैतिकता काफी तेजी से चल रहा है। हर राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप लगाते हुए नैतिकता के नाते इस्तीफे की मांग करते है। अभी कुछ दिन पहले ही जब देश के विधि मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद पर जाकिर हुसैन ट्रस्ट के नाम पर फर्जीवाडा करने का आरोप लगा तो तुरंत ही मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने नैतिकता के नाते कानून मंत्री से इस्तीफा माँगा। इसी तरह जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर जमीन हड़पने के आरोप लगे तो कांग्रेस ने नैतिकता के नाम पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से उनके इस्तीफे की मांग कर डाली। पर नैतिकता इन दलों में कितनी बची है इसकी बानगी पिछले दिनों के घटनक्रम में देखने को मिलती है।  

 

कांग्रेस ने जहाँ अपने आरोपी मंत्री सलमान खुर्शीद को प्रोन्नति देकर इस देश का विदेश मंत्री बना दिया तो वहीं भाजपा अपने संविधान में संसोधन कर आरोपी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने की पूरी तैयारी कर ली है। गौरतलब हो की दोनों पर ही अरविन्द केजरीवाल ने भ्रष्टचार के गंभीर आरोप लगाये हैं बावजूद इसके दोनों का ही अपने अपने दलों कद बढ़ता जा रहा हैं। मजे की बात ये है कि दोनों ही राष्ट्रीय दल ( कांग्रेस और भाजपा)  भ्रष्टाचार के  मुद्दे पर बड़ी ही साफगोई से कहते है कि ये हमें बदनाम करने की विपक्ष की सजिश है। सवाल ये है कि जब आप सभी दल एक ही थाली को हो तो कौन सत्ता पक्ष और कौन विपक्ष, कौन साजिशकर्ता और कौन पीड़ित? भ्रष्टाचार के नाम आप सभी एक दूसरे से इस्तीफा मांगते हो पर जब बात खुद पर आती है तो गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हो।

 

कुछ दिन पहले जब ये चर्चा चल रही थी कि केंद्रीय सरकार में जल्दी ही फेरबदल होने वला है तो ये माना जा रहा था कि कांग्रेस अपनी भ्रष्ट छवि को सुधरने के लिए कुछ कड़े फैसले लेगी। पर जब फेरबदल हुआ तो तस्वीर सबके सामने खुल कर आ गयी। देश के विकास में भ्रष्टचार को बाधक बताने वाली कांग्रेस ने इस फेरबदल में जमकर भ्रष्टाचारियों का साथ दिया उसने न केवल सलमान खुर्शीद को प्रोन्नति देकर इस देश का विदेश मंत्री बना दिया वर्न आई.पी.एल कोच्ची टीम की स्वीट इक्विटी विवाद सहित नाना प्रकार के विवादों के चलते मंत्री पद से हटाये गए शशि थरूर को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया। सलमान खुर्शीद को प्रोन्नति देने के पीछे कांग्रेसियों का तर्क है की वो अरविन्द केजरीवाल जैसे के आरोपों पर ध्यान नहीं देते। इस तरह कांग्रेस व उसके भ्रष्ट मंत्रियों को हमेशा सवालों के घेरे में खड़ी करने वाली भाजपा अपने आरोपी अध्यक्ष के बारे में पूरी तरह से खामोश हैं। कुछ भाजपाई नेता दबी जबान जरुर इसका कारण बताते हैं। इन नेताओ का कहना है कि गुजरात विधानसभा चुनाव और संघ की मजबूरियों के चलते गडकरी को पद से हटाना संभव नहीं है क्योंकि गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद ही भाजपा की राष्ट्रीय दिशा निर्धारित होगी इतना ही नहीं राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति में संघ का बड़ा योगदान होता है ऐसे में संघ के सामने समस्या यह है कि अगर गडकरी को हटाया जाये तो किसको लाया जाये।

 

जब इस लेख को लिख रहा था उसी समय दिल्ली में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.के.सिंह मीडिया को संबोधित कर रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि केंद्र कि यू.पी.ए सरकार संविधान की भावना के विपरीत काम कर रही है इसलिए मौजूदा संसद को भंग कर नए सिरे चुनाव कराया जाना चाहिए। सवाल ये है कि क्या दोबारा चुनाव करा देने से मौजूदा भ्रष्ट राजनैतिक व्यवस्था सुधर जायेगी? इस बात की क्या गारंटी है की दोबारा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जगह भाजपा के सत्ता में आ जाने की स्थिति में भ्रष्टाचार रुक जायेगा? यदि पूर्व सेना प्रमुख ये मान कर चल रहे अगले लोकसभा चुनाव में देश के राजनीति में व्यापत भ्रष्टाचार को मिटाने में अन्ना का आन्दोलन प्रभावी रूप से कारगर होगा तो ये अभी दूर कौड़ी है। मौजूदा परिस्थतियों में चुनाव बाद मौजूदा राजनैतिक दलों में से ही कोई दल पूर्ण बहुमत के साथ या फिर सयुंक्त रूप से सरकार बनायेगा। ऐसी स्थति में क्या संसद भंग करके नये सिरे से सरकार का गठन कर अनैतिक हो चुके इन राजनैतिक दलों में नैतिकता को जगाया जा सकता है?

 

नैतिकता यानि नीति के अनुरूप आचरण। राजनीति में नैतिकता का अर्थ भी राज्य को नीति के अनुरूप संचालित करना है, परन्तु आज राजनीति में नीति की परिभाषाएं बदल चुकी हैं। आज राज में नीति अर्थात नैतिकता का मतलब येन केन प्रकारेण सत्ता हथियाना और अपने और अपनी भावी पीढ़ियों के लिए राजसी सुखों का प्रबंध करना मात्र रह गया है। आज सभी राजनैतिक दल इसी नीति का पालन कर रहे हैं अंतर इतना है कि कोई केंद्र में इसका पालन कर रह है तो कोई राज्य में। आज कोई भी दल और राजनेता ऐसा नहीं जिसके दामन पर भ्रष्टचार की छीटें न हो। वो चाहे सलमान खुशीद हों, नितिन गडकरी हो या फिर देश की राजनीत में हावी एम फैक्टर (माया और मुलायम) हो। ऐसे में ये दल किस मुह से नैतिकता की बात करके एक दूसरे पर इस्तीफे का दबाव बनाते हैं जबकि राजनीति की नैतिकता को ये सभी राजनैतिक दल शरबत का घोल बनाकर पी गए हैं।

 

२०१४ का लोकसभा चुनाव नजदीक है या सपा प्रमुख मुलायम सिंह के शब्दों में कहे तो किसी भी वक़्त लोकसभा चुनाव हो सकते हैं। ऐसे में अभी और कई नेताओ के भ्रष्टाचार की पोल खुलेगी जिनमें सत्ता पक्ष भी होगा और विपक्ष भी। सभी नैतिकता के नाम पर इस्तीफे कि मांग करेंगे। पर ध्यान रहे नैतिकता बात करने वाले प्रत्येक राजनैतिक दल का अपना कोई भी नैतिक आचरण नहीं है क्योंकि अगर इनका कोई अपना नैतिक आचरण होता तो ये सबसे पहले ये अपने भ्रष्ट नेताओ पर कार्यवाही करते। नैतिकता के नाम पर इनका उद्देश्य मात्र इतना है कि किसी भी तरह केंद्र सत्ता को हासिल किया जाये. सत्ता मिलते ही नैतिकता ख़त्म और भ्रष्टचार शुरू फिर वो चाहे कांग्रेस हो या भाजपा।

 

लेखक अनुराग मिश्र तहलका न्‍यूज के उपसंपादक हैं.

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