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भावी प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी?

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की दो मुलाकातों पर पूरे देश का ध्यान खिंचा है| एक तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत के साथ और दूसरी ब्रिटिश उच्चायुक्त जेम्स बेवन के साथ! दोनों मुलाकातों से उपजा मूल प्रश्न एक ही है लेकिन पहले हम बेवन से हुई मुलाकात को लें| मूल प्रश्न यह है कि क्या मोदी भारत के भावी प्रधानमंत्री हैं? ब्रिटिश उच्चायुक्त (राजदूत) जेम्स बेवन ने नरेंद्र मोदी से मुलाकात क्या की, कल्पना के घोड़े दौड़ने लगे| यह माना जाने लगा कि अब अगले प्रधानमंत्री का तोरण गुजरात से ही सजेगा| ब्रिटिश दिमाग को भारत की जितनी पहचान है, किस अन्य विदेशी को क्या होगी| यदि ब्रिटेन के अत्यंत संयत और दूरदर्शी नीति-निर्माता नरेंद्र मोदी के बारे में अपना रवैया बदल रहे हैं तो इसका कुछ ठोस कारण तो होगा? 

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की दो मुलाकातों पर पूरे देश का ध्यान खिंचा है| एक तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत के साथ और दूसरी ब्रिटिश उच्चायुक्त जेम्स बेवन के साथ! दोनों मुलाकातों से उपजा मूल प्रश्न एक ही है लेकिन पहले हम बेवन से हुई मुलाकात को लें| मूल प्रश्न यह है कि क्या मोदी भारत के भावी प्रधानमंत्री हैं? ब्रिटिश उच्चायुक्त (राजदूत) जेम्स बेवन ने नरेंद्र मोदी से मुलाकात क्या की, कल्पना के घोड़े दौड़ने लगे| यह माना जाने लगा कि अब अगले प्रधानमंत्री का तोरण गुजरात से ही सजेगा| ब्रिटिश दिमाग को भारत की जितनी पहचान है, किस अन्य विदेशी को क्या होगी| यदि ब्रिटेन के अत्यंत संयत और दूरदर्शी नीति-निर्माता नरेंद्र मोदी के बारे में अपना रवैया बदल रहे हैं तो इसका कुछ ठोस कारण तो होगा? 

 

गुजरात के प्रति ब्रिटिश रवैए में बदलाव का अर्थ है, संपूर्ण पश्चिमी जगत में नरेंद्र मोदी के बारे में पुनर्विचार! जहां तक एशिया के मामलों का प्रश्न है, आज भी अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी आदि देश ब्रिटेन का अनुसरण करते हैं| कोई आश्चर्य नहीं कि मोदी के तीसरी बार मुख्यमंत्री बनते ही पश्चिम के अन्य प्रमुख राष्ट्रों के राजदूत भी उनके दरबार में हाजिरी लगाने पहुंच जाएं| वे यह नहीं भूले होंगे कि इस वर्ष अप्रैल में की गई ‘टाइम’ पत्रिका की विश्व लोकप्रियता प्रतिस्पर्धा में मोदी, ओबामा और पुतिन से भी आगे थे|

 

फिलहाल जेम्स बेवन ने मोदी से भेंटकर उनकी छवि को चमका दिया है| इसका फायदा उन्हें अपने प्रांतीय चुनाव में अवश्य मिलेगा| हालांकि बेवन ने कहा है कि मोदी की आंतरिक राजनीति से उनका कुछ लेना-देना नहीं है लेकिन उनकी भेंट का यह समय अपना हिसाब खुद कर ले रहा है| गुजरात के चुनाव में जो सेक्युलरिस्ट मोदी पर हमला करने के लिए उनके विरुद्ध पश्चिमी राष्ट्रों का हवाला देते नहीं थकते थे, अब जेम्स बेवन की भेंट ने उनके मुंह पर ताला ठोंक दिया है| बेवन मोदी से इसलिए भी मिले हैं कि 2002 के खून-खच्चर में तीन ब्रिटिश नागरिक भी मारे गए थे| उनकी हत्या के अपराध में छह भारतीयों पर मुकदमे चल रहे हैं| वे सब मुस्लिम हैं और अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है| यह ऐसा मसला है, जिसमें कोई मुख्यमंत्री क्या कर सकता है| इस मसले पर ब्रिटिश उच्चायुक्त का मोदी से मिलना जरुरी भी नहीं था|

 

जिन अन्य कारणों से ब्रिटिश उच्चायुक्त मोदी से मिले, वे कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे| ब्रिटेन में गुजराती बड़ी संख्या में रहते हैं और वे प्रभावशाली भी हैं| ब्रिटिश सरकार पर उनका दबाव बराबर बना हुआ है| बेवन ने स्वीकार किया कि ब्रिटेन गुजरात की उपेक्षा कैसे कर सकता है| ब्रिटेन के गुजराती ही नहीं, कई प्रमुख अंग्रेज नागरिक और मुस्लिम नेता भी मोदी के प्रशंसक हैं| लेबर पार्टी के सांसद बेरी गार्डिनर मोदी को ‘नरेंद्र भाई’ कहकर बुलाते हैं और उन्हें ‘गुजरात का शेर’ कहते हैं| लार्ड आदम पटेल, जो ब्रिटेन के उच्च सदन के सदस्य हैं, मोदी से सम्वाद कायम करना जरुरी समझते हैं| लंदन में रह रहे मौलाना ईसा मंसूरी और जफर सरेसवाला ने 2003 में मोदी से भेंट की थी और उनसे अल्पसंख्यकों को न्याय दिलाने की गुहार लगाई थी| ब्रिटेन के प्रसिद्ध् ‘करी किंग’ सर गुलाम नून मोदी से मिलकर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनकी आलोचना तो बंद कर ही दी, अब वे मोदी के समर्थक बन गए हैं| वे दाऊदी बोहरा हैं|

 

मोदी से मिलने के बाद जेम्स बेवन ने स्वीकार किया कि पिछले दस साल से चला आ रहा मोदी का बहिष्कार अब खत्म हो गया है| उन्होंने अपनी खाल बचाने के लिए पत्रकारों से यह भी कह दिया कि वे मोदी का समर्थन नहीं कर रहे हैं बल्कि उनसे बस सम्वाद शुरु कर रहे हैं| उनके ऐसे भोले-से बयान का असली अर्थ क्या गुजरात की जनता नहीं समझेगी? मोदी ने बेवन से कहा कि आप गुजरात में एक उप-उच्चायुक्त का दफ्तर क्यों नहीं खोल देते? मोदी के प्रति ब्रिटिश रवैए में तो अब परिवर्तन हुआ है लेकिन गत वर्ष उनकी चीन- यात्रा के दौरान उनका जो भव्य स्वागत हुआ था, उसके संकेत भी स्पष्ट ही थे| चीनी सरकार ने एक भारतीय मुख्यमंत्री का स्वागत ऐसे किया, जैसे कि वह प्रधानमंत्रियों का करती है| सभी सरकारें अपने राजदूतों से कहती रहती हैं कि उस व्यक्ति पर निगाह रखिए, जो भारत का अगला प्रधानमंत्री बन सकता है| इसमें शक नहीं कि नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री के उम्मीदवारों में अग्रिम है|

 

इस चर्चा को इसलिए भी बल मिला है कि मोदी अभी दो दिन पहले ही नागपुर जाकर सर संघचालक मोहन भागवत और उनके वरिष्ठ सहयोगियों से मिले हैं| दोनों पक्षों की ओर से इस भेंट-वार्ता का कोई आधिकारिक विवरण प्रकट नहीं किया गया है| अखबारों और टीवी चैनलों ने अपनी-अपनी व्याख्या दे दी है| किसी ने कहा कि संघ मोदी को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में हैं और किसी ने कहा कि नहीं है| यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट है| संघ ने कोई घोषणा नहीं की है| संघ का कहना है कि वह ऐसी घोषणा करता ही नहीं है| लेकिन सबको यह पता है कि संघ की सहमति के बिना भाजपा का कोई नेता प्रधानमंत्री तो क्या, पार्टी अध्यक्ष भी नहीं बन सकता| मोदी के लिए संघ सहमत क्यों नहीं होगा? हिंदुत्व का प्रतिनिधित्व मोदी से बेहतर कौन करता है? मोदी सदाचारी है, भ्रष्टाचार का कोई आरोप उन पर नहीं है और कुशल प्रशासक भी वे हैं हीं| गुजरात के चुनाव में भी वे प्रचंड बहुमत से जीतेंगे ही| फिर क्या वजह है कि आडवाणी की तरह मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जा रहा है?

 

एक कारण तो यह हो सकता है कि संघ और भाजपा पहले उन्हें अगले चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बन जाने दे फिर कोई निर्णय करे| चुनाव मुख्यमंत्री के लिए हो रहा है और उन्हें उम्मीदवार प्रधानमंत्री का बना दिया जाए, यह क्या बात हुई? इसके अलावा सबसे बड़ी इस बाधा की आशंका है कि मोदी का नाम उछलने पर मुद्दा बदल जाएगा| अगर कांग्रेस बुरी तरह हारेगी तो सिर्फ एक मुद्दे पर हारेगी| वह है, भ्रष्टाचार! जबकि मोदी के उम्मीदवार बनते ही भ्रष्टाचार का स्थान सांप्रदायिकता ले लेगी| कांग्रेस को राहत मिलेगी! इसके अलावा भाजपा और उसके गठबंधन-सहयोगियों में ‘मोदीप्रेमियों’ की भरमार है| इसका श्रेय कुछ हद तक नरेंद्र मोदी की स्पष्टवादिता को भी है| संजय जोशी का जैसा कड़ा विरोध मोदी जिस भाषा में करते हैं, उसके आगे दुर्वासा मुनि भी फीके पड़ जाएं| आज संघ इस स्थिति में नहीं है कि वह मोदी की अवहेलना कर सके| दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं| जो स्थिति कभी अटल बिहारी वाजपेयी और संघ के बीच थी, वह आज मोदी और संघ के बीच है| इस समय भाजपा में मोदी-जैसा कोई और नहीं है| अंतर सिर्फ इतना ही है कि अटलजी मृदुता की प्रतिमूर्ति रहे और मोदी कठोरता की! भाजपा में प्रधानमंत्री के लायक तो कई नेता हैं लेकिन मोदी की तरह क्या किसी की जड़ें ज़मीन में भी हैं?

 

लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्‍ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्‍लेषक हैं.

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