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भाषण बहादुरों! टीम अन्‍ना की तर्ज पर मत हांकिए जनरल को

देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के भाषण बहादुरों (नेताओं) को यह सोच लेना चाहिए कि जन्तर-मंतर पर बैठे अन्ना टीम के लोगों व दुनिया की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी फ़ौज के जनरल को एक ही डंडे से नहीं हांका जा सकता. वह भी तब जब देश की सुरक्षा पर ही सबसे बड़ा प्रश्नचिंह लगा हो? संसद में जिस प्रकार जनरल के अनुशासन पर सवाल उठाये गए और देश की सुरक्षा जैसे गंभीर सवाल पर एक भी सांसद नहीं बोला, वह सोचनीय विषय है. जनरल ने देश के रक्षामंत्री के माध्यम से प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा… उससे सवा करोड़ आबादी वाले देश का हर नागरिक सन्न है. पर इस पर संसद में देश के भाग्य विधाताओं ने जिस स्तर की चर्चा की और जनरल पर हमला किया गया, वह बेहद दुखद है.

देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के भाषण बहादुरों (नेताओं) को यह सोच लेना चाहिए कि जन्तर-मंतर पर बैठे अन्ना टीम के लोगों व दुनिया की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी फ़ौज के जनरल को एक ही डंडे से नहीं हांका जा सकता. वह भी तब जब देश की सुरक्षा पर ही सबसे बड़ा प्रश्नचिंह लगा हो? संसद में जिस प्रकार जनरल के अनुशासन पर सवाल उठाये गए और देश की सुरक्षा जैसे गंभीर सवाल पर एक भी सांसद नहीं बोला, वह सोचनीय विषय है. जनरल ने देश के रक्षामंत्री के माध्यम से प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा… उससे सवा करोड़ आबादी वाले देश का हर नागरिक सन्न है. पर इस पर संसद में देश के भाग्य विधाताओं ने जिस स्तर की चर्चा की और जनरल पर हमला किया गया, वह बेहद दुखद है.

जब हमारी सीमाओं पर दुनिया के सबसे ताकतावर देश चीन की टेढ़ी नजरें लगी हो और दूसरी तरफ पाकिस्तान हमसे दुश्मनी पाले हो, ऐसे में अंधे (जनरल के अनुसार) हथियारों से लैस फ़ौज को जंग में उतारेंगे तो उसका अंजाम क्या होगा? वैसे 11 लाख सेना तथा लाखों अर्ध सैनिक बलों से सुसज्जित देश से कोई मूर्ख ही युद्ध की हिमाकत करेगा….पर देश के लिए पल भर में अपनी जान लुटाने वाले फैजियों के प्रति देश की भी जिम्मेदारी है कि उनके मनोबल को किसी भी स्तर पर कम न होने दें. जिस सेना ने कारगिल युद्ध में इस आधुनिक युग में भी पहाड़ी में चढ़ते हुए सीने पर गोलियां झेलते हुए चोटियों पर बैठे दुश्मनों को ढेर किया, वह दुनिया के इतिहास में बेमिसाल है. इस युद्ध में करीब पांच सौ जवानों ने अपनी शहादत दी. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हमारी सेना के पास अत्याधुनिक हथियार और उपकरण होते तो हमें इतनी शहादतें नहीं देनी पड़तीं!

हमारे हुक्मरान शायद 1962 के चीनी युद्ध से सबक नहीं सीखे. जब हमारे जांबाज फौजियों ने बर्फ में कपडे़ के घटिया जूतों तथा जंग लगे हथियारों से दुश्मन से लोहा लेते हुए अपनी शहादत दी. जिस देश में कड़ी धूप में मेहनत करने वाला किसान आत्महत्या करते हों, हर साल भूख और गरीबी से लाखों लोगों की जाने जाती हों और दूसरी ओर सरकारों में बैठे लोग लाखों करोड़ का घोटाला कर, देश की सुरक्षा के लिए धन का रोना रोते हों उस देश की जनता भला अपने हुक्मरानों पर कैसे विश्वास करेगी. यही कारण है कि जब नेताओं के लिए …चोर व लुटेरे जैसे घटिया शब्दों का प्रयोग किया जाता है तब देश की आम आवाम तालियाँ बजाती है?

जहां देश के लिए शहादत देने वाले जवानों के कफ़न और ताबूतों में दलाली खायी जाती हो… जहां हथियारों के दलालों की हिम्मत इतनी बढ़ गई हो कि वे फ़ौज के सर्वोच्च जनरल के सामने खुलेआम घटिया रक्षा उपकरणों के बदले रिश्वत आफर रखते हों तो इससे इस बात की भी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये देशद्रोही तत्व हमारे दुश्मन देशों से भी इस लिए पैसे वसूलते होंगे कि कैसे वे घटिया उपकरणों से भारत की सैन्य शक्ति को कमजोर कर रहे हैं!! ऐसी कंपनियों व लोगों के खिलाफ सिर्फ रिश्वत का ही नहीं बल्कि देशद्रोह का संगीन मामला चलना चाहिए. मुझे लगता है कि देश के हुक्मरान राष्ट्रीय सुरक्षा की लगातार उपेक्षा कर रहे हों ऐसे में जनरल का देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को पत्र लिखना बिल्कुल जायज था. साथ ही सर से ऊपर निकल गए पानी के बारे में जनता को अवगत कराना भी जरूरी था जिनकी गाढ़ी कमाई से ये हुक्मरान गुलछर्रे उड़ा रहे हैं.

लेखक विजेंद्र रावत वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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