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भितरघात का जिन्‍न ले डूबा कांग्रेस को

 

यूपी विधानसभा में इरादों पर पानी फेरने वाला परिणाम दस जनपथ में बैठीं यूपीए की चेयरपर्सन एवं कांग्रेस सुप्रीमो को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा है। खासकर अमेठी, रायबरेली और सुलतानपुर की करारी हार को मैडम पचा नहीं पा रही। मां की परेशानी में उनके सांसद पुत्र एवं कांग्रेस के युवराज भी माथापच्ची में मशगूल हैं। दोनों ने सामूहिक मंत्रणना कर अपने प्रतिनिधि केएल शर्मा को गांधी परिवार की कर्मस्थली में समीक्षा करने हेतु निर्देशित करते हुए रिपोर्ट पेश करने को कहा है। जब श्री शर्मा ने समीक्षा बैठक बुलाई तो गांधी परिवार के इस प्रतिनिधि की मौजूदगी में कांग्रेसी सर फुटव्वल के खेल पर उतारु हो गये। कोई समीक्षा के सरपंच यानि केएल शर्मा पर हार का ठिकरा फोड़ा रहा है, तो कोई अमेठी राजघाने की विरासत संभालें सुलतानपुर के सांसद डा. संजय सिंह पर। ऐसे स्थिति में लाख टके का सवाल यह है कि डेढ़ दश्क पहले राजीव जी की हत्या के बाद कांग्रेस की कमान दूसरे हाथों में पहुंचने पर पार्टी के अंदर ‘‘भीतरघात’’का जो ‘जिन्न’घुसा था क्या वह ‘मैडम’द्वारा बागडोर संभालने के बाद भी मौजूद है? लगता कुछ ऐसा ही है, जिस पर पेश है- सुलतानपुर, अमेठी और रायबरेली से कुछेक भितरघात की झलकियां-

 

यूपी विधानसभा में इरादों पर पानी फेरने वाला परिणाम दस जनपथ में बैठीं यूपीए की चेयरपर्सन एवं कांग्रेस सुप्रीमो को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर रहा है। खासकर अमेठी, रायबरेली और सुलतानपुर की करारी हार को मैडम पचा नहीं पा रही। मां की परेशानी में उनके सांसद पुत्र एवं कांग्रेस के युवराज भी माथापच्ची में मशगूल हैं। दोनों ने सामूहिक मंत्रणना कर अपने प्रतिनिधि केएल शर्मा को गांधी परिवार की कर्मस्थली में समीक्षा करने हेतु निर्देशित करते हुए रिपोर्ट पेश करने को कहा है। जब श्री शर्मा ने समीक्षा बैठक बुलाई तो गांधी परिवार के इस प्रतिनिधि की मौजूदगी में कांग्रेसी सर फुटव्वल के खेल पर उतारु हो गये। कोई समीक्षा के सरपंच यानि केएल शर्मा पर हार का ठिकरा फोड़ा रहा है, तो कोई अमेठी राजघाने की विरासत संभालें सुलतानपुर के सांसद डा. संजय सिंह पर। ऐसे स्थिति में लाख टके का सवाल यह है कि डेढ़ दश्क पहले राजीव जी की हत्या के बाद कांग्रेस की कमान दूसरे हाथों में पहुंचने पर पार्टी के अंदर ‘‘भीतरघात’’का जो ‘जिन्न’घुसा था क्या वह ‘मैडम’द्वारा बागडोर संभालने के बाद भी मौजूद है? लगता कुछ ऐसा ही है, जिस पर पेश है- सुलतानपुर, अमेठी और रायबरेली से कुछेक भितरघात की झलकियां-

बात यहां से शुरू की जाये कि फरवरी 2012 में सम्पन्न हुए विधानसभा के आम चुनाव में लोकदल प्रमुख चौधरी अजीत सिंह के ‘हैण्डपम्प’ से सूबे की ज़मीन को सींचने और युवराज राहुल के दलितों, गरीबों और मज़लूमों के घर रोटी खाने व रात्रि विश्राम करने के फलस्वरुप कांग्रेस यूपी के दंगल में औंधे मुंह गिर पड़ी। अकसर शोर गुल भी हो रहा है कि सलमान, दिग्गी राज, बेनी बाबू और श्रीप्रकाश ने चुनावी की दंगली कुश्‍ती को अपने भस्‍मासुर से हरा दिया। ज्यादा तो नहीं कुछ हद तक इनका कसूर हैं, पर जो कुसूर सबसे बड़ा है उस पर हर कोई कांग्रेसी और कांग्रेसी इमदाद पाने वाला चुप्पी साधे है। बात अगर कांग्रेस द्वारा समूचे प्रदेश में 388 उम्मीदवार जो उतारे गये उससे इतर होकर ‘प्रियंका के जादू और राहुल के करिश्मे’वाली सीटों अमेठी, रायबरेली और सुलतानपुर की 15 सीटों पर करें तो यहां के कांग्रेसियों का ‘भितरघात’ कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी के दौर की याद दिला रहा है। बतौर बानगी अमेठी विधानसभा सीट समेत कुछेक ऐसी सीटें थी जो कांग्रेस खाते में जा रहीं थी, बस कांग्रेसियों ने अपने भितरघात के चलते सीट को गर्त में डाल दिया। अमेठी लोकसभा की पांच सीट में से दो पर हारने के बाद भी सपा यहां करीब 12615 से बढ़त बनाई रही। जबकि बीएसपी भी कांग्रेस के ही रास्ते का कांटा बनी रही। अमेठी में केएल शर्मा ने समीक्षा की तो अमेठी विधायक को बुलावे का नयौता ही नहीं भेजा।

उधर अमेठी नरेश के प्रतिनिधि ने शर्मा को हार कर मुख्य कारण बताया। वहीं भितरघात के चलते सबसे बुरा हस्र रायबरेली में देखने को मिला है। यहां पांच में से एक सीट पीस के खाते में गई थी। इसके अलावा यदि चार सीटों पर बात करें तो सपा सदर सीट को छोड़ सभी पर पहले स्थान पर रही, सोनिया के गढ़ में भितरघात के चलते कांग्रेस हरचरन सीट को छोड़ सभी सीटों पर तीसरे पायदान पर रही। यहां भी सपा कांग्रेस के पांचों सीटों के कुल योग के बाद करीब-करीब 74798 मतों से आगे है। इन दोनों ही लोकसभा सीटों पर विधानसभा वार केएल शर्मा की अध्यक्षता में समीक्षा हुई। जहां 27 मार्च को तिलोई में सिर फुटौवल की नौबत आ गई। सबसे दिलचस्प नज़ारा तो सुलतानपुर का रहा है। यहां कल तो जो एक दूसरे को फूटी आंखें देखने को तैयार नहीं होते थे वह एक मंच पर एक साथ मीडिया के रुबरु हुए। जिनमें मुख्य रुप से कैप्टन शर्मा की नाक का बाल माने जाने वाले संदीप तिवारी ‘पिन्टू’ तो आंखों का तारा माने जाने वाले (हार की हैट्रिक बनाने वाले) पूर्व कैबिनेट मंत्री पं. जयनरायण तिवारी समेत दस जनपथ की फटकार के बाद बाहर की राह देखने वाले व कांग्रेस में रहकर परिवार की परम्परा को ढ़ोने वाले पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष राजकिशोर सिंह सम्मिलित हुए।

हां! इन सभी ने मिलकर एक काम क़ाबिले तारीफ किया कि अन्य कांग्रेसी ‘भितरघात’का सहारा लेते थे, लेकिन जिसकी पकड़ आलाकमान तक मज़बूत हो वह भितरघात क्यों करे? सभी खुलेआम मंच पर आकर सुलतानपुर से लेकर अमेठी तक की सीटों पार्टी प्रत्याशी की हार का ज़िम्मेदार सदर सांसद डा. संजय सिंह को ठहराते हुए उन्हें कटघरे में खड़ा करते नज़र आये। जबकि वास्तविकता जो है उससे सांसद की कलई तो नहीं हां त्रिसुण्डी और राजकिशोर को छोड़ पिन्टू और जय नरायाण की खत्म राजनीति का अध्याय अवश्य समाप्त होता दिखाई दे रहा है। एक मंच, एक बैठक में चार शरीर, चार मुंह और चार जुबां जिन सभी पर एक ही बेबुनियाद आरोप कि 2009 के लोकसभा चुनाव में हम सभी ने उनको चुनाव लड़ाकर जिताया, उन्होंने जो जनता से वादे किये वह लाली पॉप साबित हुए जिसका असर सभी सीटों के रुझान पर रहा। अगर बात बैठक में गर्म तेवर वाले पिन्टू की करें तो शायद उनका राजनैतिक कद अपने घर में नहीं। उनका वजूद अपने बूथ पर नहीं। केशकुमारी बालिका इंटर कालेज जो उनका अपना पोलिंग बूथ रहा, पिन्टू को इस बूथ पर जहां 53 वोट मिले वहीं सपा को 114, बसपा को 91 भाजपा को 44 और पीस पार्टी को 67 वोट मिले।

यह भी सच है कि सांसद का विधानसभा चुनाव में योगदान खास नहीं रहा लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में इसी संगठन पर उन्होंने सुलतानपुर सीट से 51753, सदर सीट से 64238, लम्भुआ से 59438, कादीपुर से 66455 एवं इसौली से 58526 मत पाये थे। वह उस परिस्थिति में जब न दस जनपथ और न केन्द्रीय मंत्री और स्टार प्रचारकों ने इस चुनाव में कमान संभाली थी। अलबत्ते सम्पन्न हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में शर्मा और शर्मा के चहेतों के विधानसभा सीटों पर युवराज से लेकर स्टार और स्टार से लेकर केन्द्रीय मंत्री तक ने चुनावी कमान अपने हाथों रखीं और नतीजा यह निकला की पांचों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का कुल योग मतदान 59000 के आसपास रहा। जबकि सपा पौने तीन लाख से ज्यादा से आगे है, और बसपा पीछे-पीछे। ऐसे में ‘भितरघात’ से निजात पाना, केएल शर्मा के बजाय लगाम अपने हाथों में लेने यूपीए चेयरपर्सन एवं कांग्रेस सुप्रीमो को अति अवश्यक है। वरना 2014 का लोकसभा चुनाव में बस सवा या डेढ़ साल का वक्त शेष है।

सुल्‍तानपुर से पत्रकार असगर नकी की रिपोर्ट.

 

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