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भोजपुरी के तुलसी दास थे राम जियावन दास बावला

भोजपुरी के तुलसीदास की उपाधि से प्रख्यात रामजियावन दास बावला का मंगलवार को निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्‍कार बनारस के मर्णिकर्णिका घाट पर किया गया। फक्कड़ भोजपुरी को देश के कोने-कोने में ऐसा अलख जगाया कि सम्मान में अनगिनत शील्ड, प्रशस्ति पत्र आदि आलमारियों की शोभा बढ़ा रहे हैं। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बसे भीषमपुर गांव निवासी रामजियावन दास बावला कलकत्ता में आयोजित वर्ष 2002 में विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भोजपुरी की ऐसी छाप छोड़ी कि तत्कालीन राज्यपाल विरेन्द्रशाह ने ताज पहनाकर उन्हें मंच पर सम्मानित किया। गोरखपुर में संगम समारोह रहा हो या फिर अ‌र्न्तराज्यीय संगीत प्रतियोगिता नयनागढ़ महोत्सव 2008। अनेक महोत्सवों में भोजपुरी माटी की पहचान उन्होंने कायम रखी। बावला जी की कविताओं में देशज संस्‍कार ही हावी रहे। 

भोजपुरी के तुलसीदास की उपाधि से प्रख्यात रामजियावन दास बावला का मंगलवार को निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्‍कार बनारस के मर्णिकर्णिका घाट पर किया गया। फक्कड़ भोजपुरी को देश के कोने-कोने में ऐसा अलख जगाया कि सम्मान में अनगिनत शील्ड, प्रशस्ति पत्र आदि आलमारियों की शोभा बढ़ा रहे हैं। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बसे भीषमपुर गांव निवासी रामजियावन दास बावला कलकत्ता में आयोजित वर्ष 2002 में विश्व भोजपुरी सम्मेलन में भोजपुरी की ऐसी छाप छोड़ी कि तत्कालीन राज्यपाल विरेन्द्रशाह ने ताज पहनाकर उन्हें मंच पर सम्मानित किया। गोरखपुर में संगम समारोह रहा हो या फिर अ‌र्न्तराज्यीय संगीत प्रतियोगिता नयनागढ़ महोत्सव 2008। अनेक महोत्सवों में भोजपुरी माटी की पहचान उन्होंने कायम रखी। बावला जी की कविताओं में देशज संस्‍कार ही हावी रहे। 

राम जियावनदास बावला का जन्म चकिया विकास खंड के भीषमपुर गांव में एक जून 1922 को हुआ था। उनकी माता का नाम सुदेश्वरी देवी तथा पिता का नाम रामदेव था। चार भाइयों में बावला जी सबसे बड़े थे। बावला का कवि मन कभी भी स्कूली शिक्षा में नहीं रमा। गांव के प्राइमरी स्कूल से कक्षा तीन की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने स्कूली शिक्षा को अलविदा कह दिया। संयुक्त परिवार में जन्मे बावला पर बड़े पिता का प्रभाव पड़ा। उनके बड़े पिता संगीतमय तथा अच्छे रामायण गायक थे। कुछ दिनों तक पुश्तैनी लुहारी के धंधे में काम करने के बाद बावला का मन उचट गया। तब परिवार वालों ने उन्हें भैंस चराने का काम दे दिया। राजदरी जल प्रपात के पास घुसुरिया में भैंसों को चराते चराते ही उनका कवि हृदय रचनाओं में विमगभन हो गया। बावला उपनाम के बाबत बावला जी ने खुद बताया था कि यह नाम उन्हें एक अहिन्दी भाषी की बुदबुदाहट से मिला, जिससे उनकी मुलाकात बनारस में हुई थी। उनकी पहली पुस्तकीय रचना कीर्तन भंडार 1947 में प्रकाशित हुई। कृषि निष्ठा की ओर से विख्यात कवि पंडित श्यामनारायण पांडेय की अध्यक्षता में आयोजित कवि सम्मेलन में उन्हें पहली बार काव्य पाठ करने का अवसर मिला। इस संस्था ने उन्हें भोजपुरी गौरव के नाम से सम्मानित किया।

बावला जी ने विश्व भोजपुरी सम्मेलन मुंबई, कोलकाता तथा बनारस में भाग लिया। कोलकाता के विश्व भोजपुरी सम्मेलन में उन्हें भोजपुरी साहित्य के सबसे बड़े सेतु सम्मान से नवाजा गया, जिसे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल वीरेन्द्र शाह ने उन्हें प्रदान किया। उनकी पहली रचना बबुआ बोलता ना.. को पहली बार आकाशवाणी से पंडित हरिराम द्विवेदी के भाई जयराम द्विवेदी ने गाया, जिसके चलते ही बावला जी साहित्यजगत के सामने आए। बावला जी ने गीत लोक पुस्तक लिखी है, जिसमें उनके छंदों का संग्रह है। इस गीत लोक पुस्तक की भूमिका डा. विद्यानिवास मिश्र ने लिखी है। डा. विद्यानिवास मिश्र ने उन्हें वाचिक परंपरा का संत कवि बताया था। डा. मिश्र ने लिखा है कि बावला पर गोस्वामी तुलसीदास की छाप दिखती है जो उनके व्यक्तित्व को रामायण लेखन की ओर प्रेरित करने में सक्षम हुई है। बावला जी ने रामचरित के बाबत प्रचलित देशी उद्भावनाएं लिखी हैं एक ओर उन्होंने मध्ययुग के छंदों का प्रयोग किया है तो दूसरी ओर कवित्त और सवैया का प्रयोग बड़ी लयमयता के साथ किया है। डा. मिश्र ने लिखा है बावला जी ने लोक शास्त्र तथा साहित्यशास्त्र के बीच सेतु का काम किया। जिससेे उनकी गाय की परंपरा को भी नया आयाम मिला है।

भोजपुरी के तुलसीदास की उपाधि से नवाजे गए राम जियावनदास बावला की रचनाओं में ग्रामीण परिवेश, आचार व्यवहार परंपराएं, खेत खलिहान, किसान आधार है तो समाज की कुरीतियों, भ्रष्टाचार तथा आधुनिकता तथा पाश्चात्य सभ्यता भी उनकी रचनाओं के निशाने पर रहे हैं। बावला के छंदों, सवैयों में माटी, कच्चाधर, आंगन, दुआर, दलान, ओसारी, खेत खलिहान फसले, रोटी, ओरी, फगुआ, गुलाल, कजरी, चैता, चैती, बिरहा, फुलवारी कोयल की कूक, पपीहा, कोल्हुआड का ताजा गुड़, नया भात, हरियर मटर की दाल, होरहा, हाबुस की खुशबू, दिखाई देती है। वहीं फागुन, वर्षा ऋतु, बसंत, हेमंत, शिशिरा जैसी ऋतुओं को भी उन्होंने अपनी शाश्वत लेखनी से उकेरा है। कवि राम जियावनदास बावला जनपद के साहित्य तथा कवि सम्मेलनों की जान थे। बिना उनके कोई भी साहित्यिक या कवि सम्मेलन अधूरा माना जाता था। अपनी धारा प्रवाह भोजपुरी कविता से बावला ने बड़े बड़े साहित्यकारों की बोलती बंद की थी, लेकिन उनमें आत्माभिमान जरा भी नहीं था। इसलिए उनके मुरीदों की संख्या बढ़ती गई। वहीं बावला ने चकिया क्षेत्र में गठित तमाम साहित्यिक संगठनों को पुष्पित तथा पल्लवित किया। चकिया में गठित मुकुल साहित्य परिषद, नवज्योति साहित्य परिषद, साहित्य लोक, अभिनव साहित्य परिषद, राष्ट्र भाषा हिन्दी साहित्य परिषद दिरेहूं, चंद्रप्रभा साहित्यिक मंच तथा कविता गांव में जैसी साहित्यिक संस्थाओं को वह आगे बढ़ाने में लगे रहे। बावला के निधन से चकिया के साहित्यकारों, पत्रकारों, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक संस्थाओं में शोक की लहर दौड़ गई है तथा उनके घर पर शोक संवेदना देने वालों का तांता लग गया। रामजियावन दास बावला ने जीवन पर्यंत खड़ी बोली से परहेज किया। बावला जी हर क्षेत्र के लोगों के संपर्क में थे, लेकिन उन्होंने कभी भी खड़ी बोली का प्रयोग बोलचाल में नहीं किया।

बावला जी को मिले साहित्य सम्मान
1. भोजपुरी साहित्य का सबसे बड़ा सेतु सम्मान 2002 कोलकाता के विश्व भोजपुरी सम्मेलन में।
2. काशी रत्न अलंकरण 2004।
3. पुरविया गौरव सम्मान एकता मंच 2009।
4. भोजपुरी लोक रस सम्मान गाजीपुर में 2011।
5. चंदौली महोत्सव 2003 तथा 2006।
6. कुशवाहा सेवा संस्थान काशी सम्मान 1997।
7. यथार्थ परिवार सम्मान 2005।
8. अदवी संगम सम्मान 2001।
9. स्वदेशी मेला में सम्मान 2008।
10. अखिल भारतीय पूर्वा लोकरत्न संगीत महोत्सव में भोजपुरी तुलसी रत्न 2009।

चंदौली से संतोष जायसवाल की रिपोर्ट.

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