अस्सी के दशक के बाद देश की आवाम ने ऐसा नैतिक आंदोलन नहीं देखा। नहीं देखा ऐसा अनासक्त आंदोलन जो अहसास कराता कि बजबजाती व्यवस्था को बदला जा सकता है। कदाचार में सने सिस्टम में खलबली का गवाह बन सकता है। खुद को खुदा समझने वाले नेताओं की नींद उड़ा सकता है और सत्य की तपिश से फरेबी माहौल को झुलसा सकता है। हमारी पीढ़ी ने ऐसा आंदोलन नहीं देखा। लेकिन गत 12 दिन में हमने देखा है। हमारी पीढ़ी ने महसूस किया है कि आजादी से पहले जब महात्मा गांधी सड़कों पर तेज चाल से निकलते होंगे, तो क्यों उनके पीछे बावलों की तरह लोग दौड़ते होंगे। क्यों बदन पर लाठियों के घाव सहकर गांधी का साथ नहीं छोड़ते होंगे। क्यों दुनिया पर राज करने वाली हुकूमत कृशकाय गांधी के सामने दुम दबाकर भाग खड़ी हुई होगी।
हमने महसूस कर लिया कि जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया के नाम से सरकारें सूखे पत्तों की तरह कांपती होंगी। हमने यह महसूस कर लिया…। हमें यह महसूस कराया है अन्ना हजारे ने। पल-पल में रंग बदलती सत्ता की कारगुजारियों से अडिग अन्ना हजारे ने। सियासती शख्सियतों की तिकड़मों से निडर अन्ना हजारे ने। आवाम को आवाज लगाकर जगा देने वाले हजारे ने। नई पीढ़ी के लिए नैतिकता के प्रतीक अन्ना ने यह महसूस कराया है कि अगर चरित्र निष्कलंक है, हौसलों में निडरता है, उद्देश्य पवित्र है तो बेइमानों की क्या बिसात जो रास्ते का पत्थर बनें। क्या नहीं हुआ 12 दिनों में…।
राजनीति के खेल की हर चाल आजमाई गई। जेपी पार्क पर अनशन की इजाजत देने के बाद सहयोगियों के साथ अन्ना की गिरफ्तारी। दिनों की सौदेबाजी। व्यापारी की तरह एक-दो दिन से छह-सात दिन के लिए मोलभाव। गाड़ियों की गिनती, लोगों के सिरों को गिनने की साजिशें। समर्थकों को धर-दबोचने के कारनामे। अपमान करने का इरादा। आप से तुम और तुम से तू-तड़ाक होती जुबान। बेदाग अतीत को कालिख में लपेट देने का दुस्साहस। चरित्र को दागदार बना देने की तिकड़में। पूरे तंत्र को पीछे लगाकर खौफ पैदा करने की हरकतें…क्या-क्या नहीं हुआ इन 12 दिनों में।
अन्ना की आवाज बनी जनता और खामोश मुल्क ने सब देखा। सबकुछ महसूस किया। कुछ ने कहा-अन्ना का हश्र भी बाबा रामदेव जैसा होगा। इस मुल्क में कुछ नहीं बदल सकता। कुछ ने कहा-टीआरपी का खेल खत्म होते ही हवा निकल जाएगी आंदोलन की। मगर अन्ना अडिग थे। उन्होंने कर दिखाया। अड़े रहे अन्ना। बिना अन्न के, डटे रहे अन्ना। कई दफा लगा कि मझधार में हैं अन्ना। सरकार अनसुनी कर रही है। अब नहीं सुनेगी सरकार। लेकिन अन्ना अडिग रहे। संकल्प पर। अनशन पर। हारे नहीं अन्ना हजारे…। आंदोलन का यह अजूबा देखा है हमारी पीढ़ी ने। सांप-सीढ़ी के खेल में दस सिर वाले भ्रष्टाचार के फन कुचलने की महारत को महसूस किया है।
हमने जाना है कि कुछ भी नामुमकिन नहीं है। हर चीज बदली जा सकती है। सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। मुल्क की हर बेहतर चीज बचाई जा सकती है। हिंदुस्तान के गुलिस्ते को खिलाया जा सकता है। आने वाली पीढ़ी को खिलखिलाते देखा जा सकता है। ताकतवर हो चुके भ्रष्टों को मजा चखाया जा सकता है। झुकाया जा सकता है। सत्ता के मद में चूर लोगों को हैसियत बताई जा सकती है। यह जताया जा सकता है कि यह देश हमारा है। इसके बुरे-भले के बारे में सोचने का हक हमारा है। हमें भी आजादी है गलत को गलत कहने की। डंडे के जोर पर हमें दबाया नहीं जा सकता। झुकाया नहीं जा सकता। प्रण से हटाया नहीं जा सकता। हमें भी हक है यह जताने का कि मुल्क में सब कुछ ठीक नहीं है। बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। मगर बदलाव हमेशा सहजता से स्वीकार नहीं होता। बदलाव की प्रक्रिया में विरोध है। और विरोध का सामना सहजता से वही कर सकता है जो खुद निष्कलंक, पवित्र, निष्पाप और निडर हो। सात्विक राह की अड़चनों से पार भी वही जा सकता है। हम तभी अन्ना बनेंगे जब सदाचार के साथ जीएं। गुजरते वक्त में नैतिकता को बिखेरें।
अन्ना की कामयाबी में नैतिकता का बल है। साफ अतीत है। नई पीढ़ी को यही मूर्त प्रतीक मिला है जो इतिहास के पन्नों से बाहर खड़ा, नैतिक जिद पर अड़कर सड़ी-गली भ्रष्ट व्यवस्था को बदल रहा है। सफलता की कहानी को गढ़ रहा है। हमने अन्ना को महापुरुष बनाते पलों को जिया है। हमें इसी नैतिक जीत को अनवरत बनाना है। अपने भीतर सुलगने लगी लौ को प्रज्जवलित करना है। हमें अन्ना बनना है…सदाचार की नैतिक जीत का साक्षात प्रतीक बनना है। हमें सदा सत्य के साथ जीना है…। हमें अन्ना बनना है…। जब कोई मनुष्य, अनासक्त होकर चुनौती देता है इतिहास को, उस दिन नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है… नियति नहीं है पूर्व निर्धारित- उसको हर क्षण मानव-निर्णय बनता-मिटाता है…धर्मवीर भारती
लेखक ब्रह्मवीर दैनिक हरिभूमि, रायपुर में कार्यरत हैं.


