यूपी के आधे से अधिक चुनाव निपट चुके हैं। हमारे महान राजनेताओं ने पूरे चुनावी दौर में सिद्ध कर दिया कि वे प्रदेश के हितों के लिए कितने जागरूक हैं। कोई भी दल ऐसा नहीं है जिसे प्रदेश के सर्वांगीण विकास की कोई चिन्ता हो। कोई किसी को चोर-चोरनी कह रहा था तो कोई किसी के खानदान की बातें कर रहा था। कोई मंदिर का रोना रो रहा था तो कोई आरक्षण के नाम पर आंसू बहा रहा था। इस बीच अगर कुछ गायब था तो वह था इस प्रदेश के आम आदमी का हित और उसके जीने की गारंटी।
हमारे राजनेताओं को लंबे समय से यह मुगालता रहा है कि वह जनता को जिस तरह चाहें उसी तरह हांक सकते हैं। उसे किसी भी विकास की बात याद दिलाना कोई जरूरी नही है बस उसकी भावनाएं और संवेदनाएं झकझोरते रहिए और उसे आश्वासनों का कोरा झुनझुना थममाते रहिए। अब नेताओं को यकीन हो चला है कि अगर सभी राजनीतिक दल इस तरह की बात करेंगे तो विकास की बातें सभी भूल जायेंगे और किसी भी दल को कोई परेशानी नहीं होने वाली है। कांग्रेस देश पर लंबे समय से शासन कर रही है। नेहरू गांधी परिवार के सभी लोग उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ें जमाने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं। चुनाव में उनकी मेहनत कामयाब होती नजर भी आ रही है। मगर राहुल जैसे नौजवान से जिस विकास की पैरोकारी की उम्मीद थी उनके चंपू मंत्री उन्हें विकास की जगह एक बार फिर धर्म और जाति के मुद्दे में घसीटने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। दुख की बात यह है कि देश में काबीना मंत्री रहे सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेता ही संवैधानिक संस्थाओं को ताक पर रखे हुए हैं।
इससे पहले भी कांग्रेस ने धर्म का कार्ड खेलने में कोई कोताही नही बरती। चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने पिछड़े मुसलमानों को साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण की घोषणा करके एक बार फिर धर्म का कार्ड खेलने की नापाक कोशिश की। कांग्रेस के लोगों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि पिछले साढ़े आठ साल से लगातार दिल्ली की सरकार संभाल रही कांग्रेस को अब तक मुस्लिमों के लिए आरक्षण की याद क्यों नहीं आयी और जब यूपी का चुनाव सिर पर आ गया तो धर्म का यह कार्ड खेलकर कांग्रेस क्या वही खेल नहीं खेल रही जो अब तक भाजपा खेलती आयी है। सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा के अमर्यादित भाषण क्या यह संदेश नहीं दे रहे कि यूपीए सरकार के कुछ मंत्री मानसिक रूप से असंतुलित हो गये हैं। बेनी प्रसाद वर्मा पर कोई भी टिप्पणी करना फिजूल है क्योंकि जो शख्स ददुआ जैसे कुख्यात डकैत को मारने पर अफसोस जताते हुए कहता हो कि ददुआ कुर्मी जाति का नायक रहा। ऐसे व्यक्ति से किसी भी सभ्य बात और विकास के मुद्दे की बात करना और सोचना बेमानी है। मगर सवाल यह है कि क्या इस तरह के मंत्री जिस सरकार में शामिल हो उस सरकार से प्रदेश और देश के विकास की क्या आशा की जा सकती है।
भारतीय जनता पार्टी तो हर बार की तरह इस बार भी अपनी परम्पराओं का पूरा निर्वाहन कर रही है। उसे पता है कि उसके पास विकास में कोई नीति नही है। उसे बस उस राम मंदिर का नाम लेना है जिसे बनाने में उसकी कोई दिलचस्पी नही है। भाजपा को पता है कि राम नाम का सहारा ही उसकी डूबती नैया को पार लगा सकता है। लिहाजा एक बार फिर राम मंदिर उसके घोषणा पत्र में है। यह बात दीगर है कि भाजपा के नेताओं के मुंह से राम मंदिर की बात सुनाना सिर्फ हास्यास्पद लगता है। यूपी में तीन-तीन सीएमओ की हत्या एवं कई हजार करोड़ के एनआरएचएम घोटाले के मुख्य आरोपी बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में लेकर भाजपा ने सिद्ध कर दिया कि भले ही उसके नेता मंच से नैतिकता की बातें करें गर हकीकत यह है कि इससे उसका कोई वास्ता नहीं है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जिस भाषा का इस्तेमाल यूपी में कर रहे हैं उससे लगता है कि वह मानो किसी नगर पालिका के सभासद स्तर का चुनाव प्रचार कर रहे हैं जिसमें कोई भी अमर्यादित भाषा बोली जा सकती है। उमा भारती से तो सभ्यता की आशा करना ही फिजूल है। भाजपा नेताओं के प्रचार से भी नहीं लगता कि पार्टी यूपी के सर्वांगीण विकास की बात सोचती है।
समाजवादी पार्टी के युवराज अखिलेश यादव ने भी युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सपा के घोषणा पत्र में इतने कम्प्यूटर और लैपटाप देने की बात कर दी गयी जिसकी यूपी के सरकारी खजाने से पूर्ति करना संभव नजर नहीं आता। मुस्लिम वोटों को लुभाने के लिए उन्ही शाही इमाम का सपा सहारा ले रही है जिसे पिछले चुनाव में सपा मुखिया ने गरिया दिया था। समाजवादी पार्टी ने इस बार अपने प्रचार में इस बात की सावधानी बरती है कि वह जनता को यह मैसेज दे सकें कि वह इस बार गुंडो को बढ़ावा नहीं देगी। मगर गुड्डु पंडित और बलात्कार एवं हत्या के आरोपी अमर मणि त्रिपाठी के पुत्र को एक बार फिर विधान सभा में पहुंचाकर सपा क्या सिद्ध करना चाहती है यह तो उसके नेता ही बता सकते हैं। साथ ही कुख्यात डकैत ददुआ के पुत्र वीर सिंह भी समाजवाद का परचम लहरा रहे हैं।
पिछले साढ़े चार साल से अधिक समय से यूपी की सत्ता संभाल रही बहुजन समाज पार्टी के पास कोई घोषणा पत्र नहीं है। न ही वे दावा कर रही है कि अगर फिर सत्ता
हासिल होती है तो एनआरएचएम और मनरेगा जैसी लूट नहीं होगी। इनके समय में नौकरशाहों और राजनेताओं ने जिस तरह से भ्रष्टाचार का तांडव इस प्रदेश में मचाया है उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। आखिरी समय में भले ही कुछ मंत्रियों और विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाया गया हो मगर इतने समय तक उन्होंने सत्ता की मलाई क्यों चाटी इसका जवाब बसपा के पास नहीं है। सबसे अच्छे छोटे-छोटे दल हैं जिन्होंने हत्यारों, डकैतों, अपहरणकर्ताओं और बलात्कारियों को खुले दिल से टिकट बांटे हैं और इस आशा में बैठे हैं कि अगर त्रिशंकु सरकार बनी तो यही गुंडे हमारे काबीना मंत्री बनें। तो आइए विचार करें कि इन बेईमानों में कम बेइमान कौन है और उसे अपना मत देकर इस लोकतंत्र को धन्य बनायें।
लेखक संजय शर्मा लखनऊ से प्रकाशित वीकेंड टाइम्स के संपादक हैं.


