एमपी अजब है, सबसे गजब है। वाकई यह बात सच है क्योंकि पक्ष और विपक्ष का नायाब गठबंधन और कमाई का अनोखा मिसाल मध्य प्रदेश में ही मिल सकता है। जब राजनीति में विपक्ष मौन धारण कर ले या सांकेतिक विरोध कर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने लगे तो यह बात अपने आप में इस बात की ओर इशारा करने लगता है कि दाल में कुछ काला है। प्रदेश में अभी हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय, आयकर और सीबीआई का छापा भाजपा से जुड़े लोगों के यहां पड़ा लेकिन कांग्रेस के खेमे में शोक छाया हुआ है। लगता है जैसे प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं को सदमा लग गया हो क्योंकि भाजपा के छोटे सी चूक पर हल्ला बोलने वाले कांग्रेस के प्रवक्ताओं की खामोशी बहुत कुछ बयां कर रही है।
मध्य प्रदेश के नामचीन बिल्डर दिलीप सूर्यवंशी और खनिज व्यापारी सुधीर शर्मा दोनों के यहां प्रवर्तन निदेशालय, आयकर और सीबीआई ने संयुक्त रुप से लगभग 60 से अधिक ठिकानों पर छापा मार कर सनसनी फैला दी थी। ये दोनों भाजपा के करीबी रहे हैं और इसी नजदीकी का असर है कि इन लोगों का नाम अब प्रदेश के नामचीन व्यापारियों मे शुमार है। शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने से पहले इनकी हैसियत मामूली थी, यह भाजपा की कृपा असर था या कुछ और के ये दोनों रात दुगनी दिन चौगुनी के हिसाब से तरक्की कर देखते ही देखते ये मामूली व्यवसायी खास व्यवसायी बन गए और अरबों के दौलत के मालिक बन बैठे। सूत्रों कि अगर माने तो जिस व्यक्ति का छह साल पहले तक का सालाना टर्न ओवर महज 1300 करोड़ रहा उसका टर्न ओवर दस हजार करोड़ तक पहुंच गई है ऐसी तरक्की तो यकीनन किसी न किसी के कृपा का जादुई करिश्मा ही हो सकता है। इस छापे के बाद प्रदेश सरकार को तो झटका लगा है लेकिन इस झटके का दर्द प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं को ज्यादा हो रहा है। खबरों की यदि माने तो मध्य प्रदेश में कई कांग्रेसी नेता विपक्ष का फर्ज निभाने के बजाए दोस्ती निभाते हुए मलाई काट रहे हैं।
प्रदेश में सत्तापक्ष के चहेतों के खिलाफ हुई इतनी बड़ी कार्रवाई के बावजूद विपक्ष का खामोश रहना इस बात को और भी पुष्ट करता है। शेहला मसूद हत्याकांड के मुख्य बिंदु रहे भाजपा विधायक ध्रुव नारायण सिंह के मामले में भी कांग्रेस ऐसी नाप तौल कर बयान देती रही जैसे मानों ध्रुव नारायण भाजपा के विधायक न होकर कांग्रेस के विधायक हों। सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने वाले कांग्रेस के नेताओं पर गिरने वाली गाज़ भी समझ के परे है। खनिज माफिया के खिलाफ बेहद आक्रामक तेवर रखने वाले प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा को प्रवक्ता पद से हटना पड़ा कारण उन्होंने सुधीर शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोलने की सजा है या मिलीभगत से होने वाली कमाई पर ग्रहण लगने का डर यह तो कांग्रेसी बेहतर जानते हैं, लेकिन प्रदेश में भाजपा के जख्मों का दर्द अब कांग्रेस नेताओं को क्यों हो रहा है। यह अहम सवाल आने वाले चुनाव में मील का पत्थर साबित होगा। हां ऐसी विषम परिस्थिति में आम जनता के पास कौन बेहतर विकल्प होगा यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है। लेकिन इतना तो तय है कि महज सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन नहीं होने वाला है वो भी तब जब राजनीति में आम जनता के विकास से इतर मिल बांट के खाने की एक नई परंपरा ने जन्म ले लिया हो। जिसमें सत्ता भले ही किसी पार्टी के पास हो लेकिन भला तो सभी का होगा सिवाए आम जनता के।
लेखक अब्दुल रशीद सिंगरौली में पत्रकार हैं.


