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मध्‍य प्रदेश में मुलायम का ‘एमवाई’

लखनऊ। सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव चौतरफा हाथ मारने को कमर कस चुके है। राष्ट्रीय राजनीति के साथ उनके एजेन्डे पर यूपी की सीमा से सटा मध्य प्रदेश अब उनके एजेन्डे पर है। इस प्रदेश में भी वह यूपी का सफल फार्मूला यादव-मुस्लिम समीकरण अपना कर राजनीति में तीसरा कोण बनाने के लिए कदम बढ़ा चुके है। 2009 के लोकसभा चुनाव में विदिशा सीट से भाजपा की दिग्गज सुषमा स्वराज को कड़ी टक्कर देने वाले चौधरी मुनव्वर सलीम को यूपी से राज्यसभा में भेज कर मुलायम सिंह ने शुरुआत कर दी है, मध्य प्रदेश में अगर यादव-मुस्लिम को सपा के पक्ष में वह एकजुट कर लेते है तो इस प्रदेश की राजनीति में एक धमाका होगा, क्योंकि यहां तो बस दो ही दल भाजपा व कांग्रेस घूम फिर कर सत्ता में क्रमशः आते जाते है। मुलायम का यह दांव मध्य प्रदेश में कितना सफल होगा यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन दांव सटीक और सम्भावनाओं से भरा हुआ है। बार्डर से लगी 20 विधानसभा सीटों का आकार-प्रकार सामाजिक संरचना, वोटरों का मानसिक सोच यूपी से काफी मिलता जुलता है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के सात बडे़ शहरों में यादवों ओर मुस्लिमों की आबादी हराने-जिताने की स्थिति में है।

लखनऊ। सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव चौतरफा हाथ मारने को कमर कस चुके है। राष्ट्रीय राजनीति के साथ उनके एजेन्डे पर यूपी की सीमा से सटा मध्य प्रदेश अब उनके एजेन्डे पर है। इस प्रदेश में भी वह यूपी का सफल फार्मूला यादव-मुस्लिम समीकरण अपना कर राजनीति में तीसरा कोण बनाने के लिए कदम बढ़ा चुके है। 2009 के लोकसभा चुनाव में विदिशा सीट से भाजपा की दिग्गज सुषमा स्वराज को कड़ी टक्कर देने वाले चौधरी मुनव्वर सलीम को यूपी से राज्यसभा में भेज कर मुलायम सिंह ने शुरुआत कर दी है, मध्य प्रदेश में अगर यादव-मुस्लिम को सपा के पक्ष में वह एकजुट कर लेते है तो इस प्रदेश की राजनीति में एक धमाका होगा, क्योंकि यहां तो बस दो ही दल भाजपा व कांग्रेस घूम फिर कर सत्ता में क्रमशः आते जाते है। मुलायम का यह दांव मध्य प्रदेश में कितना सफल होगा यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन दांव सटीक और सम्भावनाओं से भरा हुआ है। बार्डर से लगी 20 विधानसभा सीटों का आकार-प्रकार सामाजिक संरचना, वोटरों का मानसिक सोच यूपी से काफी मिलता जुलता है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के सात बडे़ शहरों में यादवों ओर मुस्लिमों की आबादी हराने-जिताने की स्थिति में है।
मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव वर्ष 2013 में होने है। यहां अभी 231 सीटों में से 151 सीटें लेकर भारतीय जनता पार्टी शिवराज सिंह ने नेतृत्व में सरकार चला रही है। कांग्रेस दूसरे नंबर पर है। परिस्थितियां शिवराज सिंह के प्रतिकूल होती जा रही हैं लेकिन इस बार ट्विस्ट यह है कि भाजपा को हटाने के लिए जिस कांग्रेस की शरण में मतदाता जाएगा, वह कांग्रेस भी प्रदेश स्तर पर ध्वस्त खड़ी है। संगठन तार-तार है। ऐसे में यूपी की सत्ता की हनक यहां का मुस्लिम-यादव गठजोड़ मप्र में मुलायम सिंह को मजबूत बनाने का काम कर सकते हैं। वर्ष 2008 में जब मायावती की यूपी में सरकार थी तो बसपा ने इस प्रदेश में इसी आधार पर 7 विधानसभा सीटें जीती थी। उसी चुनाव में टीकमगढ़ जिले की निवाड़ी सीट पर सपा ने जीत हासिल की थी। 40 सीटों पर सपा का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था।

इसके पहले वर्ष 2003 में किसान मजदूर आदिवासी संगठन के मुखिया डा. सुनील मिश्रा मुल्ताई सीट से विधायक बने थे, जिन्होंने बाद में इस दल का सपा में विलय कर दिया था और समाजवादी पार्टी की कमान संभाल ली थी। सुनील मिश्रा मप्र में वेल एजुकेटेड एक्टिविस्ट के तौर पर जाना पहचाना चेहरा हैं। प्रदेश के लगभग हर जिले में सपा संगठन की कमेटियां भी कागजी तौर पर जिंदा है। भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, सागर, विदिशा, उज्जैन यह ऐसे शहर है जहां मुस्लिम आबादी भारी संख्या में है जबकि मुरैना, भिंड, शिवपुरी, श्योपुर, टीकमगढ़, दतियां, रीवां, सतना, पन्ना, छतरपुर, सीधी, गुना जैसे 20 विधानसभा सीटों में यादव, निषाद, पाल के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग का वोटर बहुतायत में है। इनमें ज्यादातर भाजपा फिर कांग्रेस से जुड़ा हुआ है जबकि मुस्लिम पूरी तरह से कांग्रेस के साथ हैं। मुलायम सिंह अगर यादव-मुस्लिम गठजोड़ बनाकर वोटों में तब्दील कर ले जाते हैं तो कांग्रेस के नुकसान पर सपा फायदा उठा सकती है।

उप्र की राजनीति में जिन्हें कोई नहीं पहचानता वह चौ. मुनव्वर सलीम जब राज्यसभा भेजे गये तो राजनीतिक गलियारों में लोग चौकन्ना हो गये। सलीम दो बार से लगातार विदिशा से सपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे है। वर्ष 2009 के चुनाव में तो वे भाजपा नेता सुषमा स्वराज के निकटतम प्रत्याशी थे। सांसद बनने के बाद वे मप्र के प्रतिनिधि कहलाएंगे या उप्र के? इस पर चौधरी कहते है कि वे पार्टी के सिपाही है। कप्तान उन्हें जहां लगाएंगे, वहां से काम करेंगे। उन्होंने कहा कि उप्र से उनका गहरा नाता है। उनके पिता और दादा उप्र के ही थे। सलीम के राज्यसभा में जाने के पीछे उनकी और आजम खान से निकटता को मुख्य वजह माना जा रहा है। अमर सिंह के कारण जब मुलायम सिंह और आजम खां में दूरियां बढ़ीं तो दोनों को निकट लाने का काम चौधरी मुनव्वर सलीम ने ही किया था। अब सलीम मप्र में मुस्लिमों को सपा के पक्ष में एकजुट करने का काम बहुत तेजी से करेंगे। जबकि यादव व अन्य पिछड़े वर्गों में सीमावर्ती सीट गरौठा से विधायक दीपक यादव, जो मप्र सपा इकाई क अध्यक्ष भी थे, पहले से ही कर रहे है। इन्हीं दीपक की पत्नी 2008 में निवाड़ी सीट से विधायक है। एकलौती सीट यही सीट पूरे प्रदेश में सपा के पास है। दीपक यादव इस बार भी यूपी के गरौठा से विधायक हैं, उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज राजा रणजीत सिंह जूदेव को हराकर सपा में महत्वपूर्ण कद बढ़ा लिया है, दीपक को मंत्री भी बनाया जाना तय है। दीपक यादव के जिम्मे सीमावर्ती 20 सीटों पर सपा के पक्ष में जातीय समीकरण बनाने का दायित्व भी है।

सीमावर्ती जिलों की स्थिति इस तरह है कि यूपी से एमपी के बाशिन्दों का रोटी-बेटी के अलावा खेती-किसानी और व्यापारिक ताल्लुकात बहुत गहरे है। सैकड़ों गांव का भूगोल तो इस तरह है कि आधा गांव एमपी में है और आधा यूपी में है किसी किसी मकान का तो दरवाजा यूपी की तरफ खुलता है तो पिछला दरवाजा मप्र में। इस प्रदेश के बच्चे उस प्रदेश के स्कूलों में पढ़ते हैं। कई तीर्थस्थल जैसे दतिया का पीताम्बरा पीठ, चित्रकूट का कामदगिरि, सतना की मैहर देवी, ओरछा के राम लला, उज्जैन के महाकालेश्वर ऐसे हैं, जहां एमपी से ज्यादा यूपी के लाखों श्रद्धालु हर महीने आते जाते हैं। दोनों प्रदेशों के बाशिन्दों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान इसी वजह से बार्डर पर बहुत बढ़िया बना हुआ है। इसका लाभ भी सपा को मिलेगा। यूपी की सरकार के काम काज की अच्छाई और बुराई दोनों ही मप्र के बाशिन्दों को प्रभावित करती हैं। इसीलिए मुलायम सिंह ने अब मप्र में पार्टी को चुनावी युद्ध में उतारने का फैसला किया है।

यह भी हो सकता है कि कांग्रेस, जो इस बार शिवराज सिंह के कुशासन का फायदा उठाना चाहती है, वह इसलिए और उत्साहित है कि लगातार तीसरी बार हैट्रिक भाजपा नहीं बना पाएगी। अगर अपना सही आंकलन करके खुद की कमजोरियों को स्वीकार कर लेती है तो कोई बड़ी बात नहीं है कि समाजवादी पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लडे़। लेकिन ऐसा सोचना अभी सिर्फ सोचना भर ही है। क्योंकि कांग्रेस तो सपने देखती है वह धरातल पर आंकलन करने में कमजोर है। उसे तो दिग्विजय सिंह जैसे मप्र के राजागण सत्ता के सपने में मदहोश कर देते हैं, अगर कांग्रेस सपा से चुनावी तालमेल नहीं भी करती है तो भी मुलायम सिंह व उनका संगठन इस प्रदेश में मेहनत कर ले जाता है और जातीय समीकरण की गोटियां फिट कर लेता है तो नुकसान कांग्रेस का होगा, क्योंकि मुस्लिम वोटर चौ.मुनव्वर सलीम को उदाहरण बना कर सपा के पक्ष में एकजुट हो सकता है। विधायक दीपक यादव इस बात की पुष्टि करते हैं। उन्होंने कहा कि बिल्कुल संम्भावनाएं हैं। अकेले झांसी में मुस्लिम व यादव बहुत हैं, जिनकी पूरे मप्र में आवाजाही है। शिवराज सिंह व उमा भारती जब यहां पर टोटल जातीय राजनीति कर सकते हैं तो फिर अन्य जातियां क्यों नहीं उस पार्टी के साथ जुड़ सकती हैं, जिस पार्टी में उनकी जाति का हित दिखता है। कहा कि नेता जी से अभी मप्र के संबंध में कोई निर्देश नहीं मिला है लेकिन निश्चित तौर पर इस बार समाजवादी पार्टी इस प्रदेश में अन्य दलों के लिए चुनौतियां बनकर उभरेगी क्योंकि खोने के लिए यहां कुछ है ही नहीं, जो कुछ भी है पाने के लिए ही है।

लेखक पीयूष त्रिपाठी साप्‍ताहिक पत्रिका इतवार से जुड़े हुए हैं.

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