मनमोहन अब कुर्सी छोड़ो, देखो जनता आती है.
बहुत रुलाया तुमने उसको, अब ब्यथा सही ना जाती है.
“गांधारी” तुमको राह दिखाती, “कौरव” राज चलाते हैं.
बना दिया है तुम्हें शिखंडी, जनता पर वाण चलाते हैं.
दुर्योधन अपनी मस्ती में, परवाह न करता जनता की.
नाटक भर वो कर सकता है, सोचेगा क्या वो जनता की.
भष्मासुर गुजरात में बैठा, देख रहा दिल्ली का सपना.
अहंकार से चूर चूर वो, कोई नहीं रहा अपना.
“सर्वश्रेष्ठ” वित्तमंत्री ने सारा वित्त बिगाड़ दिया.
खुश होकर “गांधारी” ने रायसीना पर भेज दिया.
“ममता” तुनकमिजाज बहुत है, ममता उससे कोसों दूर.
अपनी जिद पर अड़ अड़ कर बनी अर्थव्यस्था का नासूर.
“गांधारी” के पुतले हो तुम, दुर्योधन नाच नचाता है.
“विदुर” तुम्हारे साथ न कोई, दिग्भ्रमित राह दिखाता है.
“द्रोण” विवश है, “भीष्म” विवश , सत्ता की ऐसी लाचारी.
मूक बधिर बन बैठे तुम, जनता है किस्मत की मारी.
कुटिल “कपिल” दिग्भ्रमित “दिग्विजय”, उल्टी राह दिखाते हैं.
अपना अपना हित सर्वोपरि, जनता पर सब धौंस जमाते हैं .
माना तुम “हनुमान” नहीं, तुम लंका नहीं जला सकते.
सत्ता छोड़ तो सकते हो, क्यों जल्दी छोड़ नहीं सकते?
-जय सिंह
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इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें- तुम तो देश के मनमोहन थे, अब तुम्हें शिखंडी क्यों कहते हैं? (कविता)


