23 मई 1987 को हुए मलियाना कांड को राजनीतिक दलों ने हर चुनाव में भुनाया है। इस चुनाव में भी भाजपा के प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कांग्रेस पर यह कहकर निशाना साधा है कि मुसलमानों के हितैषी होने का दम भरने वाली कांग्रेस के राज में ही मलियाना कांड हुआ था। मेरठ में होने वाली चुनावी सभाओं में मलियाना कांड को भुनाने की कोशिश होती रही है। 25 साल गुजर गए हादसे को, राजनीति तो सबने की, लेकिन इस कांड के दोषियों को सजा दिलाने की तरफ किसी ने कदम नहीं बढ़ाया। सपा, ने इसका सबसे ज्यादा फायदा उठाया, लेकिन तीन बार सत्ता में आने के बाद भी मलियाना की सुध नहीं ली, तो बसपा ने भी कुछ नहीं किया। जब मलियाना कांड हुआ था, तो प्रदेश में वीर बहादुर सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। इस कांड के बाद मलियाना नेताओं का तीर्थस्थल बन गया था।
मलियाना के लोग आज भी याद करते हैं कि मुलायम सिंह यादव भी आए थे और वादा करके गए थे कि यदि हमारी सरकार आई तो दोषियों को सख्त सजा दिलाएंगे। उनके खास सिपहासालार आजम खान तो हर तीसरे दिन मलियाना आते थे, वह भी भेष बदलकर, क्योंकि उन पर मेरठ आने पर पाबंदी थी। उन्होंने भी बड़ी-बड़ी बातें की थीं। 1989 के चुनाव प्रचार में भी मुलायम सिंह यादव और आजम खान चुनावी सभाओं में मलियाना कांड का जिक्र करते हुए कहते थे कि यदि जनता दल सत्ता में आया, तो मलियाना कांड की जस्टिस जीएल श्रीवास्तव जांच आयोग की रिपोर्ट को न केवल सार्वजनिक करेंगे, बल्कि दोषियों पर हत्याओं पर मुकदमा भी चलाएंगे। यूपी में जनता दल की सरकार बनी, तो मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री और आजम खान श्रममंत्री बने थे।
चौथाई सदी गुजर गई। इस दौरान एक पीढ़ी जवान हो गई। अखिलेश यादव 1987 में बच्चे ही रहे होंगे, आज सपा की बागडोर उनके हाथ में है। मलियाना कांड के पीड़ित आज भी इस इंतजार में हैं कि कब आजम और मुलायम आएंगे और अपना वादा पूरा करेंगे। बहरहाल, मलियाना कांड 25 बरस से चुनाव में भुनाया जा रहा है, लेकिन पीड़ितों का दर्द आज भी कम नहीं हुआ है। देखना यह है कि यदि मुलायम सिंह यादव सत्ता में आते हैं, तो अबकी बार भी अपना वादा पूरा करते हैं, या नहीं। हालांकि पीड़ितों ने तो उम्मीद छोड़ दी है। हर चुनाव में जिक्र होता है मलियाना कांड का आजम खान आते थे बार-बार मलियाना सपा ने किया था जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई करने का वादा न्याय मिलने को टूट गई उम्मीद 50 साल के वकील अहमद इस कांड में गंभीर रूप से घायल हुए थे। वह तल्खी से कहते हैं, ‘अब तो उम्मीद ही टूट गई है। मुलायम सिंह यादव से बहुत उम्मीद थी। आजम खान की बातों से तो लगता था कि वह अपना वादा जरूर पूरा करेंगे, लेकिन नहीं किया। सरकार बनने से पहले तक तो वह मलियाना बहुत बार आए। मंत्री बनने के बाद वे नौचंदी मेले में होने वाले मुशायरे के मेहमान-ए- खसूसी बनकर आए, लेकिन मलियाना आने की उन्होंने जहमत नहीं उठाई।
जख्म को कुरेदकर न हरा करें नेता : सबीला का शौहर जब इस कांड में मारा गया था, तो बच्चे बहुत छोटे थे। उनसे जब इस बारे में बात की गई तो वह फट पड़ीं, ‘जब अब तक कुछ नहीं हुआ, तो अब क्या होगा? हम तो बस यह चाहते हैं कि ये नेता लोग चुनाव के वक्त बार-बार इसे कुरेदकर हमारे जख्म हरे न करें।’ बात सबीला की ही नहीं है। यहां के सभी लोग इस बात से बहुत आहत हैं कि मलियाना कांड का जिक्र करके जख्म क्यों हरे किए जाते हैं, जब मरहम नहीं लगा सकते। भरोसे लायक नहीं नेता हशमत अली को सिर्फ इसलिए पीएसी के कहर का शिकार होना पड़ा था, क्योंकि उसके घर से एक बड़ा पेंचकस बरामद हुआ था। उसी पेंचकस को उसकी उंगलियों में फंसाकर उनको तोड़ दिया था। हशमत कहते हैं, ‘भैया, हम तो निराश हो चुके हैं। नेताओं के वादों का कुछ भरोसा नहीं। मतलब निकल जाने के बाद किसी को नहीं पहचानते।’
नहीं मिला जवाब शकील सैफी को, जिन्होंने इस कांड में अपने वालिद सलीमुल्लाह को खोया था, कहते हैं, ‘मुलायम और आजम की तरह ही वीपी सिंह भी यहां आकर दोषियों को सजा दिलाने का वादा कर गए थे। हमने कई बार तीनों को ज्ञापन भेजकर उन्हें उनका वादा याद दिलाया, लेकिन वादा तो पूरा करने की बात तो दूर, ज्ञापन का जवाब तक नहीं आया।’ निशाने पर सपा मलियाना कांड के पीड़ितों को सबसे ज्यादा शिकायत सपा से ही क्यों है, कांग्रेस या बसपा से क्यों नहीं है? इस सवाल का जवाब नौशाद अली देते हैं- ‘यह कांड कांग्रेस कार्यकाल में ही हुआ था और उसमें कांग्रेसी सरकार की भूमिका भी थी, इसलिए उनसे कुछ कहना-सुनना बेकार था। चूंकि आज तक सपा ने ही हर चुनाव में इस कांड का जिक्र करके मुसलमानों की सहानुभूति लेने के लिए बार-बार इसका जिक्र किया है, इसी वजह से वही निशाने पर रहती है।’
लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों जनवाणी से जुड़े हुए हैं.


