भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बिहार के सिताबदियारा से अपनी ‘जन चेतना यात्रा’ की शुरुआत कर दी है। यात्रा से पहले ही राजनीतिक दांव-पेंच और प्रधानमंत्री बनने के कयासों में उलझे आडवाणी ने साफ करना चाहा कि देश में सत्ता परिवर्तन से अधिक व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता है और इस यात्रा का उद्देश्य आम जनमानस के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ चेतना पैदा करना है। उन्होंने साफ किया कि इस यात्रा की शुरुआत भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए की जा रही है। देश में सत्ता परिवर्तन से अधिक व्यवस्था परिवर्तन की आवश्यकता है। चलिए मान लेते हैं आडवाणी जी की बात। वह सत्ता के लिए नहीं व्यवस्था के लिए यात्रा निकाल रहे हैं। पर कौन समझाए इनको कि व्यवस्था परिवर्तन यात्राओं से नहीं होता, मजबूत इच्छाशक्ति से होता है। जो इन राजनेताओं में होना चाहिए। जिसका इनमें सर्वथा आभाव है।
आडवाणी जी कोई पहली बार रथयात्रा नहीं निकाल रहे हैं। इससे पहले वह 1990 में सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की राम रथयात्रा निकाल चुके हैं। इस यात्रा को देशव्यापी समर्थन मिला था। भारतीय जनता पार्टी इस रथयात्रा से अपने लक्ष्य को साधने में सफल रही। इस राजनीतिक रथयात्रा ने उसे अन्य दलों से अलग एक राष्ट्रीय पहचान और चरित्र भी दिया। कई राज्यों में भाजपा की सरकारें भी बनी। आडवाणी की इस रथयात्रा की सफलता ने भाजपा को केंद्रीय सत्ता तक पहुंचने की राह भी आसान कर दी। इसके बाद आडवाणी ने 1993 में जनादेश यात्रा निकाली। इस यात्रा में उनके साथ पार्टी के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी, भैरो सिंह शेखावत और कल्याण सिंह मौजूद थे। इस यात्रा का भी व्यापक प्रभाव देखने को मिला।
सन 1997 में आजादी के पचास साल पूरे होने पर आडवाणी ने स्वर्ण जयंती रथयात्रा निकाली। यह यात्रा भी सफल रही। इसके बाद लोकसभा चुनाव 2004 से ठीक पहले भारत उदय रथयात्रा निकाली। यह यात्रा लोगों को रास नहीं आई। उस समय केंद्र में भाजपा शासित सरकार थी। सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी थी। जमीन पर कार्य करने की बजाय इस सरकार ने हवा में ज्यादा पुल बांधे थे। जिसका नतीजा यह हुआ कि तत्कालिक चुनाव में भाजपा के राजग गठबंधन को करारी शिकस्त मिली।
इस बार 2004 से माहौल जुदा है। भ्रष्टाचार और महंगाई को लेकर लोगों में गजब का गुस्सा है। अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने पूरे देश को एक कर दिया। लोगों का आक्रोश रामलीला मैदान से ज्यादा देश की सड़कों पर दिखा। क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब इस आंदोलन के रंग में रंग गए। राजनीतिक दलों ने लोगों का गुस्सा भांप लिया। भाजपा भी इस मौके को भुनाने के ताक पर लग गई। ऐसे में महारथी आडवाणी को अपनी यात्रा निकालने का यह बेहतर मौका लगा। अभी कुछ दिनों के बाद ही यूपी सहित देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव और 2014 में लोकसभा का चुनाव होने हैं। राजग की सरकार बनीं तो प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल सकता है। राजग और देश में अपनी स्वाकार्यता बनाने के लिए सही अवसर है; और प्रधानमंत्री बनने के सपने को पूरा करने की आखिरी कोशिश भी। इस तरह आडवाणी का रथयात्रा पर जाने का ऐलान करना रथयात्रा के व्यापक मर्म और उसके राजनीतिक निहितार्थ को संदर्भित करता है।
हाईटेक यात्रा के लिए हाईटेक इंतजाम
‘जन चेतना यात्रा’ में इस्तेमाल की जा रही हाईटेक बस आधुनिक सुख-सुविधा संपन्न है। जापानी बस में वे सभी सुविधाएं हैं जो आडवाणी की यात्रा को सुगम और आरामदायक बनाएंगे। इसमें आडवाणी के लिए एक एलसीडी लगाया गया है, जिसपर वह देश और दुनिया की खबरों से अवगत होते रहेंगे। ‘मूविंग चेयर’ और लिफ्ट की सुविधा है। यात्रा मार्ग में जहां भी आडवाणी को जन समूह को सम्बोधित करने की जरूरत पड़ेगी वह लिफ्ट की सहायता से ऊपर आ जाएंगे। बस एक मंच के रूप में तब्दील हो जाएगा। इसके लिए लाउडस्पीकर और माइक जैसी चीजों का भी इंतजाम किया गया है। करीब 50 लाख रुपये की बस को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने में और 50 लाख रुपये खर्च हुए हैं। मीडियाकर्मियों के लिए एक बस और एक एम्बुलेंस की भी व्यवस्था है। एक बस में खाने-पीने की चीजें हैं। ड्राइवर के नजदीक स्टीयरिंग के पास वाले स्थान पर भी कैमरे लगाए गए हैं। इनके जरिए ड्राइवर हर वक्त चारों ओर नजर रख सकता है।
लेखक मुकेश कुमार गजेंद्र पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


