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मातृभाषाओं के सम्मान से ही बचेगी राष्ट्रीय अस्मिता : अष्ठाना

भोपाल। देवपुत्र के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार कृष्णकुमार अष्ठाना का कहना है कि मातृभाषाओं को सम्मान दिए बिना राष्ट्रीय अस्मिता बचाई नहीं जा सकती। हमें सरकारी कामकाज से लेकर समाज जीवन के हर क्षेत्र में मातृभाषाओं को स्थापित करना होगा। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला के दूसरे दिन एक विशेष सत्र में अध्यक्ष की आसंदी से बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के लिए हमारे मन में हीनताबोध उपस्थित है, इसके लिए हमें इजराइल और जापान जैसे देशों की ओर देखना चाहिए। जो आकार में छोटे किंतु अपने संकल्पों से बहुत बड़े हैं।

भोपाल। देवपुत्र के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार कृष्णकुमार अष्ठाना का कहना है कि मातृभाषाओं को सम्मान दिए बिना राष्ट्रीय अस्मिता बचाई नहीं जा सकती। हमें सरकारी कामकाज से लेकर समाज जीवन के हर क्षेत्र में मातृभाषाओं को स्थापित करना होगा। वे यहां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला के दूसरे दिन एक विशेष सत्र में अध्यक्ष की आसंदी से बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के लिए हमारे मन में हीनताबोध उपस्थित है, इसके लिए हमें इजराइल और जापान जैसे देशों की ओर देखना चाहिए। जो आकार में छोटे किंतु अपने संकल्पों से बहुत बड़े हैं।

वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने कहा कि अंग्रेजों ने हर क्षेत्र में भारतीयों की पद्धति को नष्ट किया है और जनता की सामूहिक शक्ति को बांट दिया। भारतीय भाषाएं इस देश को जोड़ने का काम कर रही हैं जबकि अंग्रेजी युवाओं को कुंठित कर रही है और विभाजन के बीज बो रही है। मप्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सचिव कैलाशचंद्र पंत ने कहा कि भारत एक राजनीतिक राज्य नहीं है बल्कि यह सांस्कृतिक तौर पर एक राष्ट्र है। भारत में हर समय एकता विद्यमान रही है। भारतीय भाषाएँ और उनका साहित्य हमें जोडने का सूत्र उपलब्ध कराते हैं। श्री महेश चंद्र गुप्त ने कहा कि हमें जो घरोहर के रूप में मिला वही हमारी संस्कृति है। शब्द स्वतंत्र होता है और उसमें जब क्रिया का संस्कार होता है तो वाक्य बनता है। यही संस्कार है जो हमारी भाषा में है। डा. जवाहर कर्नावट का कहना था कि भाषायी लोकपाल का गठन हो तथा बैंकिग व आर्थिक गतिविधियों में भारतीय भाषाओं का उपयोग बढ़ाया जाए। सरकारी कामों में प्रयोग होने वाली हिंदी लोगों को कठिन लगती है इसे सरल बनाने की जरूरत है। श्री जगदीश नारायण राय ने कहा कि हिंदी और भारतीय भाषाओं का प्रयोग हर क्षेत्र में बढ़ाने की जरूरत है।

कार्यशाला के दूसरे दिन सरकारी कामकाज में हिंदी और भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय एकता व अखंडता में हिंदी व भारतीय भाषाओं का योगदान,उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं, पत्रकारिता व भारतीय भाषाएं विषयों पर चर्चा हुयी। इन सत्रों में प्रमुख रूप से प्रो.बृजकिशोर कुठियाला डा. मनोहर भंडारी, संतोष कुमार, प्रो. पीयूष त्रिवेदी, जगदीश उपासने,डा. विजय अग्रवाल, अतुल कोठारी ने अपने विचार रखे।

कार्यशाला के तीसरे दिन सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-प्रशासन में भारतीय भाषाएं, न्यायपालिका और भारतीय भाषाएं विषय पर चर्चा होगी। जिसमें प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद के निदेशक डा. राजीव संगल, सरमन नियाल, अशोक चतुर्वेदी, डी. भरत कुमार, पुरूषेंद्र कौरव अपने विचार व्यक्त करेंगें। इसके अलावा मातृभाषाओं के विकास और सभी क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति के लिए एक कार्ययोजना भी बनाई जाएगी।

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