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मायावती का खास है नौएडा एक्‍सटेंशन का असली खिलाड़ी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 6 जुलाई को शाहबेरी की 156 हैक्टेयर और 20जुलाई को पतवाड़ी की 589 हेक्टेयर भूमि का इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अधिग्रहण रद्द कर देने के बाद नौएडा प्राधिकरण, बिल्डर, निवेशक और किसान सभी परेशान हैं,  मगर इस सारे खेल के अदृश्य खिलाड़ी आनंद मना रहे हैं। नौएडा के अधिकारी परेशान हैं कि उन की सारी सारी योजना धरी रह गई। बिल्डर परेशान हैं कि उनके कराड़ों डूब रहे हैं। निवेशकों का अपना घर होने का सपना चकनाचूर हो गया और वह किसान जिसने मुआवजे का पैसा खर्च कर दिया है उस के सामने संकट यह है कि अगर मुआवजा लौटाने की नौबत आई तो वह उस का कहां से जुगाड़ करेगा। मगर इस खेल के असली खिलाड़ी आनंद कर रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी को कुछ देना नही है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा 6 जुलाई को शाहबेरी की 156 हैक्टेयर और 20जुलाई को पतवाड़ी की 589 हेक्टेयर भूमि का इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अधिग्रहण रद्द कर देने के बाद नौएडा प्राधिकरण, बिल्डर, निवेशक और किसान सभी परेशान हैं,  मगर इस सारे खेल के अदृश्य खिलाड़ी आनंद मना रहे हैं। नौएडा के अधिकारी परेशान हैं कि उन की सारी सारी योजना धरी रह गई। बिल्डर परेशान हैं कि उनके कराड़ों डूब रहे हैं। निवेशकों का अपना घर होने का सपना चकनाचूर हो गया और वह किसान जिसने मुआवजे का पैसा खर्च कर दिया है उस के सामने संकट यह है कि अगर मुआवजा लौटाने की नौबत आई तो वह उस का कहां से जुगाड़ करेगा। मगर इस खेल के असली खिलाड़ी आनंद कर रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी को कुछ देना नही है।
पहले इस खेल को समझना आवश्यक है। दरअसल नौएडा एक्सटेंशन का निर्माण अपने आप में एक खेल है,  जिसे इन अदृश्य खिलाड़ियों ने बिल्डरों की मदद से खेला था। ऐसे खिलाड़ी हर सरकार के पास होते हैं मुलायम सरकार के पास अमर सिंह ऐसे ही चतुर खिलाड़ी थे जो पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए खेल खेलते थे। बझैड़ा में उन्होंने रिलायंस के लिए ऐसा खेल खेला था और अम्बुजा सीमेंट के लिए दादरी के पास बढ़पुरा और धूम मानिक पुर के किसानों के साथ खेला था। बढ़पुरा और धूम मानिक पुर के किसानों की जमीन के अधिग्रहण की सारी प्रक्रिया कागजों पूरी कर किसानों को जमीन से बेदखल कर उस पर अम्बुजा का कब्जा करा दिया गया। किसानों को इस का पता तीन महीने बाद चला तो वह इस मनमानी के खिलाफ अधिकारियों से मिले तो उन्हें साफ बता दिया गया कि जमीन तो अब उन की नहीं रही वह मुआवजा उठा लें। अगर मुआवजा नही उठाया तो वह सरकारी कोष में जमा कर दिया जाएगा।

यह मामला 1995 के अंत और 1996 के आरंभ का है। कुछ किसानों ने अब तक मुआवजा नहीं उठाया है। इन्हें मुआवजा भी 320 रुपए प्रति वर्ग गज दिया गया जो बाद में बढ़ा कर साढे़ चार सौ कर दिया गया। मुआवजा वृद्धि के लिए ये किसान अब तक आंदोलन कर रहे हैं। धरना प्रदर्शन के अतिरिक्त ये किसान कई बार जेल भी जा चुके हैं। इन किसानों की मांग है कि उन्हें ग्रेटर नौएडा के समान मुआवजा मिले, ग्रेटर नौएडा की तर्ज पर छह प्रतिशत आवासीय भूखंड दिया जाए और उनके बच्चों को अम्बुजा में नौकरी दी जाए। इधर आंदोलन जारी है और उधर अम्बुजा में सीमेंट का उत्पादन दो साल पहले आरंभ हो चुका है। उस समय की सपा सरकार के खेल से प्ररणा ले कर वर्तमान सरकार के खिलाड़ियों ने नौएडा एक्सटेंशन के नाम से खेल खेला था, जो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले के बाद खराब हो गया है मगर खिलाड़ी पर कोई आंच नही आने वाली है।

मुलायम सरकार के खिलाड़ी अमर सिंह को तो सब जानते थे मगर माया सरकार के खिलाड़ियों को या तो बिल्डर जानते हैं या फिर नौएडा और जिले के बड़े अधिकारी। यह खिलाड़ी बिना किसी शोर शराबे के अपना काम करते रहते हैं। राजनीति से भी दूर रहते हैं और न ही किसी की टिकट या किसी पद के लिए सिफारिश करते हैं। किसी विवाद में भी नही पड़ते इस लिए चर्चा में भी नहीं आते। इन में सब से बड़ा खिलाड़ी मुख्यमंत्री मायावती के परिवार का खासमखास है। एक बसपा नेता और बिल्डर इस के सहयोगी है। यह व्यक्ति विधान सभा का चुनाव भी हार चुका है। इस का मुख्य काम बिल्डरों और खासमखास के बीच डील कराना है। जिस भूमि पर विवाद हुआ है यह भी एक डील के तहत बिल्डरों को दी गई थी।

दरअसल नौएडा से सटे पतवाड़ी, शाहबेरी, रौजा जलालपुर और मांयचा आदि गांव दिल्ली और गाजियाबाद के निकट होने के कारण बिल्डरों के लिए सोने की चिड़िया हैं। अधिसूचित एरिया में होने के कारण बिल्डर कालोनी, फ्लैट या प्लाटिंग का कारोबार नहीं कर पा रहे थे,  सो वह खासमखास की शरण में गए और नौएडा एक्सटेंशन के नाम भूमि का अधिग्रहण कराया गया और फिर इसका का लैंड यूज बदलने के लिए नौएडा से प्रस्ताव पास करा कर लखनऊ से उसे मंजूर कराया गया। यह प्रस्ताव मंजूर होने के बाद भूमि बिल्डरों के हवाले कर दी गई। जानकारों का कहना है कि इस में करोड़ों की डील की गई थी। अब यदि नौएडा बिल्डरों का पैसा लौटाता भी है तो डील में दिया गया पैसा तो वापस मिलेगा नहीं। बिल्डर भी इस के बारे में अनौपचारिक बात में तो मुंह खोल देते हैं मगर सामने आ कर कोई नहीं कहना चाहता क्योंकि उन्हें खासमखास से आगे भी काम लेना है।

इस खासमखास की ताकत का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि नौएडा का जो अधिकारी इस के काम में हीलाहवाली करता है उसका रातों रात नौएडा से तबादला हो जाता है। नौएडा के बड़े अधिकारियों की सूची उठा कर देख लें सब से अधिक तबादले यहां होते हैं। किसी-किसी अधिकारी का बिस्तर तो तीन महीने से कम में ही बंध जाता है। आम तौर पर किसी बड़े अधिकारी को दोबारा पुरानी जगह नहीं भेजा जाता मगर नौएडा और ग्रेटर नौएडा में ऐसा भी होता है कि कई अधिकारियों को दोबारा यहां पोस्टिंग दे दी जाती है। इस खासमखास की ताकत के बारे में अधिकारी भी जानते हैं इसलिए इस से पंगा लेने का साहस नहीं करते।

एक उदाहरण- दिल्ली की सीमा से सटे एक भूखंड पर कुछ बिल्डरों की नजर थी कि अगर इस भूखंड पर फ्लैट बना दिए जाएं तो हाथों हाथ मुंह मांगे दाम मिल जाएंगे,  सो इन्होंने खासमखास से सम्पर्क किया करोड़ों की डील हुई और वह भूखंड बिल्डरों को मिल गया। एक जानकार ने बताया कि डील होने के बाद किसी को कहीं नही जाना पड़ा घर बैठे ही सारा काम हो गया। आज इस भूखंड पर सैकड़ों फ्लैट बन कर आबाद हो चुके हैं। ऐसे ही अगर किसी को औद्योगिक प्लाट चाहिए तो इस खासमखास से डील करने पर प्लाट के कागजात घर बैठे आप के पास पहुंच जाएंगे। जानकार बताते हैं कि इस व्यक्ति को मुख्यमंत्री का सख्त आदेश है कि कारपोरेट जगत और बिल्डरों के अलावा अन्य किसी काम में रूचि नहीं लेनी है और न ही नेता बनने का प्रयास करना है।

भूमि अधिग्रहण के खिलाफ याचिकाओं के अतिरिक्त कई लागों ने नौएडा में भूमि आबंटन की सीबीआई जांच के लिए जनहित याचिका भी इलाहाबाद हाई कोर्ट में दाखिल कर रखी है। अगर यह याचिका मंजूर हो जाती है तो सीबीआई जांच में इस खासमखास का चेहरा सामने आ सकता है। वैसे इस खासमखास के एक सहयोगी के यहां आयकर का छापा पिछले दिनों पड़ा था,  मगर इन्होंने ऐसा कुछ मैनेज किया कि इस बारे में कुछ सामने नही आने दिया गया।

लेखक डा. महर उद्दीन खां वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा कई अखबारों के संपादक रह चुके हैं.

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