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मायावती की राजनीतिक कब्र खोद रहे हैं विश्‍वासपात्र अधिकारी

बसपा सरकार या मुख्यमंत्री मायावती की गलत नीतियों के कारण उत्तर प्रदेश के हालात बदतर होते जा रहे हैं। समाज का हर वर्ग किसी न किसी मुद्दे पर आक्रोशित नजर आ रहा है, लेकिन पूर्ण बहुमत की सरकार के दंभ में उन्हें यह सब नहीं दिख रहा है। जनता से दूरी होने के कारण महसूस करने का तो सवाल ही नहीं उठता और प्रदेश की सही तस्वीर उन्हें इसलिए नजर नहीं आ रही है, क्योंकि उन्होंने सब कुछ अपने विश्वास पात्र आईएएस व आईपीएस अधिकारियों के सहारे छोड़ रखा है। मुख्यमंत्री मायावती यह भूल रही हैं कि उनके यही कुछ चुनिंदा विश्वास पात्र अधिकारी अंधेरे में रख कर उनके लिए बहुत गहरी राजनीतिक कब्र तैयार कर रहे हैं, जो उन्हें चुनाव बाद दिखाई देगी।

बीपी गौतम

बसपा सरकार या मुख्यमंत्री मायावती की गलत नीतियों के कारण उत्तर प्रदेश के हालात बदतर होते जा रहे हैं। समाज का हर वर्ग किसी न किसी मुद्दे पर आक्रोशित नजर आ रहा है, लेकिन पूर्ण बहुमत की सरकार के दंभ में उन्हें यह सब नहीं दिख रहा है। जनता से दूरी होने के कारण महसूस करने का तो सवाल ही नहीं उठता और प्रदेश की सही तस्वीर उन्हें इसलिए नजर नहीं आ रही है, क्योंकि उन्होंने सब कुछ अपने विश्वास पात्र आईएएस व आईपीएस अधिकारियों के सहारे छोड़ रखा है। मुख्यमंत्री मायावती यह भूल रही हैं कि उनके यही कुछ चुनिंदा विश्वास पात्र अधिकारी अंधेरे में रख कर उनके लिए बहुत गहरी राजनीतिक कब्र तैयार कर रहे हैं, जो उन्हें चुनाव बाद दिखाई देगी।

 

मुख्यमंत्री मायावती के अधिकांश निर्णय समाज के सभी वर्गों को नहीं भाते, पर विकास के नाम पर बनाये जा रहे पार्क, मूर्तियां, नोयडा एक्‍सटेंशन या एक्सप्रेस-वे किसी को भी रास नहीं आ रहे हैं। यहां तक है कि हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट भी लगातार कड़ी टिप्पणिय़ां जारी कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण कानून के गलत प्रयोग करने पर दमन का कानून बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, साथ में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ा है कि किसानों से जमीन छीन कर बिल्डर्स को देना, जनहित का निर्णय नहीं हो सकता या जज मूर्ख नहीं हैं। यह सब बसपा सरकार की फजीहत करने के लिए काफी है, पर इससे भी अधिक दु:ख की बात यह है कि बसपा सरकार या मायावती की दमनकारी नीतियों से आम आदमी स्वयं लड़ रहा है या फिर आम आदमी का संग न्यायालय दे रहा है, तभी मायावती एक के बाद एक गलत निर्णय लेती जा रही हैं, पर इस मौके पर विपक्षी दल शक्ति के साथ जनता की लड़ाई लड़ रहे होते, तो मायावती पर गलत निर्णय न लेने का दबाव बनता, लेकिन विपक्षी नेता सिर्फ बयानबाजी करने तक ही सीमित हैं और विधान सभा या सड़क पर आकर अपेक्षित संघर्ष नहीं कर पा रहे हैं, तभी जनता सत्ताधारी बसपा के साथ विपक्षी दलों से भी बेहद खुश नजर नहीं आ रही है।

उधर राहुल गांधी भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर भले ही राजनीति कर रहे हों या राजनीति ही कर रहे हैं, तो इसमें बुराई क्या है? कम से कम राहुल गांधी के आने से पीडि़त किसानों का दर्द राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय तो बना ही है। इसके अलावा राहुल गांधी के आंदोलन में कूदने से पीडि़त किसानों का आत्म विश्वास बढ़ा है। किसानों को प्रदेश सरकार और बिल्डर्स से लडऩे की और अधिक शक्ति मिली है, साथ ही सरकार व बिल्डर्स का मनोबल भी गिरा है। राहुल के आने से इतना सब होना, क्या कम है? इतना भाजपा के नेता भी तो कर सकते थे, पर वह सीमा पर ही गिरफ्तारी की औपचारिका पूरी कर मुद्दा भूल जाते हैं और फिर राहुल गांधी की यात्रा पर नये-नये कटाक्ष गढ़ कर तीखे प्रहार करने से भी नहीं चूकते। माना राहुल गांधी की नजर आने वाले विधान सभा चुनाव पर ही है, पर सवाल यह है कि राहुल गांधी राजनेता हैं, तो चुनाव पर नजर क्यूं नहीं होनी चाहिए या राष्ट्रीय पार्टी भाजपा की चुनाव पर नजर क्यूं नहीं है या फिर भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव कोई अहमियत नहीं रखता।

जाहिर है, भाजपा भी उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए या मजबूत स्थिति वापस पाने के लिए कांग्रेस की ही तरह छटपटा रही है, पर वह मजबूत

बीपी गौतम

बीपी गौतम

स्थिति आम आदमी के बीच जाये बगैर नहीं मिल सकती। आम आदमी के मुद्दों से दूर भाग कर कोई चुनाव नहीं जीत सकता। तपती दोपहरी, धूल भरी हवायें और भीड़ के बीच से भागने वालों को जनता अब वोट देते समय भी याद रखेगी, इसलिए हर मुद्दे पर राहुल गांधी की चुटकी लेने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि एसी रूम से चुटकी लेना बंद नहीं किया, तो उनकी चुटकी उन पर ही भारी पड़ सकती है।

 

लेखक बीपी गौतम मान्‍यता प्राप्‍त स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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