इस सिफारिश ने प्रदेश की राजनीति में ऐसा तूफान मचाया कि सकते में आयी बसपा सरकार ने अपने दो मंत्रियों को एक साथ निकाल बाहर कर दिया। इतना ही नहीं, अगली सिफारिश के साथ ही माया-सरकार के एक और मंत्री को बाहर का दरवाजा दिखाया गया। कहने की जरूरत नहीं कि इन सिफारिशों में इन मंत्रियों की करतूतों का खुलासा करते हुए उन्हें मंत्री जैसे पदों से हटाने की बात कही गयी थी। हौवा इस कदर हावी था कि हटाये गये एक कद्दावर मंत्री की करतूतों की जांच अभी लंबित ही थी। इन हादसों ने जल्दी ही तब एक सिलसिले की शक्ल अख्तियार कर ली, जब इसके चंद दिन बाद ही एक और मंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप सही पाये जाने पर उसे मंत्री पद से हटाने की सिफारिश आ गयी। यह मंत्री भी बाहर हो गया।
तो, इसे हालात कहिये या कमाल, मगर जोरदार राजनीतिक धमाका करने वाली वाली इन कार्रवाइयों के केंद्र में आ गये प्रदेश के लोकायुक्त नरेंद्र किशोर मेहरोत्रा। जस्टिस मेहरोत्रा के फैसलों ने मायावती सरकार के कई धाकड़ खिलाडियों को बाकायदा स्टम्प-आउट किया। प्रदेश के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी लोकायुक्त की सिफारिश के बाद सरकार में काबिज मंत्रियों पर एकसाथ इतनी कड़ी कार्रवाई की गयी।
पत्नी मंजू और बेटी सीमा, मनीषा व पायल के साथ एनके मेहरोत्रा प्रसन्न शख्सियत हैं। समाज के किसी भी क्षेत्र पर बात कर लीजिए, बेबाक बोलते हैं। हां, मर्यादाएं नहीं लांघते। हर तकनीकी सवाल पर हाजिर जवाब हैं। हंसकर बोलना अदा है। इस हंसमुख लोकायुक्त ने अपने दफ्तर में पूरी पारदर्शिता बरती। लोकायुक्त को समाज के हर तबके के दरवाजे तक पहुंचाया। काम का बोझ बढ़ा, लेकिन जनप्रतिबद्धता का अहसास भी। यहां अब कुछ भी दबा-छिपा नहीं। किस्सों की भरमार है उनके पास, जिन्हें वे पूरी ईमानदारी से बताते भी हैं। चाहे किसी का भी हो, फोन खुद उठाते हैं। उम्र, चेहरे पर तो है, दिल-दिमाग पर हर्गिज नहीं। उनकी खासियत, आप उनके विरोधियों से पूछ लीजिए।
रामपुर के राजद्वारा मोहल्ले में ब्रजकिशोर मुख्तार के बेहद गरीब परिवार में नरेंद्र किशोर मेहरोत्रा का जन्म पहली मार्च 1944 को हुआ था। उम्र के बीसवें पड़ाव पर पहुंचने के साथ ही उन्होंने एमए के बाद बाद एलएलबी किया। श्रम कानून के साथ फ्रेंच भाषा और लोक प्रशासन में डिप्लोमा भी किया। सन 70 में वे उप्र प्रदेश की पीसीएस (न्यायिक शाखा) में चुन लिये गये। बारह साल बाद एचजेएस में प्रोन्नत हुए और 15 बरस बाद जिला जज। वे उप्र शासन में संयुक्त सचिव और विशेष सचिव के पदों पर सन 87 से 96 तक रहे और अगले छह बरसों तक प्रमुख सचिव न्यायिक के पद पर कार्यरत रहे। जुलाई-02 में उनका चयन इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के तौर पर हुआ जहां 28 फरवरी-06 को रिटायर हुए। 07 में लोकायुक्त बने।
प्रदेश की माया-सरकार का मौजूदा कार्यकाल शुरू से ही विवादों से घिरा था। स्मारकों के नाम पर लूट और दीगर अराजकताओं का आरोप विरोधी दलों ने खुलकर लगाया। सर्वोच्च न्यायालय तक ने हस्तक्षेप किया। कहीं कांग्रेस अध्यक्ष रीता जोशी का घर फूंका गया तो कहीं सरकार के ही विधायक-मंत्री अपराधी बने दिखे। खाता खुला सांसद उमाकांत यादव से। मायावती ने उन्हें अपने आवास से ही पुलिस में दे दिया। तब से यादव जेल में हैं।
इसके बाद तो जैसे सिलसिला शुरू हो गया। चाहे इंजीनियर मनोज गुप्ता हत्याकांड में शेखर तिवारी रहे हों, या एक इंजीनियर को धमकाने वाले लखना से विधायक भामराव अंबेडकर। पुलिस थाने पर हमले में जमुना प्रसाद निषाद, या शशि हत्याकांड में आनन्दसेन यादव। कानूनगो रामकुमार यादव की हत्या में चंद्रभान सिंह या शीतल बिड़ला यौन उत्पीड़न कांड में गुड्डू पंडित। बदायूं में यौन उत्पीड़न में फंसे बिल्सी के विधायक योगेंद्र सागर और राज्यमंत्री का दर्जा हासिल किये राममोहन गर्ग। बांदा के पुरूषोत्तम द्विवेदी भी यौन उत्पीड़न में नपे। माननीय रहे शिवकुमार, जितेंद्र सिंह बबलू, इंतिजार आब्दी, शिवशंकर चौहान, वीरेंद्र वर्मा, रामपाल वर्मा और सूरजभान सिंह, कबीना मंत्री वेदराम भाटी के साथ धनंजय सिंह भी इसी बीच निपटे। लेकिन लोकायुक्त के चाबुक की चमक और उसकी दहशत तब सरकार पर हावी दिखी जब उनकी रिपोर्ट के बाद राज्यमंत्री राजेश त्रिपाठी से उनकी लालबत्ती उतरवा ली गयी।
कुछ ही दिनों बाद दुग्ध विकास मंत्री अवधपाल सिंह यादव पर लोकायुक्त की सिफारिश के बाद उन्हें पैदल किया गया। अभी एक हफ्ता पहले लोकायुक्त की एक जांच रिपोर्ट ने तो जैसे यूपी की राजनीति में भूचाल खड़ा कर दिया। शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र के एक मामले में जांच की रिपोर्ट आयी तो माया-सरकार ने उनके साथ ही श्रममंत्री बादशाह सिंह को भी नाप दिया। हालांकि तब तक उनके खिलाफ कोई मामला तय नहीं हो पाया था। कुछ लोगों का मानना है लोकायुक्त के फैसलों की आड़ में मायावती ने उन लोगों को भी निपटा दिया, जो पहले से ही सरकार के निशाने पर थे।
हालांकि मधुमिता कांड में अमरमणि त्रिपाठी की जमानत सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो जाने के बाद जस्टिस मेहरोत्रा पर पहली बार आरोपों के छींटे पड़े थे। लेकिन भाजपा के बड़े नेता हृदयनारायण दीक्षित की निगाह में जस्टिस मेहरोत्रा एक निहायत संवेदनशील व सुलझे व्यक्ति हैं। काम पर ध्यान और विवादों से दूर। उधर प्रख्यात वकील एलपी मिश्र के सहयोगी शरद पाठक के अनुसार जस्टिस मेहरोत्रा की छवि दायित्वों के प्रति निष्ठावान और जिम्मेदार व्यक्ति की है।
बहरहाल, चार मंत्रियों को नाप डालने वाले लोकायुक्त की सिफारिशों के बाद भी माया-सरकार का संकट टला नहीं है। लालजी वर्मा, रामबीर उपाध्याय, सुभाष पांडे, रतन लाल अहिरवार, नारायण और राकेशधर त्रिपाठी के खिलाफ संगीन मामलों की जांच अभी लोकायुक्त कर रहे हैं। यानी चुनाव सिर पर, सरकार संकट में और लोकायुक्त सजग।
लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों एस टीवी के यूपी ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित डेली न्यूज एक्टिविस्ट में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. इनसे संपर्क मोबाइल नम्बर 9415302520 के जरिए किया जा सकता है.


