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मीडिया का गरबा रास और कोने में दुबके सरोकार

साथियों कल नवरात्र में एक मित्र का फ़ोन आया यार पास है क्या ? इससे पहले कि मैं उससे यह पूछता कि किस चीज का ! उसने दूसरा सवाल दागा कि किसी का भी दिला दे यार ! बच्चे पीछे पड़े हैं | सब तो ले-लेकर बैठे हैं, आज किसका नहीं है गरबा पंडाल | अब माजरा मेरे समझ में आने लगा था, लेकिन आप सोच रहे होंगे कि ये संवाद का विषय कैसे है लेकिन यही विडंबना है कि अब यह संवाद का विषय नहीं है बात है शहर में यत्र तत्र सर्वत्र आयोजित गरबे की |

साथियों कल नवरात्र में एक मित्र का फ़ोन आया यार पास है क्या ? इससे पहले कि मैं उससे यह पूछता कि किस चीज का ! उसने दूसरा सवाल दागा कि किसी का भी दिला दे यार ! बच्चे पीछे पड़े हैं | सब तो ले-लेकर बैठे हैं, आज किसका नहीं है गरबा पंडाल | अब माजरा मेरे समझ में आने लगा था, लेकिन आप सोच रहे होंगे कि ये संवाद का विषय कैसे है लेकिन यही विडंबना है कि अब यह संवाद का विषय नहीं है बात है शहर में यत्र तत्र सर्वत्र आयोजित गरबे की |

 

नवरात्रि  में गरबे खेलने और देवी को प्रसन्न करने की प्रथा तो बरसों से चली आ रही है | हाँ यह अलग बात  है कि गुजरात और राजस्थान से यह  मध्यप्रदेश में भी आ गई  कब आई, कैसे आई वो चर्चा का विषय नहीं है इसलिए मैंने इस पर ऊर्जा व्यर्थ नहीं की | इस ग्लोबल युग में जब पूरी दुनिया ही एक गाँव है तो और सब चीजें इधर से उधर जा रही हैं तो गरबा एक प्रान्त की सीमा लाँघ जाये तो क्या भला ?

भोपाल में गरबा खेलने का चलन 2000 के आसपास से शुरू हुआ | इसके पहले यह इंदौर की फिजा मैं रच बस सा गया था | भोपाल में एक विशुद्ध उद्योगपति घराने यानी अखबार ने यह शुरू किया था | यह खूब परवान चढा और जब लोगों के सर पर इसका जादू चढ़ने लगा तो अन्य लोगों को भी ये सोने की मुर्गी (नाम और दाम दोनों के सन्दर्भ में) लगने लगी बस यहीं से होड़ शुरू होती है और यहीं पर ख़तम | इसके बाद तो अन्य मीडिया संस्थान भी इस होड़ में कूद गए अब गरबा आराधना का नहीं बल्कि मीडिया संस्थानों के शक्ति प्रदर्शन का अनिवार्य अंग बन गया है | पूरा आयोजन इस बात पर आधारित नहीं होता कि माँ की आराधना कैसे होगी, बल्कि इस बात पर होता है कि दूसरे मीडिया समूह ने क्या आयोजन किये और उसके मुकाबले में हमारा आयोजन कैसा ?और उस आयोजन मैं कौन आया और हमारे आयोजन मैं कौन | यानी मंत्री, विधायक से लेकर फिल्म स्टार तक | आजकल तों टीवी सीरियल के स्टार्स भी लोकप्रिय हैं | बालिका वधु की आनंदी या झाँसी की रानी या इसी तरह के कुछेक और चेहरे |

तो साहब ! गरबे की जगह जुगाड़ने से ही बात शुरू होती है, विगत वर्ष एक समूह ने जब दुसरे समूह की लगभग आधिपत्य की गयी जमीन पर गरबा रास रचा तो यह चेहरों पर कुटिल मुस्कान फेरने वाली जीत थी | देखिये प्यार और व्यापार में सब जायज है इसलिए यह भी हुआ सामने वाले ने तीख मानी और दंभ जताते हुए और बड़ा आयोजन रच डाला खुश दोनों ही थे अपने अपने दंभ में  | तीख की इस दौड़ में वे कैसे पीछे छूटते !! जो कमजोर खिलाडी ही हों, मगर मैदान में तो हैं, उन्होंने भी दांव लगाया किसी को छोटा मैदान मिला, किसी को मनमाफिक कुछ ने भव्यता का प्रदर्शन लगभग 3 सितारा होटलों में किया | कुछ ने अपने मॉल के सामने ही यह किया मतलब ओने ही आंगन मैं | सवाल यहाँ यह नहीं है कि कहाँ किया. सवाल यह है कि क्या जरुरत थी करने की |

सवाल यह भी है कि यह आयोजन किसके लिए होते हैं ? निश्चित रूप से यह आयोजन उच्च मध्यम व मध्यम वर्ग के लिए ही होते हैं जो बाजार की  भाषा जानते हैं उससे भी बड़ा सवाल यह कि इस आयोजन में मीडिया संस्थानों कि भूमिका क्या और क्यों ? जहाँ तक मैंने पढ़ा और समझा है कि मीडिया की भूमिका यह तो कभी नहीं थी | जरा सोचिये आजादी के पूर्व के दिन जब समाचार पत्र निर्भीक रूप से निकलते थे और जनमानस बनाते थे | आज वही अखबार जनता के लिए बाजार का मानस बना रहे हैं | बाजार से संचालित मीडिया समूह आज यह साबित करने में लगे हैं कि यदि अमुक युवा ने गरबा नहीं खेला तो उसका जीवन व्यर्थ ही हो गया !!!! यहाँ भूमिकाओं में जमीन आसमान का फर्क है | ताज्जुब तो तब भी होता है जबकि वर्षों से मूल्य आधारित पत्रकारिता का दंभ भरने वाले समूह भी इस प्रक्रिया में शामिल हो जाते हैं जो कुछ समूह अभी नहीं कूदे हैं इस हौड में | एसा नहीं कि वे मूल्यवान पत्रकारिता का झंडा थामे हैं बल्कि थोडी चादर छोटी पड़ रही है | क्यूंकि मूल्य तों कबके हवा हो गए थे |

विश्लेषण इस बात का भी हो कि इन 9 -10 दिनों में अखबारों में क्या छपा ? विशेषतः सिटी पेज पर क्या !! किसी अखबार में मास्टर प्लान को लेकर विस्तृत खबरें लगीं ? नहीं ! तो क्या छपा गरबे में आप क्या पहनें, कहाँ से खरीदें, नया क्या है बाजार में आपके लिए, टेटू कहाँ से और कैसे गुदवाएं और पास कहाँ से मिलेंगे खाने में आपके लिए क्या है | सारे सिटी रिपोर्टर्स की ड्यूटी है कि फ़ैल जाओ पूरे मैदान में देखो, किसने क्या पहना है !! कैसे ठुमका लगाया !! इत्यादि | ये भी अपने ही अखबार समूह का छपेगा दूसरे अखबार के द्वारा आयोजित गरबे के लिए हमारे यहाँ जगह नहीं | अरे जब शहर की वो भी एक खबर है तो फिर वो किसी भी अखबार में खबर क्यों न बने ???

पिछले साल 2 अक्टूबर को लगभग सभी अखबारों (इसमें वे अखबार भी शामिल हैं जो कि गरबा खिलने में शामिल थे) ने इस बात पर खबर की, कि नशा बिकता है कि नहीं
| यानी इतना तो तय है कि वे भी मानते हैं कि नशा एक सामाजिक बुराई है लेकिन फिर समझ से परे यह भी है कि इन्हीं अखबार समूहों ने अपने प्रायोजक के रूप में पानमसाले और गुटका कंपनियों को रखा और बीच-बीच में गरबा रोककर उसका विज्ञापन भी किया | इसके मायने जब गेंद दू सरे के पाले में हो तो सवाल दागो, लेकिन हम अपने गिरेबान में नहीं झाकेंगे |

हो सकता हो कि इस बहस को शुरू करने से पहले मैंने कई जाले पाल लिए हों लेकिन मैं इतना जरूर समझ पा रहा हूँ कि मीडिया का ये रोल तो कतई नहीं है कि वो गरबों का आयोजन करे और इस खेल में इतना मशगूल हो जाये की सामाजिक चेतना का अपना धर्म ही दांव पर लग जाये | यदि लगता है की मैं सही हूँ तो समर्थन करें अन्यथा मेरे जाले साफ़ करने में मदद करें|

रही-सही कसर प्रशासन पूरी कर देता है | वैसे तों देश भर मैं रात 10.30 के बाद निर्धारित क्षमता से ज्यादा का बाजा नहीं बजाया जा सकता है | यदि यही कोई झुग्गी बस्ती की देवी जागरण मैं बज जाए तों प्रशासन स्थानीय निवासियों की नींद मैं खलल पड़ने के मामले मैं तुरंत उसे बन्द करा देता है | लेकिन मजाल है कि इस आयोजन मैं किसी का कुछ बिगड जाए बल्कि पूरे समय पुलिस अपनी मुस्तेदी के साथ ड्यूटी वहीँ बजाती है | दूसरा क्या शहर मैं कोई और अपराध नहीं होते कि पुलिस को वहीँ निगरानी करनी होती है, जैसे पुलिस स्टेट की नहीं है, अखबार मालिकों की है | यह भी समझ से परे है कि आखिर क्यूँ सारे मानक अमानक हो जाते हैं | रात 1 बजे से पहले तों यह आयोजन थमते ही नहीं है |  सवाल यह भी है कि कोई भी मीडिया समूह इस चीज को क्यूँ नहीं उठाता है ? यह एक धर्मं विशेष का आयोजन है तऔर राज्य सत्ता को वह धर्मं विशेष भाता है, तों बड़ा सवाल यह भी है कि यदि किसी धर्मं विशेष का आयोजन होगा तों भी क्या यह पुलिस और प्रशासन इसी तरह शरणागत सा दिखेगा ? क्या तमाम अखबार समूह इसी तरह का नाच खेलेंगे और मजाल है कि कोई स्वतंत्र समूह भी इसके खिलाफ अपनी कलम चलायें ?

इस समय तों अखबारों मैं विज्ञापनों की भरमार है और लगता है अखबार में खबर नहीं है बस विज्ञापन ही विज्ञापन हैं | क्या करें बेचारे अखबार वाले गरबा खिलवाते हैं तों प्रायोजक भी तों चाहिए  और प्रायोजक होगा तों फिर स्वभावतः उसका प्रमोशन तों करना ही पड़ेगा | बाजार की नजर से देखिये भाई साहब, सरोकार तों पहले से ही कोने में दुबके पड़े हैं |

लेखक प्रशांत कुमार दुबे CNN IBN Young Indian Leader Award 2011 के विजेता हैं.  उन्हें National RTI Award 2010 भी मिल चुका है. वे Vikas Samvad, Bhopal के Associate Coordinator भी हैं. उनसे संपर्क 09425026331 के जरिए किया जा सकता है.

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