यशवंत जी, पटना जा कर मार्कन्डे काटजू ने जब बिहार की मीडिया को सरकार का पिछलग्गू कहा तो देश भर के पत्रकारों का आत्मसम्मान जग गया. लेकिन अपने गिरेबां में झांकने की कोशिश किसी ने नहीं की. मौका मिलते ही सरकार के पीछे दुम हिलाने वाले तथाकथित पत्रकारों को जब भी मौका मिलता है वे सरकार के सामने सिर झुकाए नजर आते हैं. ताजा उदाहरण उत्तरांचल, बिहार, और छत्तीसगढ़ से है.
पहला, उत्तरांचल में सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड एनालेसिस ने मीडिया के चरित्र में आ रहे बदलावों पर देश के नामी गिरामी पत्रकारों के लेख वाली एक पुस्तक ‘‘मीडिया के सुलगते सवाल’’ प्रकाशित की है। इस किताब का लोकार्पण राज्य के मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी के द्वारा किया गया। पुस्तक का संपादन राजेन टोडरिया ने किया है तथा प्रबंध संपादक आलोक घिल्डियाल हैं। पुस्तक में प्रख्यात पत्रकार वेदप्रताप वैदिक, प्रख्यात जनसंचार विशेषज्ञ सुभाष धूलिया, भारतीय जनसंचार संस्थान के कोर्स निदेशक आनंद प्रधान, इंडिया टुडे के कार्यकारी संपादक दिलीप मंडल, वरिष्ठ पत्रकार शेषनारायण सिंह समेत देश के ख्यातिलब्ध पत्रकारों के लेख हैं।
दूसरा, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पत्रकार अनन्त सिनहा वेबसाईट फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम का लोकापर्ण किया। इस वेबसाईट फणीश्वरनाथ रेणु से संबंधित रचनाए पढ़ने को मिलेगी ही साथ ही साथ उनके संग साथ और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले रचनाकारों की रचनाए पढ़ने को मिलेगी। तीसरा उदाहरण, हाल ही में हरिभूमि के युवा पत्रकार ब्रह्मवीर सिंह के नक्सल समस्या पर आधारित उपन्यास दंड का विमोचन समारोह शुक्रवार को छत्तीस गढ़ के सीएम डा. रमन सिंह ने किया. वहां के सर्किट हाउस हुए भव्य समारोह की अध्यक्षता केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री डा. चरणदास महंत ने की।
सवाल यह है कि जब भी कोई मीडिया का सख्श कुछ अलग काम करता है तो वह सरकार में बैठे लोगों के हाथों ही क्यों विमोचन, उद्घाटन, या लोकार्पण कराता है? क्या वे लोग यह जताना चाहते हैं कि मीडिया सरकार के लिए है? या सरकार को यह दिखाना चाहते हैं कि मीडिया में लगे लोग भी कुछ रचनात्मक कार्य करते हैं?
यशवंत जी, ये सवाल मैं यहां इसलिए उठा रहा हूं कि साहित्य और पत्रकारिता में रूचि रखने वाले मेरे एक मित्र ने मुझसे सवाल किया कि ‘क्या मीडिया के क्षेत्र में ऐसी हस्तियां नहीं हैं जो किसी पत्रकार के रचनात्मक कार्यों को लांच करने की योग्यता रखती हों ? या ये लोग ऐसा लिखते ही नहीं कि कोई काबिल आदमी उससे जुड़ना चाहे, जो हर बार सरकार के मंत्री या सीएम का सहारा लिया जाता है?’ मैंने कहा भाई मैं भड़ास फार मीडिया के संपादक यशवंत जी से पूछने की कोशिश करता हूं. खैर मेरे दोस्त ने आगे जो कहा वह ध्यान देने वाली बात है कि मीडिया में अब जो पीढ़ी है वह महज सरकार की प्रतिनीधि ही रह गई है. जो भी हो मेरे मित्र के सवालों में दम तो दिखा ही.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित


