मुद्रा और मंडी के सामान्य सिद्धान्तों के अनुसार बाजार या पूंजी अपने लाभ के लिये काम करते है ना कि लोकहित के लिये। हमारे सामान्य सामाजिक आर्थिक संदर्भो के लिहाज से आर्थिक तरक्की के तमाम दावों और 9 प्रतिशत की घोषित विकास दर के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है। भारत की आर्थिक विकास की दर सीधे तौर पर कृषि विकास पर निर्भर है। जिन वर्षो में कृषि विकास दर घटती है सकल आर्थिक विकास की दर पर भी जोर का झटका लगता है।
यह कोई विवाद का विषय नही है कि भारत या उत्तर प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी खेती पर निर्भर है और खेती अर्थव्यवस्था का प्राथमिक स्रोत है। इससे भी इतर भारतीय खेती में कृषि और संस्कृति दोनों का समावेश है। लेकिन इन सच्चाइयों और नेताओं के भाषणों से इतर खेती और किसानी के लिये सार्वजनिक पूंजी निवेश नियोजित तरीके से लगातार हटाया जा रहा है। पाँचवी पंचवर्षीय योजना में कृषि और समवर्गीय क्षेत्र के लिये कुल आंबटन योजनागत परिव्यय का 11.84 प्रतिशत था जो कि दसवी पंचवर्षीय योजना (2002-07) की अवधि में घटाकर 3.86 प्रतिशत रह गया।
यह बात तो लगातार कही जा रही है कि कृषि क्षेत्र का देश के एकल घरेलू उत्पाद में घटता योगदान सत्ता और नौकरशाही में चिंता का विषय है। लेकिन यह भी सही है कि कृषि में सार्वजनिक (सरकारी) निवेश लगातार हटाया जा रहा है। कृषि क्षेत्र में घटाये जा रहे सार्वजनिक पूंजी निवेश का सकल घरेलू उत्पाद में इसके योगदान से सीधे सरोकार है। पाँचवी पंचवर्षीय योजना के शुरुआती वर्ष में कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 48.33 प्रतिशत था। इस योजना के दस्तावेज में दीर्घकालीन नजरिया अपनानें का जिक्र किया गया और यह परिकल्पित किया गया कि अगले 15 वर्षों में कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान घटकर 26 प्रतिशत रह जायेगा। इस अवधारणा का असर योजनागत आंबटन पर दिखाई पड़ता है और पाँचवीं योजना से दसवीं योजना तक कृषि क्षेत्र का आंबटन लगातार हटाया जाता है।
यह स्वतः ही आश्चर्य का विषय होना चाहिए कि ऐसा क्षेत्र जिस पर आवाम का 66 फीसदी हिस्सा निर्भर है जो कि देश की अर्थ व्यवस्था का आधार है उस पर घटता सार्वजनिक निवेश किस के लिये हितकर है। समानान्तर दावे से यह भी सही है कि सिंचाई के किये सार्वजनिक निवेश लगातार किया गया है किन्तु उत्तर प्रदेश में नहरों से सिंचिंत क्षेत्रफल में लगातार कमी भी आ रही है। किसानों की बदहाली के बारे में सब जानते है और बात भी करते है और सत्तासीनों का एक वर्ग और उससे जुड़े विशेषज्ञ और वैज्ञानिक खेती में निजी कारपोरेट निवेश में इसका हल सुझाते है। वे इस बात की ताकीद करते है कि कांट्रेक्ट (संविदा) या कारपोरेट खेती हो किसानों की हालत में सुधार कर पायेगी। इसके जरिये किसानों को आवश्यक सामग्री-खाद बीज, दवायें, सिंचाई, सयन्त्र और आवश्यक उपकरण आसानी से मिल जायेगें और कृषि उत्पादों का सीधा बाजार भी मिल जायेगा। इसका सीधा मतलब होगा कि किसान आवश्यकता की हर चीज के किये किसी कम्पनी पर निर्भर हो जायेगा और उसका उत्पाद भी सीधे तौर पर कम्पनी के अधीन होगा। माने फसल चक्र भी कम्पनी तय करेगी और फसल पद्धति भी। जिस जैव विविधता को लेकर पूरी दुनिया में चिंता है वो कृषि उत्पादन आधारित व्यवस्था की बलि चढ़ जायेगी।
भारतीय खेती के मायने केवल मंडी और व्यापार तक सीमित नही है बल्कि इसका सीधा सरोकार घरेलू खाद्य सुरक्षा से लेकर संप्रभुता तक है। क्या पूंजी के बाजार में भारतीय खेती को दांव पर लगाना उचित है। दरअसल खतरे में भारतीय कृषि कम और किसानी के ज्यादा है और किसान तथा खेत मजदूरों की हालत सुधारों के लिए जो सुधार होने चाहिए उसके स्थान पर केवल और केवल खेती में कारपोरेट निवेश का मार्ग ही सरल किया जा रहा है। इस बात पर तो विचार हो नही किया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था के वो क्षेत्र जो कृषि पर आधारित है उनका योगदान सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ता रहा जा रहा है जबकि कृषि का घटता जा रहा है। खाद्य प्रसंसकरण, खाद, बीज, रासायनिक कीटनाशक, खाद्य प्रसंसकरण, ग्रामीण आर्थिक सेवाएं (कृषि श्रम किसान क्रेडिट कार्ड, स्वयं सहायता समूह) कृषि यंत्र और उपकरण, सिंचाई संय़त्र आदि सब सीधे तौर पर खेती पर निर्भर है और आर्थिक तरक्की में घोषित योगदान कर रहे है, लेकिन कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान घटता दिखाया जाता है।
समर्थन मूल्य के निर्धारण की प्रक्रिया अति गोपनीय है और कई बार यह वास्तविकता से परे नजर आती है। यदि समर्थन मूल्य निर्धारण किसी वैज्ञानिक विधि से होता है तो जाहिर तौर पर उत्पादन मूल्य की भी गणना की जाती होगी। यदि यह सही है तो खेती में लगने वाली लागत में बढ़ोत्तरी और मजदूरी की दरों में वृद्धि का असर समर्थन मूल्य पर क्यों दिखाई नही पड़ता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि यदि समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोत्तरी कर दी जाये तो रोजमर्रा के जीवन में आवश्यक वस्तुएं आम आदमी खासकर गरीबों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों की पहुंच से बाहर हो जायेगी, इसके आवश्यकता न्यूनतम मजदूरी दर के स्थान उपयुक्त मजदूरी दर के निर्धारण और संगठित व असंगठित क्षेत्र में वेतन-मजदूरी की विसंगतियों को दूर करने की है ना कि कृषि उपज के मूल्य कम आँकने की।
इसी प्रकार किसान और उसके परिवार के खेती में योगदान की नगण्य गणना की जाती है। खेती में बढ़ते लागत मूल्य के समक्ष उत्पादन मूल्यों की गणना सपने की तरह दिखाई पड़ती है। किसान की बदहाली को दूर करने के लिये आवश्यकता है, लागत मूल्यों में कमी करने के प्रयासों की और कृषि कार्य के लिये आवश्यक साधनों और संसाधनों पर किसान की बाजार पर निर्भरता कम करने की। दरअसल सकल घरेलू उत्पाद में कृषि घटता दिखने वाला योगदान हकीकत में कम और आँकड़ों की बाजीगरी में ज्यादा है।
आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में तमाम विसंगतियों और विरोधों के बावजूद भारत पर कृषि सब्सिडी कम करने का दबाव है। विश्व की अमीर अर्थव्यवस्थाओं ने तो बीते हुये वर्षों में कृषि अनुदान कम करने की बजाय बढ़ाया है और भारत में अनुदान को कर्ज से प्रतिस्थापित करने की कवायद जारी है। हर आवश्यक क्षेत्र में व्यापार प्रोत्साहन को बात कही जा रही है और नतीजा सामने है, पानी और खेती की जमीन पर भी वस्तुओं की तरह कम्पनियों के मुनाफे के लिए इस्तेमाल करने पर जोर हैं। दुनिया के वह मुल्क जो अन्तराष्ट्रीय दबाव बनाते हैं वहा 2-5 प्रतिशत लोग खेती करते हैं, जबकि ग्रामीण भारत के तीन चौथाई लोग खेती और केवल खेती पर निर्भर है। दरअसल कुछ बड़े मुल्कों की बड़ी कम्पनियों को जमीन, पानी और खेती में सत्त मुनाफा दिखाई पड़ता है और हम अपनी आत्म निर्भरता और संप्रभुता को छोड़कर उन पर निर्भर होने को तैयार दिखाई पड़ते हैं।
यह बात निश्चय ही निराशाजनक है कि एक ओर तो औद्योगिक घरानों को लगातार छूट दी जा रही है और हर क्षेत्र में सीधे विदेशी पूंजी निवेश के लिये
लाल कालीन बिछाये जा रहे है। और दूसरी ओर देश की अर्थव्यवस्था के आधार को बेहतर बनाने के लिये आवश्यक सहयोग करने के बजाय उसे कारपोरेट नियन्त्रण में सौपनें के मार्ग प्रशस्त किये जा रहे है। खेती केवल उत्पादन नहीं है भारतीय संप्रभुता की परिचायक भी है।
लेखक उत्कर्ष सिन्हा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार व सोशल-पोलिटिकल एक्टिविस्ट हैं. उत्कर्ष का दिल गांवों में बसता है. उन्हें किसानों-मजदूरों की चिंता रहती है. उनके बीच में काम करना पसंद करते हैं ये. फितरत से यायावर उत्कर्ष वर्तमान में दैनिक लोकमत, लखनऊ के संपादक हैं. किसान आन्दोलन सहित लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए चल रहे जन आन्दोलनों में शिरकत करते रहते हैं. उत्कर्ष से 09935736877 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.


