: सपा का आरोप- हत्या का प्लाट यूपी सरकार के इशारे पर तैयार हुआ : यूपी सरकार की घेरेबंदी शुरू : डॉक्टर सचान ने आत्महत्या कर ली। लखनऊ की जिला जेल में बंद सचान ने कल देर शाम अपनी बैरक में लगे पंखे में फांसी लगा ली। सचान वही शख्स हैं जिन्हें लखनऊ में परिवार कल्याण विभाग के सीएमओ रहे डॉक्टर बीपी सिंह की हत्या के मामले में पुलिस ने अभियुक्त बनाया था। लेकिन सचान की मौत ने सरकार और उसकी मशीनरी को गंभीर आरोपों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
प्रदेश में ताबड़तोड़ हो रहे बलात्कार और हत्याओं में बेतरह फंसी मायावती सरकार को सचान की मौत से करारा झटका लगा है। इस मौत के चलते अब सड़क से लेकर सत्ता के शीर्ष और विभिन्न राजनीतिक दलों में हंगामा खड़ा हो गया है। आत्महत्या की घटना के फौरन बाद ही विभिन्न राजनैतिक दलों ने सरकार के गले में आरोपों का फंदा कसना शुरू कर दिया है। फिलहाल सरकार इस मामले पर चुप्पी ही साधे हुए है।
प्रदेश में परिवार कल्याण विभाग को लेकर चल रहा विवाद आज अचानक आज तब भड़क उठा जब लखनऊ के बहुचर्चित सीएमओ डॉ बीपी सिंह की हत्या में प्रमुख षडयंत्रकारी बनाये गये डॉ वाईएस सचान की लाश हाई सेक्योरिटी वाली लखनऊ जिला जेल की बैरक में फांसी से लटकता मिला। खबर मिलते ही शासन और सरकार हिल गयी, जबकि प्रशासन के आला अफसरों की गाडियां जेल की ओर भागने लगीं। लाश को जेल से निकाल कर पोस्टमार्टम के लिए भेजने की तैयारी शुरू कर दी गयी है। खबर है कि सचान की लाश का पोस्टमार्टम जेल में रात में ही करा दिये जाने की कवायद तेज हो गयी है। हालांकि उनके घरवाले अभी तक मौके पर नहीं पहुंच सके हैं।
इसी साल दो अप्रैल की सुबह हवाखोरी के लिए सीएमओ डॉक्टर बीपी सिंह की कुछ अज्ञात असलहाबंद बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी। डॉक्टर बीपी सिंह परिवार कल्याण विभाग के पहले ऐसे अफसर नहीं थे जो इकलौते शिकार बने। इसके पहले भी दो अन्य अधिकारी भी ऐसी ही वारदातों में मारे जा चुके हैं। बेमिसाल काली कमाई वाला विभाग समझे जाने वाले परिवार कल्याण विभाग में इसके पहले महानिदेशक रह चुके डॉक्टर बच्ची लाल के साथ ही अभी कुछ ही महीना पहले एक अन्य अधिकारी और इसी विभाग में सीएमओ रहे डॉक्टर ओपी आर्या की भी हत्या हो चुकी है। इन सभी हत्याओं में हमलावरों ने एक ही तकनीक का इस्तेमाल किया और सरकार के नुमाइंदे भी यह दावा कर चुके हैं कि इन हत्याओं में एक ही मोडस आपरेंडी और एक ही असलहे का इस्तेमाल किया गया।
अभी दो दिन पहले ही प्रदेश के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने पत्रकारों को बुला कर दावा किया था कि बीपी सिंह हत्याकांड का खुलासा हो चुका है। उनका कहना था कि सचान ने ही डॉक्टर सिंह की हत्या करायी थी। उनका कहना था कि सचान इसके पहले एमबीबीएस में प्रवेश को लेकर भी अपराधी रह चुके हैं और उन्होंने इसके लिए अपना पिछड़ा वर्ग के बजाय अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र लगा कर एडमीशन लिया था। कैबिनेट सचिव का दावा था कि इसकी जांच भी पूरी हो चुकी है और सचान कोर्ट के आदेश पर नौकरी में बने हुए थे। कैबिनेट सचिव ने अपने दावों के समर्थन में कई तथ्य भी पेश करने का दावा किया और कहा कि जिन लोगों को सचान ने सुपारी दी थी, उन्होंने ही इस बात को कुबूला है। उन्होंने कहा था कि अब सचान को पुलिस रिमांड पर लेकर पूछतांछ की तैयारी की जा रही है।
लेकिन अपनी इस प्रेसवार्ता में कैबिनेट सचिव ने इन सवालों को कोई भी जवाब नहीं दिया था कि जब बच्चीलाल और विनोद आर्या की हत्या जैसी ही रणनीति बीपी सिंह हत्याकांड में अपराधियों ने बनायी और इन सभी हत्याओं में एक ही हथियार का इस्तेमाल करने का दावा पुलिस कर चुकी है तो बाकी हत्याओं की गुत्थी सचान की शिनाख्त से क्यों नहीं की जा रही है। सचान के साथ ही इस हत्याकांड में पकड़े गये लोगों को बाकी हत्याकांडों में अभियुक्त नहीं बनाये जाने के पीछे के कारणों का खुलासा न किये जाने पर भी कैबिनेट सचिव ने कोई जवाब नहीं दिया था।
बहरहाल, सचान के मामले को पुलिस आत्महत्या बता रही है। जबकि विरोधी दलों ने इसे हत्या का मामला बताते हुए घटना की सीबीआई जांच की मांग कर सरकार को बेहद पसोपेश में डाल दिया है। विधानसभा में नेता सदन शिवपाल सिंह यादव का आरोप है कि सचान की हत्या का प्लाट सरकार के इशारे पर ही तैयार किया गया। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव का आरोप है कि सफेदपोश लोगो को बचाने के लिए ही सचान की हत्या की गयी। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी का आरोप है कि यह हत्या का मामला है और इसकी सीबीआई जांच होनी चाहिए। भाजपा के कलराज मिश्र भी इसे हत्या बता रहे हैं, जबकि सरकार इस पूरे मामले पर लगातार चुप्पी साधे हुए है।
इन आरोपों को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि इसमें कुछ सचाई भी हो। कारण यह कि इन हत्याओं को लेकर सरकार और पुलिस के आला अफसरों की लगातार चुप्पी बनी रही है। सबसे पहले तो गोरखपुर क्षेत्र के बसपा के कुख्यात गुंडा एमएलसी और काशी क्षेत्र के एक माफिया एमपी के साथ ही साथ देवरिया के एक बसपा विधायक पर भी आरोपों की बौछार हो चुकी है। खबरें तो यहां तक आ चुकी हैं कि इन कथित अपराधियों ने मुख्यमंत्री निवास, कार्यालय यानी पंचम तल के साथ ही साथ कई मंत्रियों और पुलिस विभाग के बड़े अफसरों के सामने अपनी अर्जी लगायी थी। लेकिन इन चर्चाओं पर सरकार की ओर से कभी भी सफाई नहीं दी गयी। प्रेस के साथ बातचीत में स्पेशल डीजी तक की कुर्सी हथिया चुके ब्रजलाल ने कभी भी कोई जवाब देने की जरूरत नहीं समझी। ऐसे हर सवाल को वे लगातार टालते ही रहे।
लेकिन इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है कि अगर सचान की हत्या हुई तो उसकी वजह क्या रही। आत्महत्या से उन्हें क्या हासिल होने वाला था। या फिर सवाल यह भी है कि उनकी हत्या से किसी को क्या फायदा होता। और फिर अगर किसी को फायदा होना भी था तो इसमें इतनी देर क्यों लगायी गयी। दूसरी ओर, हालात बताते हैं कि अपनी जांच में फंस चुकी पुलिस ने शिकंजा सचान पर कसना शुरू कर दिया था, जबकि उसके पास कोई ठोस सुबूत थे ही नहीं। उधर इस घेराबंदी से बेहाल और बदनाम हो चुके सचान के पास कोई चारा ही नहीं था—- जिंदा रहने का।
लेकिन जेल में हुई है यह मौत। इसे आसानी से हजम नहीं किया जा सकता है। खास तौर पर तब जब प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री का ओहदा पाये और बहुचर्चित हत्याकांड में दिल्ली पुलिस की जांच में दोषी पाये गये इंतिजार आब्दी उर्फ बाबी को बलरामपुर अस्पताल में ऐश ओ आराम के सारे साधन मुहैया कराये जा चुके हैं। इसके पहले भी बसपा के मंत्री, विधायक, एमपी समेत कई करीबियों के साथ प्रशासन अस्पताल में ऐयाशी की सुखसुविधाएं मुहैया कराता रहा है। ऐसे में अगर सचान को अपनी बात कहने का उचित मंच नहीं मिला तो, उनके सामने आत्महत्या करने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं था।
बहरहाल, डॉक्टर बीपी सिंह और विनोद आर्या की हत्या के मामले में प्रदेश सरकार के जिन रसूखदार मंत्रियों और एमपी व एमएलसी-एमएलए के नाम सामने आये थे, उनके बारे में प्रदेश सरकार की ओर से सफाई देने की जरूरत अब तक क्यों नहीं समझी गयी, यह समझ से बाहर तो है ही, साथ ही आशंकाओं और संदेहों को जन्म भी देते हैं।


